विकास के दम पर भारतीय अर्थव्यवस्था ऊंची उड़ान भर रही है। विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत फ्रांस को पछाड़कर दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन गया है। लेकिन, विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन का कहना है कि भारत 2014 से ही गलत दिशा में जा रहा है। उनका ये भी कहना है कि चीजें बहुत बुरी तरह खराब हुई हैं और हम तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था में पीछे की तरफ जा रहे हैं। अमर्त्य सेन दुनिया के जाने-माने अर्थशास्त्री हैं। उन्हें यह भी पता है कि भारत की अर्थव्यवस्था काफी तेजी से आगे बढ़ रही है। इसके बावजूद अगर वे कहते हैं कि भारत तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था में पीछे की तरफ जा रहा है, तो इस पर विचार करना जरूरी है। अमर्त्य सेन का ये भी कहना है कि सरकार ने समानता एवं जाति व्यवस्था के मुद्दों की अनदेखी कर रखी है और निम्न तबके के लोगों को हाशिये पर रखा जा रहा है। उनका मानना है कि भारत आर्थिक वृद्धि दर की सीढ़ियों पर तो तेजी से चढ़ता गया है, लेकिन जीवन स्तर के सामाजिक संकेतकों के पैमाने पर पिछड़ गया है। इसके साथ ही पहले की सरकारों के मुकाबले मोदी सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कोई खास कदम नहीं उठाये हैं। एक अर्थशास्त्री के रूप में अमर्त्य सेन का जितना बड़ा कद है, उसके हिसाब से ये कोई मामूली टिप्पणी नहीं है। अमर्त्य सेन भी मानते हैं कि देश की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है, अर्थव्यवस्था का लगातार विस्तार हुआ है। इसके बावजूद उनका यह कहना कि देश अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में पीछे की तरफ जा रहा है, कई सवाल खड़े करता है।

प्रख्यात अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन का कहना है कि भारत की अर्थव्यवस्था पीछे की ओर जा रही है। दूसरी ओर विश्व बैंक की रिपोर्ट में भारत को सबसे तेज गति से विकास करने वाली अर्थव्यवस्था बताया गया है। आखिर ये विरोधाभास क्यों है?

जीवनस्तर पर कितना असर

दिल्ली स्कूल आॅफ इकोनॉमिक्स की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मौसुमी दास का मानना है कि 1990 के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था ने जीडीपी में वृद्धि के लिहाज से काफी प्रगति की है। गुलामी के कारण जो देश सदियों तक निम्न आय अर्थव्यवस्था के रूप में गतिरोध का शिकार बना रहा और आजादी के बाद भी कई दशकों तक काफी धीमी रफ्तार से बढ़ा, उसके लिए अर्थव्यवस्था का सुदृढ़ीकरण काफी बड़ी उपलब्धि है। लेकिन, ऊंची और टिकाऊ वृद्धि दर को हासिल करने में सफलता अंतत: इसी बात पर आंकी जायेगी कि इस आर्थिक वृद्धि का लोगों के जीवनस्तर पर क्या असर पड़ा है।

भारत में आर्थिक वृद्धि और सामाजिक प्रगति के बीच गहरा संबंध है। उसका गहन विश्लेषण अभी तक ढंग से नहीं किया गया है। जीवन स्तर में सुधार तथा उसकी बेहतरी की दिशा में प्रगति और अंतत: आर्थिक वृद्धि भी इसी बात पर निर्भर है। डॉ. मौसुमी का कहना है कि अमर्त्य सेन जिस वैचारिक धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, उसमें सामाजिकता की महत्ता सबसे अधिक है। समग्र आर्थिक प्रगति को उस धारा के तहत पूंजीवाद का प्रतीक माना जाता है। ऐसा समझा जाता है कि सामाजिक अर्थव्यवस्था में सुधार होना सबसे जरूरी है। यह सही है कि किसी भी देश की खुशहाली के लिए सामाजिक अर्थव्यवस्था का सुदृढ़ होना सबसे जरूरी है, लेकिन यह भी एक सत्य है कि सामाजिक अर्थव्यवस्था तभी सुदृढ़ हो सकेगी जब देश की अर्थव्यवस्था समग्र रूप से मजबूत हो सके।

सब्सिडी मुक्त व्यवस्था की ओर

इसी तरह इसी संस्थान की प्रोफेसर डॉ. अश्विनी देशपांडे का कहना है कि 1990 के पहले तक देश में आर्थिक जकड़न का दौर था। निश्चित रूप से उसके पीछे सामाजिक अर्थव्यवस्था के प्रति समग्र दृष्टिकोण एक बड़ी वजह थी। लेकिन, उदारीकरण के दौर में इससे बाहर निकलने की कोशिश शुरू हुई और इसी कारण धीरे-धीरे सब्सिडी में कटौती करने की कोशिश की जाने लगी। पहले की व्यवस्था निश्चित रूप से देश की जनता को सब्सिडी पर निर्भर कराने वाली थी, लेकिन आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद से सरकार का ध्यान सब्सिडी कम करने पर ज्यादा रहा। मोदी सरकार बनने के बाद इस बात पर ज्यादा जोर दिया गया कि लोग खुद इतने सक्षम हो सकें कि उन्हें सब्सिडी की जरूरत ही न पड़े।

जहां तक बात सामाजिक अर्थव्यवस्था और देश की समग्र विकासमूलक अर्थव्यवस्था की है, तो दोनों का मूल उद्देश्य अंतत: देश की खुशहाली में ही निहित है। लेकिन, परेशानी तब होती है, जब भिन्न वैचारिक धारा का प्रतिनिधित्व करने की वजह से सामाजिक अर्थव्यवस्था और देश की समग्र अर्थव्यवस्था को एक दूसरे के समानांतर खड़ा करने की कोशिश की जाती है। ये दोनों ही अर्थव्यवस्था की अलग-अलग धाराएं जरूर हैं, लेकिन दोनों ही एक दूसरे पर निर्भर भी हैं। स्वतंत्र रूप से सामाजिक अर्थव्यवस्था का भी कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि जब तक देश की संपूर्ण अर्थव्यवस्था में अपेक्षित सुधार नहीं होगा तब तक सामाजिक स्तर पर खुशहाली नहीं लायी जा सकेगी। इसी तरह देश की समग्र अर्थव्यवस्था अगर सुधर भी गयी और उसका लाभ समाज के हर तबके को नहीं मिल सका, तो वह भी अर्थहीन होगा। विडंबना यह है कि अमर्त्य सेन की धारा सिर्फ सामाजिक अर्थव्यवस्था पर ही केंद्रित है। इसी कारण उन्हें विश्व रैंकिंग में भारत की जोरदार उछाल के बावजूद अपेक्षित प्रगति नजर नहीं आती।

आंकड़े और दावे में अंतर

इसी तरह संस्थान की एक अन्य प्रोफेसर डॉ. जेवी मीनाक्षी का कहना है कि अमर्त्य सेन शिक्षा और स्वास्थ्य को सामाजिक अर्थव्यवस्था के प्रमुख बिंदुओं से जोड़ते हैं। उनका यह भी दावा है कि 2014 के बाद से ही इन दोनों क्षेत्रों की भारत में उपेक्षा की जाने लगी, लेकिन आंकड़े कुछ और ही बात कहते हैं। 2014 के पहले तक देश के मेडिकल कॉलेजों में कुल 54,348 सीटें थी। अगले तीन सालों में 2017 तक ये बढ़कर 67,218 हो गईं। स्पष्ट है कि तीन साल में स्वास्थ्य शिक्षा के क्षेत्र में 12,870 सीटों की वृद्धि हुई। यह 2014 की तुलना में 23.68 फीसदी अधिक है। अत: अमर्त्य सेन का ये कहना ठीक नहीं है कि भारत में स्वास्थ्य के क्षेत्र में ज्यादा काम नहीं हुआ है। भारत में 31 मार्च 2017 तक कुल 10,22,859 एलोपैथिक चिकित्सक रजिस्टर्ड थे। इनमें भी सिर्फ 1,10,000 चिकित्सक ही सार्वजनिक क्षेत्र में कार्यरत थे, शेष निजी क्षेत्र में कार्यरत हैं, जिनतक देश की गरीब आबादी का पहुंच पाना काफी कठिन है। डब्लूएचओ के मुताबिक भारत में 1681 की आबादी पर एक चिकित्सक है। जबकि मानकों के मुताबिक एक हजार आबादी पर न्यूनतम एक चिकित्सक होना चाहिए। निश्चित रूप से भारत इस मामले में काफी पीछे है। लेकिन, 2014 के बाद से इस दिशा में काफी काम हुआ है और स्नातक होने वाले चिकित्सकों की संख्या में 23.68 फीसदी की बढ़ोतरी इसका स्पष्ट संकेत देती है। इसलिए अमर्त्य सेन का यह कहना कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में अपेक्षित काम नहीं हुआ है, पूरी तरह सही नहीं माना जा सकता।

शिक्षा क्षेत्र में पिछड़ी सरकार

संस्थान के प्रोफेसर डॉ. एससी पांडा के शिक्षा के क्षेत्र में मोदी सरकार को पिछड़ा बताते हुए अमत्ये सेन का समर्थन करते हैं। उदाहरण के रूप में कस्तूरीरंगन समिति का उल्लेख करते हुए डॉ. पांडा कहते हैं कि  समिति का कार्यकाल एक बार फिर बढ़ाकर 31 अगस्त तक कर दिया गया है। यह समिति नई शिक्षा नीति का प्रारूप लाने के लिए गठित की गयी थी। लेकिन, अब मोदी सरकार के मौजूदा कार्यकाल में इस समिति की रिपोर्ट के आधार पर नयी शिक्षा नीति लागू हो पायेगी, इसकी संभावना काफी कम हो गयी है। क्योंकि, अभी तो 31 अगस्त के बाद ही नई शिक्षा नीति का प्रारूप आ सकेगा। उसके बाद उस प्रारूप पर चर्चा होगी और चर्चा होने के बाद इसे क्रियान्वित किया जा सकेगा, लेकिन तब तक मौजूदा केंद्र सरकार का कार्यकाल समाप्त हो चुका होगा। विडंबना यह है कि नयी शिक्षा नीति को लागू करने की बात बीजेपी के घोषणापत्र में थी, इसके बावजूद उसे समय से तैयार नहीं किया जा सका। इसके पहले सुब्रमण्यम समिति की ओर से तैयार की गयी नयी शिक्षा नीति के प्रारूप को भी सरकार ने स्वीकार नहीं किया था। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि शिक्षा के ढांचे में व्यापक परिवर्तन की जरूरत है। वर्तमान समय में जो शिक्षा नीति अमल में लायी जा रही है, वो 1986 में तैयार की गयी थी। इसलिए यदि आज अमर्त्य सेन शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ने की बात कह रहे हैं, तो इसे गलत नहीं कहा जा सकता है। लेकिन, समग्रता के लिहाज से देखा जाये तो पिछले तीन वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में पुरानी नीति के तहत ही काफी सुधार करने की कोशिश की गयी है। अत: यह नहीं कहा जा सकता है कि मौजूदा सरकार ने इसकी उपेक्षा की है। बहरहाल, अमर्त्य सेन जिस वैचारिक सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं, उसके मुताबिक उनकी अपनी सोच हो सकती है कि ये सरकार गलत दिशा में जा रही है। लेकिन, सामाजिक अर्थव्यवस्था के साथ ही समग्र विकासमूलक अर्थव्यवस्था की चाल यही बताती है कि देश एक ठोस रास्ते पर बढ़ रहा है। हां, इसके कई क्षेत्रों पर ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है, ताकि अर्थव्यवस्था की रफ्तार मंद न पड़ जाये।  

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विनय के पाठक
रांची विश्वविद्यालय से स्नातक। वर्ष 1988 में रांची में ही फील्ड रिपोर्टर के रूप में रांची एक्सप्रेस से जुड़े। उसके बाद साप्ताहिक रविवार, प्रभात खबर, सेंटिनल, पांचजन्य, राजस्थान पत्रिका, टेलीग्राफ, इकोनॉमिक्स टाइम्स, अमर उजाला, बीएजी फिल्म्स, न्यूज 24, इंडिया टीवी, जी न्यूज जैसी संस्थाओं के लिए उप संपादक से लेकर विशेष संवाददाता, सहायक फीचर एडिटर, समन्वय संपादक, एक्जक्यूटिव प्रोड्यूसर जैसे पदों पर कार्य कर चुके हैं। टीवी की दुनिया में ‘पोलखोल’ और ‘सनसनी’ जैसे कार्यक्रमों का भी प्रोडक्शन किया है।

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