राजस्थान के के लोगों से सुना जाता है कि घी व्यर्थ में बह जाए तो कुछ नहीं लेकिन जल व्यर्थ में नहीं बहना चाहिए। ऐसे सूखे क्षेत्र में कुएं और तालाब पानी के मुख्य स्रोत हुआ करते थे। हमारे जीवन में जल का बहुत महत्त्व है। जल के बिना सृष्टि की कल्पना भी नहीं की जा सकती। जल के महत्त्व के कारण ही हमारे धर्मग्रन्थों में जल को देवता के रूप में पूजा गया है। प्रसिद्ध कवि रहीम ने भी अपनी ओजस्वी वाणी में जल की महिमा का गुणगान किया है। रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून, पानी गये न ऊबरे, मोती मानुष चून। मनुष्य, पशु, पक्षी सभी को पानी की आवश्यकता होती है। पानी के लिए जहां प्रकृति ने बड़ी-बड़ी नदी, झील, सागर बनाए हैं, वहीं मनुष्य भी अपनी आवश्यकतानुसार पानी के लिए विभिन्न साधन अपनाता रहा है। मनुष्य ने पीने के पानी के लिए जगह-जगह कुएं, बावड़ी, तालाबों का निर्माण करवाया।

जो कुएं कभी लोगों के लिए पानी के स्रोत के साथ आपसी मेलजोल का जरिया हुआ करते थे, वही आज उपेक्षा के शिकार होकर गंदगी के ढेर में तब्दील हो चुके हैं।

राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र में जलाभाव की स्थिति थी। लोगों को दूर-दूर तक पीने का पानी नहीं मिलता था। ऐसी स्थिति में इस क्षेत्र के राजे- रजवाड़ों, साहूकारों ने पीने के पानी के लिए जगह-जगह भव्य कुओं का निर्माण करवाया था तथा इन कुओं पर चार ऊंची-ऊंची मीनारें बनवाई। इन मीनारों से कुओं की सुन्दरता को चार चांद लग जाते थे एवं प्यासा राहगीर दूर से ही मीनारें देखकर पीने के पानी की उपलब्धि का अनुमान सहज में ही लगा लेता था। इन कुओं से पानी निकालने के लिए रस्सी, बाल्टी, लोटे की हर समय व्यवस्था रहती थी। वहीं सर्दी, गर्मी, बरसात से बचने के लिए इस पर छतरियों, कोटरियों का निर्माण भी करवाया जाता था। रात्रि के वक्त भी मुसाफिर यहां बने कमरों में अपना सामान रखकर आराम से रात गुजार लेते थे। इन कुओं पर महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था रहती थी। शेखावाटी क्षेत्र में पानी अक्सर 150 से 200 फीट गहरा होने के कारण कुएं प्राय: दूर- दूर बनाये जाते थे। इन कुओं के मीठे पानी के कारण इनके आसपास लोग बस जाते थे। अब स्थिति यह है कि कुओं की यह कलापूर्ण एवं आकर्षक मीनारें कुएं और उसके निर्माणकर्ता की स्मृति का प्रतीक बन गई है।

शेखावाटी में तो कुओं को देवता के रूप में माना जाता है। पुत्र-रत्न की प्राप्ति के बाद बच्चे की मां जब तक कुएं की पूजा नहीं कर लेती तब तक पवित्र नहीं मानी जाती है। यह परंपरा आज भी बरकरार है। शेखावाटी में पानी बहुत गहरे प्राप्त होता था इसलिए कुओं का निर्माण बहुत धीरे-धीरे उल्टी चिनाई के साथ किया जाता था। कुएं के लिए पहले चार-पांच फीट धरातल की खुदाई होती और नीचे से ऊपर की ओर उसकी चिनाई कर दी जाती थी। इस चिनाई को ऊंधी चिनाई कहते हैं। यहां पर्याप्त मात्रा में चूना मिल जाता था इसलिए छोटी र्इंट या पत्थर के साथ चूने द्वारा चिनाई की जाती थी। कुएं के अंदर लगने वाले पत्थरों का माप-तौल इस प्रकार रखा जाता था कि वे एक दूसरे से चिपके रहते थे। जैसे-जैसे खुदाई नीचे की तरफ बढ़ती वैसे-वैसे काम करना मुश्किल हो जाता था।

जब तक पानी नहीं निकल जाता तब तक खुदाई और चिनाई की प्रक्रिया लगातार चलती रहती थी। हर कुएं के साथ गूण होती थी। गूण वह स्थान है जहां कुएं से पानी निकालने के लिए ऊंट या बैलों को जोड़कर पानी खींचा जाता था, जितना गहरा कुआं होता उतनी ही लंबी उस कुएं की गूण होती। गूण को काफी ढलुवा बनाया जाता जिससे ऊंट या बैलों को चड़स खींचने में सुविधा रहती थी। कुओं पर कोटरियां व छतरियां बनायी जाती थी जो बाहर से आने वाले यात्रियों और आम व्यक्ति के लिए विश्रामगृह के रूप में उपयोग आती थीं। कई कुओं से आस-पास के गांवों से भी लोग पानी भरने आते थे। वे इन्हीं छतरियों के नीचे विश्राम करते थे। बरसात से बचने के लिए भी इन छतरियों का उपयोग किया जाता था। इन कुओं के आस-पास बड़,पीपल, जांटी (खेजड़ी) के छायादार पेड़ होते थे, जिनके नीचे बैठकर आराम किया जा सकता था। यहां के कुओं पर सुबह और शाम बहुत चहल-पहल हुआ करती थी। महिला और पुरुष पानी भरने के लिए बहुतायत में यहां इकट्ठे होते थे। जब तक पानी भरने का सरा (नंबर) आता तब तक आपस में सुख-दुख की बातें करते रहते थे।

पहले ये कुएं सार्वजनिक बातचीत के अड्डे होते थे। लोग आपस में घुलेमिले थे। प्रत्येक कुएं के पास एक बालाजी के मंदिर का निर्माण अवश्य करवाया जाता था तथा प्रत्येक कुएं के पास एक जांटी (खेजड़ी) का पेड़ बालाजी के नाम पर लगाया जाता था जिसे काटा नहीं जाता था। दुर्भाग्य से पानी को सुरक्षित रखने का यह पारंपरिक तरीका खत्म हो चुका है। इन जल स्रोतों की भूमि पर कब्जे हो चुके हैं। जहां कहीं कुएं बचे हैं, वहां उनकी देखभाल नहीं है, जिससे उनकी दुर्दशा हो रही है। जनसंख्या बढ़ने के साथ-साथ कुएं भी पटते गए। एक समय था जब यही कुएं लोगों के लिए जीवन का सहारा थे। इन्ही कुओं ने जाने कितनी पीढ़ियों को पाला-पोसा है। वही कुएं आज गंदगी के ढेर बने हुए हैं। कचरे से सटे पटे हुए हैं।

एक समय था जब हम इनको पूजते थे आज जब इनकी आवश्यकता नहीं रही तो उनको भूल गये हैं। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने रिपोर्ट जारी की है, उसमें दुनिया में सबसे तेज भू जल स्तर शेखावाटी के तीनों जिले सीकर, झुंझुनू, चुरू का गिरने में दुनिया में सबसे आगे हैं। शेखावाटी क्षेत्र के लिए चिंतनीय विषय हैं। इस समस्या का मुकाबला करना पड़ेगा। अभी से ही पीने और खेती के लिए नहर और पाइप लाइन द्वारा पानी लाने की योजना के लिए राज्य सरकार व केंद्र सरकार पर दबाव बनाकर इसका हल निकालना होगा। पेड़ो को बचाना, ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने, ज्यादा से ज्यादा तालाब का निर्माण करवाना जरूरी हैं। आदमी चाहे तो जमीन से पानी निकाल कर पी सकता है और अपनी सुरक्षा के लिए जंगल में मंगल जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। इसी तरह एक किवदंती है झुंझुनू जिले के अलसीसर नामक गांव के बारे में। कभी यहां समीपस्थ गांव नाला में एक जाट परिवार रहा करता था, जिसके परिजनों ने अपनी बहन ‘अलसी’ को कुएं से पानी नहीं भरने दिया तो  दु:खी होकर ‘अलसी’ यहां आकर रहने लगी। ‘अलसी’ ने अपने लिए पानी का कुंआ बनवाया और यहां रहने लगी। एक दिन और एक रात में बनाये गये इस कुएं के कारण जंगल में ऐसा मंगल हुआ कि यहां एक गांव बस गया। जिसका नामकरण ‘अलसी’ के नाम पर अलसीसर हुआ।

अलसीसर के  बाजार के मध्य बने इस कुएं के अतिरिक्त खेजड़ी का एक पुराना वृक्ष भी यहां मौजूद है, जो उस प्यास की कहानी को ताजा करता है। शेखावाटी में भव्य कलात्मक मीनारोंयुक्त कुओं का निर्माण सर्वप्रथम सम्राट शेरशाह सूरी के काल में प्रारंभ हुआ जो अनवरत चौहान, नबाब, राजपूत, अंग्रेजों के काल तक जारी रहा। वर्तमान में मीनारोंयुक्त कुओं का निर्माण बन्द सा हो गया मगर धरोहर के रूप में हमारे पास मौजूद प्राचीन कुओं की समुचित देखभाल व रखरखाव करें तो हमें इन कुओं से सदैव प्रेरणा मिलती रहेगी।

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here