भारतीय संस्कृति की सर्वाधिक गौरवशाली परम्परा है गुरु-शिष्य परम्परा। हमारी देवभूमि की यह परम्परा ही आदिकाल से ज्ञान-संपदा का संरक्षण कर उसे श्रुति के रूप में क्रमबद्ध करती आई है। इसी पावन परम्परा ने हमारी देवभूमि को ‘विश्वगुरु’ के पद पर प्रतिष्ठित किया था। जिज्ञासु शिष्यों ने ज्ञानी गुरु के समीप बैठकर उनके प्रतिपादनों को क्रमबद्ध कर हमारे आर्ष वांड्मय को ऐसी दिव्य धरोहर दी जिसका आज भी कोई सानी नहीं है। हमारे धर्मग्रंथों में है कि अज्ञान को नष्ट करने वाला जो ब्रह्म रूप प्रकाश है, वही ‘गुरु’ है। इसीलिए हमारे यहां ‘गुरु’ का स्थान ईश्वर से भी ऊपर माना गया है। वर्तमान समय में सांस्कृतिक मूल्यों में जो भारी गिरावट दिख रही है, उसका प्रमुख कारण है इस पुनीत पावन परम्परा का क्षरण। भले ही कुछ छद्मवेशधारी धूर्त व ढोंगी साधु-संतों की काली करतूतों से बीते दिनों गुरु पद की गरिमा कलंकित हुई हो मगर भारत की आध्यात्मिक धरा के सच्चे संतों में आज भी तप ऊर्जा व सद्ज्ञान के आलोक की इतनी सामर्थ्य विद्यमान है कि उनका सशक्त मार्गदर्शन जीवन मूल्यों के पतन व राष्ट्र के सांस्कृतिक क्षरण को रोक सकता है। वैदिक वांग्मय में सद्गुरु रूपी मार्गदर्शक के पांच स्वरूप बताये गये हैं- यम, वरुण, सोम, औषध और पय। आइए चर्चा करते हैं गुरु के इन पांच स्वरूपों की।

मनुष्य की आध्यात्मिक पिपासा को शान्त करने तथा जीवात्मा को परमात्मा से जोड़ने की क्षमता सिर्फ सदगुरु में ही होती है।

  1. सद्गुरु का पहला स्वरूप है ‘यम’। पात्र यदि पहले से भरा होगा तो उसमें जो कुछ डाला जाएगा, वह पात्र में टिक नहीं पाएगा। उसमें कुछ भरने से पहले पात्र को खाली करना होगा। ठीक इसी तरह ‘गुरु’ अपनी शरण में आये शिष्य को ज्ञान देने से पूर्व उसके मन में पूर्व संचित शंका व अज्ञान की भ्रामक धारणाओं को नष्ट करता है। वैदिक ऋषि कहते है ‘मृतं मृतात् यौति इति मृत्यु:।’ अर्थात गुरु हमारे अंन्दर भरे जीर्ण-शीर्ण विचारों को नष्ट करता है।
  2. जब शिष्य पूर्ण समर्पण को तैयार हो जाता है, उसमें शिष्यत्व का अंकुरण शुरू हो जाता है तो गुरु अपना स्नेह वाला ‘वरुण’’ रूप प्रकट करता है-‘वृणोति आच्छादयति स्वपाशान् इति वरुण:।’ वरुण पाशों के देवता कहे जाते हैं। जिस तरह वे अपने पाशों से सारे संसार को आवृत्त किये रहते हैं, उसी तरह गुरु भी अपने स्नेहरूपी पाशों से शिष्य को आच्छादित किये रहते हैं। ऋग्वेद में वरुण देव से प्रार्थना की गयी है- हे वरुण देव! हमारे त्रितापों के बन्धनों को खोल दो ताकि हम पाप रहित होकर ऊपर उठ सकें, बंधन रहित होकर मुक्ति के योग्य बन सकें। संत कबीर भी गुरु के वरुण रूप को अपने दोहे में इस तरह अभिव्यक्त करते हैं-

गुरु कुम्हार शिष्य कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़े खोट।

अंतर हाथ पसार दें, बाहर मारे चोट।।

यजुर्वेद में वरुण को क्षात्र बल एवं इन्द्रिय बल प्रदान करने वाला कहा गया है। इसी तरह गुरु भी वरुण रूप में शिष्य को आत्मबल प्रदान कर उसे सामर्थ्यों से भर देता है।

  1. वेदों में गुरु का अगला रूप ‘सोम’ बताया गया है। सोम यानी चन्द्रमा अर्थात शीतलता। जिस तरह चन्द्रमा अपनी चांदनी से सबको आह्लादित करता है; ठीक उसी प्रकार गुरु का सोम रूप शिष्य के हृदय में प्रसन्नता का संचार करता है। सामवेद में ऋषि कहते हैं- ‘सोमो हर्वे पवते चारु मत्सर:’। सोम से युक्त वायु प्रत्येक मनुष्य को हर्षदायक लगती है।
  2. इसके बाद गुरु का अगला स्वरूप है औषध का। सद्गुरु जब यह जान लेते हैं कि मेरे शिष्य ने काफी उन्नति कर ली है लेकिन कहीं ऐसा न हो कि अपने ज्ञान व आत्मिक उन्नति पर वह अभिमान कर बैठे। इसलिए शिष्य को इस दोष से बचाने के लिए वह अपना औषध रूप प्रकट करता है। औषधि के सम्पर्क में आना ही रोगों से रहित होने का प्रथम सोपान है। गुरुरूपी आषधि के निकट पहुंचने पर शिष्य समस्त भव रोगों से मुक्त हो जाता है- ‘वस्य छायामृतम्।’ यजुर्वेद में औषधियों को माता कहा गया है- ओषधीरिति मातरस्तद्वो देविरूप ब्रुवे। यानी औषधि माता के समान।

5- वेदों में ने गुरु का अंतिम स्वरूप है ‘पय’। ‘पीयते य: स: पय: अर्थात जो पान करने योग्य है, जिसको सहजता से ग्रहण किया जा सके। मूलत: पय शब्द का प्रयोग जल एवं दूध के लिए होता है। ऋग्वेद कहता है- गुरु अमृत की निर्झरणी है जिसको पिये बिना कोई अमर नहीं हो सकता।

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