राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देश में अपना कोई मकान नहीं बनाया, लेकिन उन्होंने कई आश्रम जरूर बनाएं। उनके आश्रम स्वतंत्रता आंदोलन के केंद्र बने और समतामूलक समाज रचना की प्रयोगस्थली साबित हुए। उनके आश्रम न भारतीय समाज के घरों जैसे थे और न ही प्राचीन ऋषियों और मुनियों के आश्रम जैसे थे। गांधी के आश्रम सभी धर्मों और जातियों के लिए थे। वहां किसी के साथ भेदभाव नहीं होता था।

साबरमती आश्रम  महात्मा गांधी की मुख्य कार्यस्थली रही है। यह आश्रम स्वतंत्रता आंदोलन का कई मायनों में गवाह भी रहा है।

गांधी के आश्रमों में स्त्री—पुरुष, नौजवान और बुजुर्गों के साथ बच्चे भी रहते थे, लेकिन सभी के लिए कायदे—कानून थे जिनका पालन सभी को हर हाल में करना पड़ता था। जो नियम—कायदे थे वे तत्कालीन भारतीय समाज के सकारात्मक बदलाव लाने वाले थे। उस समय समाज जाति—पांति में बंटा हुआ था। हाथ से काम करना अपमानजनक समझा जाता था। स्त्रियों को न केवल दोयम दर्जे का समझा जाता था बल्कि उनके साथ अमानवीय अत्याचार होते थे। गांधी के आश्रम का समाज इन बुराइयों के उलट था। यहां दलितों का भी सम्मान था और शौचालय आदि की सफाई सभी आश्रमवासियों को करनी पड़ती थी। जूठे बरतनों की सफाई और कपड़ों की धुलाई हर आश्रमवासी खुद करता था। कोई किसी का नौकर या सेवादार नहीं था।

इन आश्रमों में कुछ गांधी के परम भक्त थे, तो कुछ उन पर भीतर ही भीतर संदेह करने वाले भी थे। आश्रम पूरी तरह से प्रयोगशाला थी, जहां रहने वाले पर गांधी अपने नैतिक और आध्यात्मिक धारणाओं का परीक्षण करते थे। आश्रमों में जब कोई गलती होती या कोई आश्रमवासी गंभीर अपराध कर बैठता था, तो सारा दोष गांधीजी अपने सिर ले लेते थे और उपवास कर उसका प्रायश्चित करते थे।

दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश लौटने के बाद गांधीजी ने अहमदाबाद के कोचरब में रहना शुरू किया, लेकिन थोड़े ही दिनों के बाद उन्होंने साबरमती नदी किनारे अपने सिद्धांतों और दर्शनों के आधार पर साबरमती आश्रम की स्थापना की। उन्होंने साबरमती आश्रम के पहले चंपारण में, बाद में सेवाग्राम में अपने आश्रम बनाए। साबरमती आश्रम स्वतंत्रता आंदोलन के केंद्र बना, लेकिन इस आश्रम को बनाने के समय गांधी की तात्कालिक समस्या दक्षिण अफ्रीकी संघर्ष के उन साथियों को बसाने की थी, जिन्होंने अपनी तकदीर उनके साथ जोड़ ली थी।

साबरमती आश्रम भारतीय जनता और नेताओं के लिए बहुत जल्द ही प्रेरणास्रोत बन गया। इस आश्रम में रहते हुए महात्मा गांधी ने भारत के वायसराय को एक पत्र लिखकर सूचित किया कि वे नौ दिनों का सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने जा रहे हैं। इसके बाद उन्होंने आश्रम के 78 लोगों के साथ नमक कानून तोड़ने के लिए ऐतिहासिक दांडी यात्रा की। दांडी यात्रा दुनिया के दस महत्वपूर्ण यात्राओं में मुख्य रूप से जानी जाती है। इस यात्रा के बाद साबरमती आश्रम दुनिया भर के लोगों के लिए केंद्र बिंदु बना। यह भी सच्चाई है कि इसके बाद गांधी ने इस आश्रम का सदा के लिए परित्याग कर दिया। दांडी यात्रा शुरू करने के पहले उन्होंने यह संकल्प जाहिर किया था कि वे अब इस आश्रम में स्वाधीनता के बाद ही लौटेंगे।

इस आश्रम में रहते हुए गांधीजी ने चरखे की तलाश की। इसी के साथ आश्रम में कताई और बुनाई की शुरुआत हुई और चरखे के नवीनीकरण के प्रयास भी शुरू हुए। तब से आज तक चरखे में कई महत्वपूर्ण बदलाव हुए और अब इसके सौ से अधिक स्वरूप विकसित हो चुके हैं। इस आश्रम में विभिन्न धर्मावलंबियों में एकता स्थापित करने, चरखा, खादी और ग्रामोद्योग द्वारा जनता की आर्थिक स्थिति सुधारने और अहिंसक सत्याग्रह के जरिए जनता में स्वतंत्रता की भावना जगाने के लिए अनेक प्रयास किए गए।

सौ साल पुराना साबरमती आश्रम आज भी अहमदाबाद में स्थित है। यहां साल भर में देश-दुनिया से लाखों लोग आते हैं और भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की स्मृति ताजा करते हैं। इस आश्रम में ही गांधी ने खेड़ा किसान सत्याग्रह किया। रॉलेट समिति की सिफारिशों का विरोध करने के लिए इस आश्रम में तत्कालीन राष्ट्रीय नेताओं का एक सम्मेलन किया और सभी उपस्थित लोगों ने प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर किए। इस आश्रम में रहते हुए महात्मा गांधी ने अहमदाबाद की मिलों में हुई हड़ताल का सफल संचालन किया। मिल मालिक और कर्मचारियों के विवाद को सुलझाने के लिए गांधी ने अनशन शुरू कर दिया था। इसके प्रभाव से इक्कीस दिनों से चली आ रही हड़ताल तीन दिनों के अनशन से खत्म हो गई।

साबरमती आश्रम में हृदयकुंज नाम की एक कुटिया है। 1919 से 1930 तक गांधीजी इसी कुटिया में रहे। इसी आश्रम के एक हिस्से में विनोबा-मीरा कुटिया है, जहां 1918 से 1921 तक के दौरान आचार्य विनोबा भावे रहे। गांधी के आदर्शों से प्रभावित ब्रिटिश युवती मेडलीन स्लेड भी 1925 से 1933 तक यहीं रहीं। गांधी ने इनका नाम मीरा रखा था। दांडी यात्रा के बाद शुरू हुए आंदोलन को कुचलने के लिए सरकार ने आंदोलनकारियों की संपत्ति जब्त कर ली। आंदोलनकारियों के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए उन्होंने साबरमती आश्रम ले लेने के लिए कहा, पर सरकार ने ऐसा नहीं किया। बाद में यह निर्णय किया गया कि आश्रम को एक न्यास के अधीन कर दिया जाए। 1951 में साबरमती आश्रम सुरक्षा एवं स्मृति न्यास वजूद में आया। यहां गांधीजी का सामान, पुस्तकें, पांडुलिपियों उस समय का जीवंत उदाहरण है। अब यहां गांधी और स्वतंत्रता आंदोलन पर केंद्रित संग्रहालय भी है, जो लोगों के लिए न केवल जानकारी बल्कि गांधी की अहिंसा को समझने का केंद्र भी है।  

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