रेन्द्र मोदी सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने के पहले कुछ विपक्षी पार्टियां भले उत्साहित रहीं हों, किंतु उसके बाद तेलुगू देशम जैसी एकाध पार्टियों को छोड़ दें, तो ऐसी सारी पार्टियां पछता रहीं होंगी। कोई भी निष्पक्ष विश्लेषक यह स्वीकार करेगा कि इससे उन्हें कुछ मिला नहीं। यह इसलिए नहीं कि वो सरकार गिरा नहीं सके। लोकसभा के अंकगणित को देखते हुए अविश्वास प्रस्ताव की पहल करने वाली तेलुगू देशम पार्टी तथा कांग्रेस सहित उसका समर्थन करने वाली सभी पार्टियों को भी पता था कि सरकार गिरने नहीं जा रही। वैसे भी अविश्वास प्रस्ताव लाने का लक्ष्य हर बार सरकार का पतन ही नहीं होता। इसके पहले जो 26 अविश्वास प्रस्ताव लाए गए, उनमें से केवल दो बार सरकार गिरने का रिकॉर्ड है।

केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करने के लिए विपक्षी पार्टियों द्वारा अविश्वास प्रस्ताव का नाटक किया गया। पर इस खेल में उनका पासा ही उलटा पड़ गया। जिस एकता की दुहाई विपक्षी पार्टियां अब तक देती रही हैं, वह एकता यहां बिखर गई।

यह अविश्वास प्रस्ताव अभी तक के अविश्वास प्रस्तावों से इस मायने में भिन्न था कि पहली बार किसी क्षेत्रीय पार्टी ने अपने राज्य को विशेष दर्जा न दिए जाने को लेकर इसकी पहल की। तेलुगू देशम पार्टी का मुख्य आरोप यही था कि चूंकि उनके राज्य को केंद्र सरकार ने विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिया इसलिए हम सरकार में अविश्वास व्यक्त करते हैं। विडम्बना देखिए कि इस पर उसे जिन क्षेत्रीय पार्टियों का समर्थन मिलना चाहिए था, उनमें से ज्यादातर का नहीं मिला। सबसे पहले कांग्रेस पार्टी ने इसका समर्थन किया, जो अपने कार्यकाल में बिहार जैसे राज्य को विशेष दर्जा देने से इन्कार कर चुकी थी। आंध्र प्रदेश का विभाजन भी उसी ने किया था लेकिन पुनर्गठन कानून में विशेष राज्य का कोई प्रावधान नहीं डाला। बावजूद उसका सबसे उत्साहित होकर अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन करना साबित कर रहा था कि उसकी निगाहें कहीं और हैं। तो अविश्वास प्रस्ताव का विश्लेषण इसी आधार पर करना होगा कि आखिर लोकसभा में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी की निगाहें कहां थी? या यह अवसर उसके लिए क्या साबित करने का था? साथ ही यह भी कि अन्य विपक्षी पार्टियां इससे क्या पाना चाहती थीं और क्या उन्हें इसमें कितनी सफलता मिली?

इन प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए यह देखना होगा कि आखिर पार्टियों का लक्ष्य क्या था? चूंकि लोक सभा में भाजपा के बाद सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस है और तेलुगू देशम के बाद मुख्य भूमिका भी उसे ही निभानी थी इसलिए पहले उसी पर नजर डालें। वास्तव में इस अविश्वास प्रस्ताव के द्वारा कांग्रेस के सामने तीन प्रमुख लक्ष्य थे। एक, नरेन्द्र मोदी सरकार और भाजपा के विरुद्ध विपक्ष की एकजुटता। दूसरे, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में वह क्षमता है कि वे मोदी को सीधी प्रभावी चुनौती दे सकें। तीसरे, ज्यादातर विपक्षी पार्टियां आगामी 2019 के चुनाव में कांग्रेस के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चलने को तैयार हैं। अन्य विपक्षी पार्टियों के भी अपने लक्ष्य थे, लेकिन कुल मिलाकर 2019 को ध्यान रखते हुए आम अपेक्षा तो यही थी कि लोकसभा से भविष्य के मोदी एवं भाजपा विरोधी एक महागठबंधन का संदेश निकलेगा।

विपक्षी पार्टियां मोदी सरकार को हर मोर्चे पर विफल साबित करके अपने पक्ष में माहौल भी बनाना चाहती होंगी। क्या ऐसा हो पाया? इसके लिए उन सबके पास मोदी सरकार के विरुद्ध ऐसे ठोस आरोप होने चाहिए थे जिनका जवाब देना सरकार के लिए कठिन होता। अगर ऐसा हो पाता तो निश्चय ही विपक्षी खेमे में उत्साह का माहौल होता एवं उसकी प्रतिध्वनि संसद में सुनाई पड़ती। ऐसा नहीं हो रहा है। चूंकि अविश्वास प्रस्ताव तेलुगू देशम का था, इसलिए पहला मौका उसे ही मिला। उसके सांसद जयदेव गल्ला ने जब अपना भाषण आरंभ किया, तो उनका पहला हमला कांग्रेस पर था। उन्होंने कांग्रेस पर आंध्र प्रदेश का अलोकतांत्रिक, अवैज्ञानिक, निरंकुशता तथा अन्यायपूर्ण तरीके से बांटने का आरोप लगाया। उसके साथ किए गए वायदे को पूरा न करने का आरोप भी कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार पर लगाया। कांग्रेस इस पर भले चुप रही लेकिन यह प्रथमग्रासे मक्षिकापाते वाली स्थिति तो थी ही। उसके बाद गल्ला मोदी सरकार पर आए। मोदी सरकार पर भी उनका जो आरोप था उसके एक पक्ष में वे सरकार की प्रशंसा ही कर रहे थे। वे जब यह उदाहरण दे रहे थे कि आपने फलां क्षेत्र के लिए इतना किया, फलां जगह यह दिया और हमारे यहां नहीं दिया। इससे यह साबित होता था कि केन्द्र सरकार ने अनेक राज्यों एवं क्षेत्रों के लिए काफी कुछ किया, पर आंध्र की अनदेखी कर दी।

हम यहां आंध्र प्रदेश को क्या मिला और नहीं मिला उसमें नहीं जाएंगे उसके बारे में पहले वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पूरा विवरण देश के सामने रख दिया था। पूरा देश जानता है कि आंध्र के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू ने अपने मंत्रियों से इस्तीफे आंध्र प्रदेश की राजनीति में वाईएसआर कांग्रेस के जगनमोहन रेड्डी के दबाव में दिलवाए। रेड्डी ने प्रदेश को विशेष दर्जा न दिलवा पाने को लेकर इतना बड़ा अभियान चला दिया कि उनके सामने कोई चारा नहीं रह गया था। जब पिछले 16 मार्च को वाइएसआर ने अचानक सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे दिया तो नायडू ने राजग से अलग होने का फैसला कर लिया, अन्यथा वे स्वयं यह बयान दे चुके थे जो कुछ विशेष राज्य का दर्जा देने से मिलता उससे ज्यादा हमें विशेष पैकेज में मिल रहा है। उनका एक बयान तो यहां तक था कि अगर हमें केन्द्र से ज्यादा मिल रहा है तो इसे लेने में समस्या क्या है।

कहने का तात्पर्य यह कि अविश्वास प्रस्ताव का मूलाधार ही झूठ और एक प्रदेश की आंतरिक राजनीति की प्रतिस्पर्धा में निहित था। बहरहाल, जयदेव गल्ला के भाषण से साफ था कि तेदेपा को 2019 में कांग्रेस की महागठबंधन आकांक्षा से कोई लेना देना नहीं। ऐसा होता तो वे कांग्रेस की आलोचना नहीं करते। वैसे भी आंध्र प्रदेश के चुनाव में तेदेपा कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं कर सकती। उसके बाद तेलांगना राष्ट्र समिति ने अविश्वास प्रस्ताव में मतदान करने से ही अपने को अलग कर लिया। यह विपक्षी एकता को दूसरा धक्का था। तीसरा बड़ा धक्का बीजू जनता दल ने अविश्वास प्रस्ताव आरंभ होते ही बहिगमन करके दे दिया। तमिलनाडु की अन्नाद्रमुक ने मोदी सरकार के पक्ष में मतदान कर दिया। तो कहां निकला मोदी और भाजपा विरोधी कांग्रेस के छाते में किसी विपक्षी महागठबंधन का संदेश? हालांकि भाजपा के लिए भी शिवसेना का अविश्वास प्रस्ताव से बाहर रहना तथा राहुल के भाषण की प्रशंसा करना धक्का था। बावजूद इसके आश्चर्यजनक रूप से उसे कुल 451 पड़े मतों में से 325 मत प्राप्त हो गए। अगर विपक्षी एकता जैसी चीज होती तो इतना मत उसे मिलना नहीं चाहिए था। इसके समानांतर विपक्ष के हिस्से केवल 126 मत आए जबकि गणना कम से कम 140 की थी।

यहां यह भी ध्यान रखिए कि किसी भी पार्टी ने अपने भाषण में नहीं कहा कि वह मोदी के विरोध में विपक्षी एकजुटता के लिए कांग्रेस के साथ है। कई नेताआें ने तो यह भी नहीं कहा कि सरकार इस्तीफा दे। आमतौर पर अविश्वास प्रस्ताव में विपक्ष सरकार से हटने के लिए कहता है। राहुल गांधी ने भी अपने भाषण में ऐसा कुछ नहीं कहा। फारुख अब्दुला ने तो मिलकर देश के लिए काम करने की बात की। जाहिर है, यह अविश्वास प्रस्ताव भाजपा से ज्यादा चिंता का कारण कांग्रेस और उसके साथ खड़े होने के लिए आतुर या मोदी विरोधी विपक्षी एकजुटता के लिए छटपटाती पार्टियों के लिए होना चाहिए। राहुल गांधी के सामने 2019 के पहले अपने को परिपक्व और सक्षम नेता साबित करने का इससे बड़ा अवसर दूसरा नहीं मिल सकता। राहुल गांधी की कसौटी पर देखें तो वे पहले से थोड़ा ज्यादा आक्रामक थे। कितु ऐसी कोई बात नहीं कही जो पहले नहीं कही हो। खैर, भाषणों की दृष्टि से देखें तो राहुल से ज्यादा तथ्यात्मक एवं तार्किक भाषण तो माकपा के मो. सलीम का था। एकाध और नेताओं ने अच्छा भाषण दिया।  

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