Kamrup: People show their acknowledgement receipts after checking their names in a draft for National Register of Citizens (NRC), in Guwahati on Monday. PTI Photo (PTI1_1_2018_000101B)

ब जबकि, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की अंतिम मसौदा सूची उच्चतम न्यायालय के आदेशानुसार 30 जुलाई, 2018 को प्रकाशित होना तय हो चुका है। और, इसको लेकर अलग-अलग स्तर पर क्रिया-प्रतिक्रिया का दौर चल रहा है। ऐसे में सरकार के समक्ष यह बड़ी चुनौती है कि 30 जुलाई को एनआरसी की अंतिम मसौदा सूची प्रकाशित करे। अंतिम मसौदा सूची प्रकाशित होने के बाद व्यापक पैमाने पर राज्य भर में गड़बड़ी फैलने की आशंका है। इस संबंध में खुफिया सूत्रों से जानकारी मिलने के बाद राज्य और केंद्र सरकार पूरी तरह से तत्पर हो गयी है।

उच्चतम न्यायालय में एनआरसी मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस रंजन गोगोई एवं आरएफ नरीमन के नेतृत्व वाली दो सदस्यीय खंडपीठ ने नई तारीख 30 जुलाई तय कर दी।

चार जुलाई, 2018 को इस बाबत केंद्रीय गृह मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों के साथ ही असम की मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक, एनआरसी के समन्वयक प्रतीक हजेला के साथ ही अन्य शीर्ष अधिकारियों की एक बैठक नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्रालय में आयोजित की गई। जिसमें राज्य भर में एहतियात के तौर पर व्यापक पैमाने  पर सुरक्षा बलों की तैनाती करने को लेकर चर्चा हुई। असम के पुलिस महानिदेशक कुलधर सैकिया पहले से ही आशंका जाहिर करते रहे हैं कि एनआरसी की अंतिम मसौदा सूची प्रकाशित होने के बाद राज्य में अनेकों स्थानों पर गड़बड़ी फैल सकती है। जिसके तहत उन्होंने राज्य के कुछ इलाकों को संवेदनशील व अतिसंवेदनशील की श्रेणी में बांटा है। ऐसे इलाकों में भारी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती की गई है।

वैसे तो राज्य भर में ऐसे नागरिकों के बड़ी संख्या है, जिनके संदिग्ध  विदेशी नागरिक होने के संबंध में जांच पड़ताल चल रही है। राज्य के विभिन्न विदेशी न्यायाधिकरणों में वर्ष 2017 के दिसम्बर माह तक एक लाख 99 हजार 659 लोगों के विरुद्ध संदिग्ध विदेशी नागरिक होने के आरोप में मामले लंबित हैं। इन मामलों में से वर्ष 2018 के जून माह तक चुनाव आयोग द्वारा 1,26,520 लोगों को संदिग्ध वोटर यानी डी वोटर की श्रेणी में रखा गया है।

उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय के आदेश के तहत 30 जून को एनआरसी की अंतिम मसौदा सूची को प्रकाशित करना था, लेकिन राज्य में बाढ़ के चलते यह संभव नहीं हो सका। एनआरसी के राज्य समन्वयक प्रतीक हजेला ने उच्चतम न्यायालय में इस बावत आवेदन दाखिल कर नई तारीख तय करने कहा था। 2 जुलाई, 2018 को एनआरसी के प्रकाशन की नई तारीख तय करने के लिए उच्चतम न्यायालय एनआरसी मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस रंजन गोगोई एवं आरएफ नरीमन के नेतृत्व वाली दो सदस्यीय खंडपीठ ने नई तारीख 30 जुलाई तय कर दी। सुनवाई के दौरान देश के महापंजीयक ने हलफनामा दायर कर कहा कि बीते 31 दिसम्बर, 2017 को प्रकाशित एनआरसी की पहली मसौदा सूची में भूलवश 1 लाख 35 हजार विदेशी नागरिकों के नाम शामिल हो गए थे। उच्चतम न्यायालय ने जहां ऐसे विदेशी नागरिकों के नाम सूची से हटाने का आदेश दिया, वहीं सरकार से यह भी सुनिश्चित करवाने को कहा कि किसी भी संदिग्ध वोटर का नाम एनआरसी की अंतिम मसौदा सूची में शामिल नहीं होना चाहिए।

वहीं राज्य की बराक घाटी में उच्चतम न्यायालय द्वारा 30 जुलाई को एनआरसी की अंतिम मसौदा सूची प्रकाशित किए जाने संबंधी आदेश आने के बाद कई स्तर पर विशेष तत्परता देखी जा रही है। राज्य की पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे सिद्देक अहमद समेत अन्य कई नेताओं एवं सामाजिक संगठनों के नेतृत्व में लोगों को लामबंद किया जा रहा है। तीन जुलाई को असम की बराक घाटी के कछार जिला मुख्यालय सिलचर में एक विशाल सभा का आयोजन किया गया। जिसमें असम समझौता को बंगाली विरोधी करार देते हुए उच्चतम न्यायालय के आदेशों पर सवालिया निशान लगा दिए गए। इसमें कहा गया कि उच्चतम न्यायालय के आदेशों की आड़ में असम सरकार जिस प्रकार से इस सिलसिले में एक पक्ष के हितों की अनदेखी कर रही है, उसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। रैली के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए कहा गया कि असम में जन्म प्रमाण-पत्र देने की व्यवस्था सन 1983 से की गई। इससे पहले इस प्रमाण-पत्र की कोई व्यवस्था नहीं थी। ऐसे में 24 मार्च, 1971 से पहले का प्रमाण-पत्र कोई कहां से दे पाएगा। साथ ही 24 मार्च, 1971 के बाद आए लोगों को भी 10 साल तक वोटिंग के अधिकार से वंचित रखकर मानवीय आधार पर नागरिकता दी जानी चाहिए। साथ ही कहा गया कि प्रतिबंधित संगठन उल्फा नेता जितेन दत्त जिस प्रकार बराक घाटी के लोगों के लिए धमकी भरे अल्फाज का व्यवहार कर रहे हैं, ऐसा कुछ बराक घाटी में उनका चलने वाला नहीं है। सम्मेलन में सीधी धमकी दी गई कि अगर सरकार बंगालियों के साथ इसी प्रकार का भेदभाव पूर्ण रवैया अपनाती रही तो बराक घाटी के लोग चुप नहीं बैठेंगे। पहले चरण में शांतिपूर्ण कैंडल मार्च, उसके बाद जेल भरो आंदोलन, उसके बाद जिस स्तर तक जाना होगा वहां तक जाएंगे। क्योंकि यदि इस वक्त वे चुप रहे तो असम में बंगालियों की वही स्थिति होने जा रही है, जो म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों की है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो एनआरसी को लेकर राज्य के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरह से बातें की जा रही हैं। सभी पक्ष अपनी-अपनी ओर से इस प्रयास में लगे हैं कि उनके अनुकूल एनआरसी की अंतिम मसौदा सूची प्रकाशित हो। ऐसे में सरकार के सामने यही विकल्प बचता है कि न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए 30 जुलाई को अंतिम मसौदा सूची प्रकाशित करे। चाहे इसके लिए जितने ही सुरक्षा बल क्यों ना तैनात करना पड़े। सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि इस मसौदा सूची में किसी भी विदेशी नागरिक का नाम शामिल ना हो। साथ ही किसी भी भारतीय नागरिक को इससे वंचित ना किया जाए। तभी जाकर सही मायने में एनआरसी उद्देश्यपरक हो सकेगा और इसकी विश्वसनीयता बरकरार रहेगी।

संदिग्ध मतदाता कौन?

जब कभी भी संदिग्ध मतदाता यानि डी वोटर की बात आती है तो सबसे पहले यह सवाल खड़ा हो उठता है कि आखिर संदिग्ध मतदाता है कौन। और, इसका निर्णय कैसे किया जाए। इस संदर्भ में बंगाईगांव-चिरांग जिले के विदेशी न्यायाधिकरण के न्यायाधीश विकास कुमार ने हिन्दुस्थान समाचार के गुवाहाटी ब्यूरो प्रमुख अरविंद कुमार राय से बातचीत करते हुए कही कि विदेशी न्यायाधिकरण के समक्ष विदेशी नागरिकों के संबंध में दो तरह के मामले चल रहे हैं। जिनमें एक तो अवैध माइग्रेंट (डिटरमिनेशन बाई ट्रिब्यूनल) एक्ट-1983 द्वारा घोषित किए गए संदिग्ध मतदाता हैं। दूसरा 24 मार्च, 1971 के बाद असम में अवैध रूप से प्रवेश करने वाले विदेशी हैं। न्यायालय में मामला पहुंचने से पहले चार स्तरों पर इनकी जांच करने का प्रावधान है। पहले स्तर पर लोकल वेरिफिकेशन आॅफिसर (एलवीओ) होते हैं। जो स्थानीय स्तर पर जाकर संबंधित व्यक्ति के विषय में जानकारी एकत्र करके अपनी रिपोर्ट इलेक्शन रिटर्निंग आॅफिसर (ईआरओ) को सौंपते हैं। ईआरओ द्वारा अपने स्तर पर जांच कर उन्हें डी वोटर घोषित कर मामले की जांच के लिए बार्डर पुलिस को रेफर कर दिया जाता है। बॉर्डर पुलिस अधीक्षक ही इस मामले की रेफरिंग अथॉरिटी हैं। बार्डर पुलिस अधीक्षक संदिग्ध विदेशी नागरिक के संदर्भ में रिपोर्ट तैयार करके विदेशी न्यायाधिकरण की अदालत में पेश करते हैं।

विदेशी न्यायाधिकरण द्वारा इस संबंध में दो तरह के निर्णय सुनाए जाते हैं। जिसमें पहला सन 1966 से 24 मार्च, 1971 के बीच अवैध रूप से भारत में घुसे घुसपैठियों को डिपोर्टेशन सेंटर में भेजा जाता है। जबकि दूसरे निर्णय में फेरो के तहत दस साल तक संदिग्ध नागरिकों को आॅब्जरवेशन में रखा जाता है। यदि इस दौरान उसका चाल-चलन ठीक पाया गया तो उसे भारत की नागरिकता दे दी जाती है।

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