फाइनेंशल एक्शन टास्क फोर्स यानी एफएटीएफ द्वारा पाकिस्तान को ग्रे यानी संदिग्धों की सूची में डाले जाने के बाद चीन को छोड़कर कोई देश उसके साथ नहीं आया। इससे पता चलता है कि दुनिया में पाकिस्तान की कैसी छवि है। वस्तुत: एफएटीएफ ने यह कदम इसलिए उठाया है क्योंकि पाकिस्तान उसके सामने इस बात का विश्वसनीय साक्ष्य नहीं दे पाया कि उसने अपने देश में आतंकवाद का वित्तपोषण रोकने के लिए पर्याप्त कदम उठाए हैं। पाकिस्तान का इस पर बौखलाना स्वाभाविक है। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने कहा कि यह राजनीति से प्रेरित फैसला है और इसका आतंक के खिलाफ पाकिस्तान की कार्रवाई से कोई लेना-देना नहीं है। पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहम्मद आजम ने कहा कि एफएटीएफ पर अमेरिका और भारत का अत्यधिक दबाव है। इन देशों ने चीन और सऊदी अरब पर भी दबाव डाला कि वह पाकिस्तान की मदद न करें और न ही इस मामले में कोई हस्तक्षेप करें। पाकिस्तान की इन प्रतिक्रियाओं का मतलब यही है कि उसे इन देशों के सहयोग से बच जाने की उम्मीद थी जो पूरी नहीं हुई। हालांकि चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लू कांग ने एफएटीएफ के फैसले के बाद कहा कि आतंकवाद से निपटने में पाकिस्तान के प्रयासों की अनदेखी नहीं की जा सकती है। उनके अनुसार आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान ने सदैव अंतरराष्ट्रीय समुदाय का साथ दिया है। हाल के वर्षों में पाकिस्तान ने आतंकवादी वित्त पोषण को रोकने में सक्रिय पहल की है और इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति भी हुई है। आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान की सरकार और जनता दोनों ने बलिदान दिया है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को उस पर भरोसा करना चाहिए।

द फाइनेंशल एक्शन टास्क फोर्स द्वारा पाकिस्तान काली सूची में जाने से बच गया है किंतु ग्रे सूची में जाने से अपने को बचा नहीं पाया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान के लिए यह एक जबरदस्त झटका है। पाकिस्तान का ग्रे सूची में डाला जाना भारत की स्पष्ट कूटनीतिक सफलता है।

चीन के इस बयान से पाकिस्तान को राहत मिल सकती है, क्योंकि एक बड़ा देश तो उसके साथ खड़ा है। हालांकि इसके पीछे भी चीन का अपना स्वार्थ ज्यादा है। वह जिस तरह पाकिस्तान में निवेश कर रहा है उसमें वह उसके खिलाफ नहीं जा सकता है। किंतु तत्काल इससे स्थिति में कोई अंतर नहीं आने वाला। एफएटीएफ पेरिस स्थित अंतर सरकारी संस्था है जिसका गठन 1989 में किया गया था। इसका काम गैर-कानूनी आर्थिक मदद को रोकने के लिए नियम बनाना है। यह आतंकवादी वित्त पोषण को रोकने के लिए काम नहीं करने वाले उच्च खतरे वाले देशों की सूची तैयार करता है। एफएटीएफ की ग्रे या काली सूची में डाले जाने का मुख्य प्रभाव संबंधित देश की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है। हालांकि पाकिस्तान काली सूची में जाने से बच गया है किंतु ग्रे सूची में आना ही सामान्य झटका नहीं है।

पाकिस्तान के खिलाफ यह प्रक्रिया फरवरी 2018 में शुरू हुई थी, जब एफएटीएफ ने अपने अंतरराष्ट्रीय सहयोग समीक्षा समूह के तहत निगरानी के लिए पाकिस्तान के नामांकन को मंजूरी दी थी। इसे ही ग्रे सूची के नाम से जाना जाता है। पाकिस्तान ने जितना संभव था उतना कूटनीतिक प्रयास किया, ताकि किसी तरह 37 सदस्य देशों वाली यह संस्था उसके खिलाफ फैसला न करे। पाकिस्तान की ओर से 15 महीनों की एक कार्ययोजना रखी गई और बताया गया कि उसके यहां मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवादियों को मिलने वाले धन का रास्ता बंद करने के क्या उपाय किए गए हैं। ध्यान रखिए एफएटीएफ ने पाकिस्तान को 26 सूत्री कार्ययोजना सौंपी थी। उसमें साफ कहा गया था कि अगर वह इसे अमल में लाने का विश्वास दिला देता है तो कार्रवाई से बच सकता है। जाहिर है, वह ऐसा विश्वास दिलाने में सफल नहीं रहा। आज की स्थिति मेंं कहा जा सकता है कि एफएटीएफ जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था ने दुनिया को यह संदेश दे दिया है कि पाकिस्तान में आतंकवादियों को वित्तीय सहायता मिलती है तथा वहां हवाला कारोबार भी होता है।

पाकिस्तान को यहां तक पहुंचाने में भारत की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 2015 में इस सूची से पाकिस्तान को निकाले जाने के बाद से ही भारत सक्रिय हो गया था। भारत ने अक्टूबर 2016 में एफएटीएफ में पाकिस्तान में आतंकवादी संगठनों को मिल रही वित्तीय सहायता का मुद्दा पूरे प्रभावी ढंग से उठाया था। भारत ने कहा था कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठनों की सूची में डाले गए लश्कर ए तैयबा, जमात उद दावा और जैश ए मोहम्मद के आतंकवादी पाकिस्तान में खुलेआम घूम रहे हैं और आतंकवादी हमलों के लिए धन इकट्ठा कर रहे हैं। इसके समर्थन में भारत ने कई ऐसे दस्तावेज प्रस्तुत किए थे जो विश्वसनीय थे। भारत के आरोपों को गंभीरता से लेते हुए ही एफएटीएफ ने इसकी जांच का फैसला किया और एशिया पैसिफिक ग्रुप को इस पर तीन महीने के भीतर रिपोर्ट देने को कहा। एशिया पैसिफिक ग्रुप के सदस्यों को पाकिस्तान प्रभावित करने में सफल रहा और रिपोर्ट ही तैयार नहीं होने दी। भारत को इसका अंदाजा था। उसने मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित कराने में सफलता न मिलने से सबक सीखा था। भारत को पता था कि चीन प्रत्यक्ष तथा उसके प्रभाव में एकाध और देश पाकिस्तान को बचाने की पूरी कोशिश करेंगे। इसलिए उसने पूरा कूटनीतिक प्रयास करके अनेक देशों से इस मामले में बातचीत की। अमेरिका और यूरोपीय देश तो इसमें शामिल थे ही। सउदी अरब तक को समझाने में भी भारत सफल रहा। उसने अपना प्रयास जारी रखा।  फरवरी 2017 में एफएटीएफ की बैठक हुई तो उसमें भारत ने फिर यह मुद्दा उठाया। पाकिस्तान की ओर से इसका तीखा विरोध हुआ, पर भारत फिर दस्तावेजों के साथ था। पाकिस्तान की कोशिश थी कि इस मुद्दे को तकनीकी पहलुओं में उलझा दिया जाए। लेकिन अमेरिका और यूरोपीय देश भारत के साथ खड़े हुए और पाकिस्तान अपनी रणनीति में सफल नहीं हो सका।

इस तरह कहा जा सकता है कि पाकिस्तान को ग्रे सूची में डाला जाना भारत की स्पष्ट कूटनीतिक सफलता है। अभी ऐसा लगता है कि पाकिस्तान एक वर्ष या उससे ज्यादा समय तक इस सूची में रहेगा। हालांकि इससे पहले वर्ष 2012 से 2015 तक वह ग्रे सूची में रहा था। 2012 से लगातार प्रयास के बाद भी उसे तीन वर्ष इससे बाहर आने में लगे थे। वह इस सूची में जितने दिन भी रहेगा उसकी चरमराती अर्थव्यवस्था के लिए यह बहुत बड़ा धक्का साबित होगा। आर्थिक दुनिया में उसकी विश्वसनीयता काफी नीचे आ जाएगी। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक, एशियन डेवलमेंट बैंक जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन पाकिस्तान की रेटिंग गिरा सकते हैं। मूडीज, एस एंड पी और फिच द्वारा रेटिंग कम किए जाने का भी खतरा है। इससे पाकिस्तानी शेयर बाजार गिरेगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार से पाकिस्तान के लिए धन पाना मुश्किल हो जाएगा। अगर उसे मदद मिलेगी भी तो भी कड़ी जांच प्रक्रिया से गुजरना होगा। पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय बाजारों से कर्ज ऊंचे ब्याज दर पर मिलेंगे। विदेशी लेनदेन में कमी आ सकती है और देश में विदेशी मुद्रा का आगमन कम हो सकता है। आर्थिक संस्थान पाकिस्तानी बैंकों के साथ वित्तीय लेनदेन करने से बचेंगे और कुछ हमेशा के लिए लेनदेन बंद भी कर सकते हैं। विदेशी निवेशकों और कंपनियों के लिए पाकिस्तान में व्यापार करना मुश्किल होगा। अगर सूची में वह ज्यादा समय तक रहा तो पाकिस्तान में सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय बैंक स्टैंडर्ड चार्टर्ड अपनी सभी शाखाएं बंद कर सकता है।  स्टैंडर्ड चार्टर्ड की पाकिस्तान में 116 शाखाएं हैं। सिटी बैंक और डॉयचे बैंक भी पाकिस्तान से वापसी का फैसला ले सकते हैं। इससे उसकी अर्थव्यवस्था हिल सकती है।

हालांकि पाकिस्तान के घटते विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने के लिए चीन ने 1 अरब डॉलर की आर्थिक मदद दी है। किंतु यह पर्याप्त नहीं है। मई 2017 में पाकिस्तान के पास 16.4 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार था। इस समय करीब 1.2 अरब डॉलर बच गया है जो कि सिर्फ 2 महीने के आयात के बाद खत्म हो जाएगा।  पाकिस्तान सरकार ने संयुक्त अरब अमीरात के तीन बैंकों से 20 करोड़ डॉलर के कर्ज की मांग की है। एक साल के लिए मांगा गया यह कर्ज बैंक आॅफ दुबई, अमीरात एनबीडी और नूर बैंक देने वाले थे। अब वे क्या करेंगे कहना कठिन है। चीन की मदद पाकिस्तान के लिए पर्याप्त नहीं है और 25 जुलाई को देश के आम चुनावों के बाद आने वाली सरकार को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से दूसरा बेलआउट पैकेज लेना पड़ेगा। इससे पहले 2013 में पाकिस्तान को बेलआउट पैकेज लेना पड़ा था। किंतु मुद्राकोष के लिए भी संदिग्धों की सूची में डाले गए देश को आसानी से मदद करना संभव नहीं होगा।

तो ग्रे सूची में डाले जाने के बाद पाकिस्तान बुरी तरह घिर गया है। अगर उसकी अर्थव्यवस्था भड़भड़ा गई तो फिर संभलना मुश्किल है। यह बहुत बड़ी मार है। चीन भी उसके यहां जो निवेश कर रहा है वह सब कर्ज ही है। कहने का तात्पर्य यह कि ग्रे सूची उसके संकट के समय बड़े आघात के रूप में सामने आया है। भारत का यह पूरा प्रयास होगा कि जल्दी उसे इससे मुक्ति न मिले तथा वह आंतकवादी समूहों के खिलाफ कठोर कार्रवाई के लिए मजबूर हो। यही दुनिया के हित में भी है।

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