राजधानी दिल्ली में पिछली आठ जलाई को आयोजित जनता दल-यू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद उन तमाम अटकलों को विराम मिल गया है, जो नीतीश कुमार और उनकी पार्टी के एनडीए में रहने या न रहने को लेकर लगाई जा रही थीं। पार्टी की तरफ से यह स्पष्ट किया गया कि एनडीए से अलग होने का कोई प्रश्न ही नहीं है। जनता दल-यू भाजपा के साथ मिलकर ही अगला चुनाव लड़ेगी। पिछले कुछ महीनों से नीतीश कुमार और उनकी पार्टी के नेताओं के जो बयान आ रहे थे, उनसे इन आशंकाओं को बल मिला था कि नीतीश कुमार एक बार फिर राजनीतिक पल्टी मार सकते हैं। हालांकि, नीतीश कुमार देश के उन नेताओं में शामिल हैं जिनके बारे में पूरे भरोसे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन फिलहाल तो ऐसा नहीं लगता है। ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ मामलों में केंद्र सरकार से उनकी असहमति व्यक्त करना एनडीए को अपनी जरूरत का एहसास कराने से अधिक और कुछ भी नहीं था।

बिहार में भाजपा और जनता दल-यू का रिश्ता कभी हां, कभी न वाला बना हुआ है। यह रिश्ता जन्म-जन्मांतर का भले ही न हो, पर वर्तमान राजनीतिक हालात में दोनों के समक्ष साथ रहने के अलावा दूसरा कोई विकल्प भी नहीं है।

यह एक बड़ी सच्चाई भी है कि फिलहाल जनता दल-यू के समक्ष एनडीए में बने रहने के अलावा और कोई विकल्प भी नहीं है। आज के दिन यह बिहार की राजनीति की हकीकत है कि कोई भी एक दल अकेले दम चुनाव लड़कर जीत नहीं सकता। उसे दो में से एक पक्ष में जाना ही होगा। एक पक्ष लालू प्रसाद यादव और उनके सहयोगी दलों का है और दूसरा भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए का है। नीतीश कुमार ने पिछले लोकसभा चुनावों में अपनी डफली अलग बजाने के नुस्खे को अपनाया था, लेकिन मीडिया में प्रचारित सुशासन बाबू की तमाम छवि के बावजूद उनकी पार्टी के लोकसभा सदस्यों की संख्या दो पर ही अटक गई। हालांकि कांग्रेस ने नीतीश कुमार को बुलावा दिया था लेकिन फिलहाल बिहार के जो राजनीतिक हालात हैं, उनमें नीतीश कुमार का फिर से लालू के पाले में जाना राजनीतिक आत्महत्या जैसा ही होगा। इससे उनकी राजनीतिक छवि को गहरा नुकसान पहुंचेगा और यह कोई रहस्य नहीं है कि नीतीश कुमार देश के उन नेताओं में शुमार हैं, जो अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक छवि को कायम रखने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। इसी भावना से प्रभावित होकर उन्होंने एक बार भाजपा और दो बार लालू प्रसाद से नाता तोड़ा था। इसके अलावा उन्हें अपने पाले में बुलाने वाली कांग्रेस खुद अपने इतिहास के सबसे बदतर दौर से गुजर रही है। जिस कांग्रेस के समक्ष खुद अपने राजनीतिक अस्तित्व को कायम रखने का संकट हो वह नीतीश कुमार के भला किस काम आ सकती है। सबसे बड़ी बात यह कि बिहार में जो भाजपा विरोधी शक्तियां हैं, उनका नेतृत्व राष्ट्रीय जनता दल के हाथों में हैं जिसके साथ नीतीश कुमार की दोस्ती का फिलहाल कोई प्रश्न नहीं उठता। ऐसे में नीतीश कुमार के भाजपा से अलग होने की संभावना तलाशना एक बचकानी सोच ही होगी। एनडीए में बने रहकर ही जनता दल-यू बड़े भाई होने के शगूफे के साथ लोकसभा चुनाव में अधिक से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा ठोंक सकती है। राजनीतिक मजबूरी में भाजपा इस दावे को महत्व देने के लिए बाध्य हो सकती है। बिहार की राजनीतिक हकीकत यही है कि भाजपा और नीतीश दोनों को ही लोकसभा चुनावों में बेहतर प्रदर्शन के लिए एक दूसरे का साथ चाहिए और यही कारण है कि कम से कम लोकसभा चुनावों तक दोनों के बीच का बंधन कायम रहेगा।

वैसे लोकसभा चुनावों तक भाजपा और नीतीश कुमार के बीच शह और मात का यह खेल अंदर ही अंदर चलता रहेगा। इसका मुख्य उद्देश्य लोकसभा चुनाव के लिए होने वाले टिकट बंटवारे में अधिक से अधिक लाभ लेना होगा। इसी के तहत नीतीश कुमार बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने जैसी मांगें उठाते रहेंगे हालांकि उन्हें यह बात खूब अच्छी तरह से पता है कि उनकी इस मांग को स्वीकार किए जाने का सवाल ही नहीं है। इसका उद्देश्य बस बिहार के कल्याण के लिए अपने गठबंधन की सरकार तक से संघर्ष करने वाले नेता की छवि को मजबूती प्रदान करना है। भाजपा को भी उनकी इस छवि निर्माण प्रक्रिया के प्रयासों से कोई समस्या नहीं क्योंकि आखिरकार उसे भी इसका फायदा ही होगा।

राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी की तरफ से असम नागरिकता संशोधन विधेयक का भी विरोध किया गया जिसका उद्देश्य भाजपा से टकराव मोल लेना नहीं, बल्कि बस यह साबित करना है कि भाजपा से अलग उसकी अपनी एक छवि है। इसी नजरिए से चार राज्यों के विधान सभा चुनावों में जनता दल-यू की भागीदारी को भी देखा जा सकता है। इन राज्यों में पार्टी भाजपा के खिलाफ होगी लेकिन उसकी राजनीतिक हैसियत ऐसी नहंी है कि वह भाजपा को किसी भी तरह का चुनावी नुकसान पहुंचा सके। एक देश, एक चुनाव के सवाल पर भी जनता दल-यू ने भाजपा का समर्थक किया है।

हालांकि, पहले राष्ट्रीय कार्यसमिति और फिर नीतीश कुमार ने भी अप्रत्यक्ष तौर पर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के कदमों और बयानों की  आलोचना की है लेकिन यह अल्पसंख्यक मतदाताओं को आकर्षित करने के अलावा और कुछ भी नहीं है। सिर्फ एक ही बिंदू पर निकट भविष्य में भाजपा और जनता दल-यू के बीच टकराव की स्थिति बन सकती है और वह है लोकसभा चुनाव के लिए होने वाले टिकट बंटवारे में अधिक से अधिक फायदा लेने का प्रयास। 2009 में जब भाजपा और जनता दल-यू ने साथ-साथ चुनाव लड़ा था, तब नीतीश को लड़ने के लिए अधिक सीटें मिली थीं और पार्टी अभी भी उसी चुनाव में हुए टिकट बंटवारे का आधार बनाए जाने पर जोर देगी। आज के दिन भाजपा बिहार में भी जनता दल-यू की पिछलग्गू पार्टी नहीं है। इसके अलावा केंद्र सहित देश के कई राज्यों में उसकी सरकार है। वह आसानी से जनता दल-यू को सीटों के बंटवारे में वरदहस्त नहीं लेने देगी। फिर इस बात की भी तो कोई गारंटी नहीं कि लोकसभा चुनावों के बाद भी नीतीश कुमार उसके साथ बने ही रहेंगे और केंद्र में बनने वाले किसी विपक्षी गठबंधन का हिस्सा नहीं बन जाएंगे। ऐसे में टकराव तो होगा, लेकिन लोकसभा चुनाव के पहले की विकल्पहीनता की स्थिति उन्हें साथ रहने को मजबूर भी करेगी। इसमें कोई संदेह नहीं। 

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