मकालीन राजनीति और राजनेताओं पर फिल्में बनाने के मामले में हिंदी सिनेमा समेत भारतीय फिल्म उद्योग का रिकॉर्ड बेहद निराशाजनक रहा है। कानूनी पचड़ों का डर तथा दर्शकों के राजनीतिक रुझान के कारण सिनेमा से जुड़े लोग सीधेतौर पर सियासी हिसाब-किताब से परहेज करना चाहते हैं। इस परिपाटी को तोड़ने में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पर बन रही फिल्म अहम योगदान दे सकती है। इसके साथ एक खास बात यह भी है कि फिल्म डॉ. सिंह के मीडिया सलाहकार रहे वरिष्ठ पत्रकार संजय बारू की किताब ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ पर आधारित है। फिल्म का नाम भी किताब के नाम पर ही रखा गया है।

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर बन रही फिल्म को लेकर लोगों में जबरदस्त उत्सुकता देखी जा रही है। यह संयोग या चुनावी वर्ष का प्रभाव भी हो सकता है कि इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी के जीवन को भी पर्दे पर लाया जा रहा है।

नवोदित निर्देशक विजय रत्नाकर गुट्टे द्वारा निर्देशित इस फिल्म में पूर्व प्रधानमंत्री का किरदार अभिनेता अनुपम खेर निभा रहे हैं। उनके साथ दिव्या सेठ, अक्षय खन्ना, अजीत, अहाना कुमरा, अर्जुन माथुर, राम अवतार भारद्वाज, सुजैन बर्नर्ट आदि विभिन्न भूमिकाओं में हैं। इस साल दिसंबर के तीसरे हफ्ते में फिल्म के प्रदर्शित होने की उम्मीद की जा रही है। आज की राजनीति के एक खास अध्याय पर फिल्म बनाना गुट्टे के लिए आसान काम नहीं होगा। खबरिया चैनलों की बाढ़, अखबार-पत्रिकाओं की बड़ी संख्या, सोशल मीडिया का विस्तार तथा राजनीतिक पार्टियों के आॅनलाइन-आॅफलाइन मीडिया युद्ध के हमारे दौर में न सिर्फ छोटी-बड़ी खबरें लगातार बरस रही हैं, बल्कि उन खबरों के अलग-अलग माहौल और विश्लेषण भी हम तक पहुंच रहे हैं। ऐसे में वाजपेयी, मनमोहन सिंह, नरेंद्र मोदी, सोनिया गांधी या राहुल गांधी जैसे बड़े नेताओं की कई छवियां लोगों के मन में हैं। उन छवियों के साथ संजय बारू और विजय गुट्टे की छवि के सामंजस्य और विरोधाभास पर फिल्म की कामयाबी निर्भर करेगी।

असली किरदारों और घटनाओं पर बनने वाली फिल्मों की एक चुनौती यह भी होती है कि वे उन प्रकरणों का कैसे चुनाव करें, जिनसे कहानी का पूरा ढांचा तय हो। यदि किसी ऐतिहासिक व्यक्ति के जीवन पर फिल्म बनानी हो, चुनाव आसान हो जाता है, पर एक कालखंड को आधार बनाकर कथा कहना टेढ़ी खीर होता है। पिछले साल आयी मधुर भंडारकर की इंदु सरकार इसका एक बड़ा उदाहरण है। आपातकाल जैसा आधार होने के बावजूद, जिसके बारे में हर तरह के विवरण तथा उस दौर में सक्रिय हिस्सेदारी कर चुके लोग भी मौजूद हों, वह एक कमजोर फिल्म साबित हुई। दर्शकों ने भी उसे करीब-करीब नाकार दिया था।  संजय बारू मई, 2004 से अगस्त, 2008 के बीच प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार रहे थे। यह यूपीए सरकार का पहला कार्यकाल था। बारू ने अपनी किताब में लिखा है कि डॉ. मनमोहन सिंह सरकार पर कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी का पूरा नियंत्रण था। प्रधानमंत्री कार्यालय में भी उनका दखल था। जब 2014 में किताब छपी थी, तो इसे मनमोहन सिंह के कार्यालय ने कपोल-कल्पना कहते हुए खारिज कर दिया था। हालांकि बारू का दावा है कि उन्होंने जो देखा और अनुभव किया था, उसे ही बयान किया है। उनका यह भी कहना है कि किताब डॉ. सिंह की भलमनसाहत को भी बखूबी रेखांकित करती है। बहरहाल, मनमोहन-सोनिया प्रकरण पर इस किताब से पहले और बाद में बहुत चर्चा हो चुकी है। अब यह देखना है कि बारू की दास्तान किताब के पन्नों से सिनेमा के परदे पर किस तरह से उतरती है।

इस साल पत्रकार सागरिका घोष लिखित पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के जीवन पर आधारित टेलीविजन सीरिज और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर एक फिल्म इस साल आने वाली हैं। विद्या बालन जहां श्रीमती गांधी के रूप में नजर आयेंगी, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका अभिनेता और सांसद परेश रावल निभा रहे हैं। इस फिल्म का संबंध 2019 के चुनाव से जोड़कर भी देखा जा रहा है। मौजूदा सरकार अपने कार्यकाल के आखिरी साल में है, यानी यह चुनावी साल है। ऐसे में इस तरह के निष्कर्ष खारिज नहीं किये जा सकते हैं। अनुपम खेर मंजे हुए अभिनेता हैं और वे भाजपा समर्थक भी हैं। अपने साक्षात्कारों में उन्होंने बार-बार यह भरोसा दिलाया है कि किरदार निभाते हुए उनके सामने सिर्फ कलात्मक पक्ष रहा है। दूसरी फिल्म में प्रधानमंत्री मोदी की भूमिका निभा रहे परेश रावल ने तो यहां तक कह दिया है कि सिर्फ वे ही यह भूमिका कर सकते हैं क्योंकि वे प्रधानमंत्री को प्रेम करते हैं। तो, चुनावी मैदान के अलावा परदे पर भी राजनीति के रंग देखने के लिए तैयार रहें।  

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