ल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने दारुल कज़ा यानी शरिया अदालतों की वकालत शुरू कर दी है। इसके सदस्य जफरयाब जिलानी के अनुसार बोर्ड देश भर के प्रत्येक जिले में इस्लामी कानून पर आधारित अदालतें कायम करना चाहता है। उनकी मानें तो ये अदालतें मुसलमानों के पारिवारिक झगड़े खासकर विवाह और संपत्ति से जुड़े विवाद निपटाने का काम करेंगी। उन्होंने यह भी बताया कि शरिया कानून के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए तहफीम-ए-शरियत को भी सक्रिय किया जाएगा। यह इस्लामी कानून के जानकारों की समिति है, जो कार्यशालाएं आयोजित कर लोगों को शरिया की जानकारी देते हैं। जिलानी ने यह भी सफाई दी कि शरिया अदालतों को समानांतर अदालत कहना ठीक नहीं होगा, क्योंकि इसका निर्णय किसी पर बाध्यकारी नहीं होता है। अगर कोई पक्ष इसके निर्णय से सहमत नहीं है तो वह न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। कुल मिलाकर उन्होंने यह कहने की कोशिश की। कि इसका मकसद न्यायालय के बाहर ही बातचीत के माध्यम से झगड़े को निपटाना है।

मुसलमान महिलाओं को संपत्ति में समान हिस्सेदारी देने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय में  दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई जारी है। तो क्या यह मुसलमानों को गोलबंद करने का प्रयास है? अगर हां तो किसके खिलाफ। तथ्यों को ध्यान से देखेंगे तो काफी कुछ साफ हो जाता है।

क्या सचमुच ऐसा है? निश्चित रूप से नहीं। सबसे पहले तो एआइएमपीएलबी देश के सारे मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। शिया मुसलमानों के लिए शिया पर्सनल लॉ बोर्ड है, जबकि सुन्नी मुसलमान महिलाओं के लिए आॅल इंडिया वुमन पर्सनल लॉ बोर्ड। दूसरा कि अगर एआइएमपीएलबी का मकसद सिर्फ आपसी विचार-विमर्श से झगड़े को निपटाना है तो उसके लिए हर गांव या शहर में इस्लामी पंचायत, मुल्ले, मौलवी या काजी पहले से मौजूद हैं। वह मुसलमानों को उनके पास जाकर समस्या को निपटाने की अपील करते। इतने में ही एआइएमपीएलबी का काम हो जाता। इसके लिए शरिया अदालतों की क्या आवश्यकता है। फिर एआइएमपीएलबी को इस तरह की अदालतों के गठन का हक किसने दिया। इन अदालतों को किस तरह चलाया जाएगा। उसके जज कौन होंगे। एक पक्ष द्वारा शिकायत करने पर दूसरे पक्ष को बुलाने के लिए कौन-सा तरीका अपनाया जाएगा। इसकी क्या गारंटी है कि अगर कोई पक्ष शरिया अदालत का निर्णय नहीं मानेगा तो उसके विरुद्ध फतवा जारी नहीं किया जाएगा। उस फतवे के खिलाफ संबंधित पक्ष ने अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया तो क्या होगा। फिर यह समानांतर न्याय व्यवस्था हुई या नहीं? इस तरह के अनगिनत सवाल हैं।

क्या एआइएमपीएलबी के इस प्रयास को गंभीरता से लिया जाना चाहिए, क्योंकि इसके खाने के दांत अलग हैं और दिखाने के अलग। भूल गए हों तो 2005 का वह वाकया याद कर लें जब 28 साल की युवती के साथ उसके ससुर 69 साल के अली मोहम्मद ने बलात्कार किया। छर्थवाल, उत्तर प्रदेश की इस्लामी पंचायत ने पांच बच्चों की मां के विवाह को समाप्त कर दिया। उससे कहा गया कि वह अब अपने ससुर की बीवी है और उसे अपने पति नूर इलाही को बेटा मानना चाहिए। दारुल उलूम ने उस निर्णय को सही ठहराते हुए फतवा जारी कर दिया कि इमराना अब अपने पति के साथ नहीं रह सकती। आज जफरयाब जिलानी जिस एआइएमपीएलबी की वकालत कर रहे हैं, तब वह भी दारुल उलूम के साथ खड़ा था। तब विश्व लोचन मदान ने सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर शरिया अदालतों पर रोक लगाने की मांग की। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ ने याचिका में उठायी गई मुख्य मांग को नहीं माना, लेकिन कहा कि शरिया अदालतों का कोई कानूनी आधार नहीं है। पीठ ने 8 जलाई 2014 के उस निर्णय में शरिया अदालतों और फतवा को गैरकानूनी मानने से मना कर दिया। तब से ये अदलतें चल रही हैं और ये अक्सर अनाप-शनाप फैसले देती रहती हैं।

चिंता की बात यह है कि शरिया अदालतें पूरे देश में चल रही हैं। प्रो. आनंद रंगनाथन के अनुसार, तीन सौ के करीब शरिया अदालतें हैं। अकेले इमरात-ए-शरिया नामक संगठन ढाई सौ शरिया अदालतें चला रहा है। ये बिहार, बंगाल, ओडिशा, झारखंड और असम में फैले हैं। एआइएमपीएलबी भी 50 के करीब शरिया अदालतें चला रहा है। इसके बावजूद इसकी कहीं कोई चर्चा नहीं है। इसलिए कि अधिकतर लोग इन शरिया अदालतों के फैसले को चुपचाप स्वीकार कर लेते हैं। सच तो यह है कि उन्हें फतवे का डर दिखाकर चुप करा दिया जाता है। यही कारण है कि इन शरिया अदालतों के निर्णय के खिलाफ शायद ही कोई न्यायालय जाने की हिम्मत जुटा पाता है। ऐसे में इन अदालतों को चलने देना कहां तक उचित है? वह भी ऐसी संस्थाओं के अधीन जिसके कामकाज पर गंभीर सवाल किए जाते रहे हैं। यह चिंता तब और बढ़ जाती है जब पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी जैसे प्रगतिशील लोग भी ना केवल शरिया अदालतों बल्कि तमाम सामुदायिक अदालतों का समर्थन करते हैं।

बहरहाल, एआइएमपीएलबी ने यह बेसुरा राग उस समय छेड़ा है, जब सर्वोच्च न्यायालय में निकाह हलाला पर सुनवाई चल रही है और मुसलमानों में बहुविवाह पर रोक लगाने की मांग जोरों पर है। अधिक समय नहीं बीता है जब सर्वोच्च न्यायालय ने तीन तलाक को अवैध करार दिया। फिर यह संस्था राम जन्मभूमि विवाद में एक पक्षकार भी है और इस पर भी सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई चल रही है। मुसलमान महिलाओं को संपत्ति में समान हिस्सेदारी देने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय में  दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई जारी है। तो क्या यह मुसलमानों को गोलबंद करने का प्रयास है? अगर हां तो किसके खिलाफ। तथ्यों को ध्यान से देखेंगे तो काफी कुछ साफ हो जाता है।

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