केजरीवाल कानून को भी अपने ढंग से परिभाषित करते हैं,कम से कम तब तक तो जरूर, जबतक फैसला न आ जाय। इसलिए उन्होंने फिर से कोर्ट का रुख कर लिया है। इसमें एक फायदा है। वे अपने समर्थकों को समझा सकते हैं कि उनके विरोधी काम नहीं करने दे रहे हैं। उनका यह विरोध-राग नया नहीं है, ठीक उसी तरह जैसे सांगीतिक राग भी पुराने हैं। फिर भी दोनों तरह के राग में एक खास फर्क है, कुछ खास सांगीतिक राग की धुन और समय तय है, केजरीवाल का विरोध-राग सार्वकालिक है, सुगम भी है। यह राग वह लंबे समय से अलाप रहे हैं, आगे भी जारी रहने की सम्भावना है। ऐसा करना दिल्ली के मुख्यमंत्री, उनकी सरकार और आम आदमी पार्टी को मुफीद लगता है। ऐसा कर वह अपने लोगों को समझा पाने में सफल दिख रहे हैं कि उनके लिए जो कर पा रहे हैं, वह बड़ी मुश्किल से हो रहा है। जो नहीं हो पा रहा है, उसके लिए उनके विरोधी, खासकर केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी के नेता जिम्मेदार हैं। सुप्रीम कोर्ट ते ताजा फैसले से दिल्ली के मुख्यमंत्री को अपने इस मकसद में मदद ही मिली है। जो मामले नहीं सुलझ सके हैं, उनके लिए कोर्ट के दरवाजे खुले ही हैं।

दिल्ली सरकार और उप राज्यपाल के बीच अधिकारों के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी कई पेंच हैं।  जो सुलझ गये हैं, मुख्यमंत्री उसे अपनी जीत बता रहे हैं। जो उलझे हैं, उन पर लड़ाई जारी रखने में ही वह अपना फायदा देखते हैं।

दिल्ली की केंद्रशासित सरकार और उपराज्यपाल के बीच अधिकारों के बंटवारे पर सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया, उसकी व्याख्या मुख्यमंत्री और उनके साथी अपने तरीके से ही कर रहे हैं। उन्होंने शायद पहला काम बड़े पैमाने पर सर्विसेज आॅफिसर्स के तबादले का किया। अधिकारियों ने तबादले का आदेश मानने से इंकार कर दिया। वे एक पुराने आदेश का हवाल देकर कहते हैं कि उनका तबादला राज्य की केंद्रशासित सरकार नहीं कर सकती। इस पर मुख्यमंत्री केजरीवाल अधिकारियों के पीछे केंद सरकार का हाथ बता रहे हैं। वे कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की व्याख्या सही तरीके से नहीं की जा रही है। अपने उप मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया के साथ अरविंद केजरीवाल ने केंद्रीय गृह मंत्री के आवास पर उनसे मुलाकात की। कहते हैं कि केजरीवाल ने वहां भी दावा किया कि उच्चतम न्यायालय के ताजा फैसले के बाद अब उनकी सरकार के पास सर्विसेज (सेवाओं) के मामले में भी पूरी शक्ति है। वे सलाह देते हैं कि केंद्र सरकार और उपराज्यपाल को इन आदेशों का पालन करना चाहिए। केजरीवाल जोड़ते हैं कि ऐसा नहीं हो सकता कि आप आधा आदेश मानें और आधा नहीं। वे सलाह भी देते हैं कि उपराज्यपाल को यदि किसी मामले में भ्रम है तो कोर्ट से पूछ सकते हैं।

खबर आई कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उपराज्यपाल ने अफसरों के तबादले और नियुक्ति का अधिकार मुख्यमंत्री को देने से मना कर दिया। ऐसा तब स्पष्ट हो चला, जब दिल्ली सरकार ने खुद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अपनी अर्जी में सरकार ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार और उपराज्यपाल सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद  अफसरों के तबादले और नियुक्ति नहीं करने दे रहे। केजरीवाल सरकार की दलील है कि केंद्र और उपराज्यपाल का ऐसा करना सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना है।

बहरहाल, मुख्यमंत्री ने दिल्ली के उपराज्यपाल से भी मुलाकात की। दरअसल, वह दिल्ली के अपने मतदाता वर्ग को यह जताना चाहते हैं कि वह आम लोगों के हक के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं। वह जनता के रुके काम की बाधा दूर करने के लिए उन लोगों के दरवाजे भी जा सकते हैं, जिनसे उनका पुरजोर विरोध रहा है। दूसरी ओर वह हर उस काम को जल्द अंजाम दे रहे हैं, जसमें कोई तकनीकी दिक्कत नहीं है। इसी के तहत सीएम ने कोर्ट के फैसले के बाद कई योजनाओं को मंजूरी दी है। राशन की डोर स्टेप डिलीवरी इन योजनाओं में प्रमुख है। इस योजना के लागू होते ही दिल्ली के हर हिस्से में राशन पहुंचाने वाले वाहन दिखाई दे सकते हैं। तब लोगों को राशन के लिए दूर तक नहीं जाना पड़ेगा। इसका महत्व इसलिए भी बढ़ गया है कि इस योजना की फाइल उपराज्यपाल के पास थी। इसी तरह सीसीटीवी कैमरे लगाने के काम को सीए तेज करना चाहते हैं। हालांकि यह काम राशन की डोर स्टेप डिलीवरी की तरह नहीं है। केंद्र की ओर से उप राज्यपाल निवास इस काम में पहले से नियुक्त एक समिति की राय लेने के पक्ष में हैं। मुख्यमंत्री और उनके मंत्री कहते हैं कि दिल्ली में सुरक्षा की इस व्यापक योजना में बेवजह बाधा डाली जा रही है। साथ ही सीएम ने बुराड़ी में नए अस्पताल और दिल्ली टेक्निकल यूनिवर्सिटी(डीटीयू) के विस्तार योजना को मंजूरी जैसे आकर्षक काम पर तेजी दिखाई है। साफ है कि वह जनता को यह संदेश देने में सफल हो रहे हैं कि बाधा उप राज्यपाल के कारण ज्यादा थी।

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