भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने राज्य सभा में जब एनआरसी पर बोलना शुरू किया तो हंगामा होना ही था, क्योंकि वह 2019 के दो बड़े दावेदारों को सामने आकर अपनी स्थिति स्पष्ट करने को कहने वाले थे। 31 जुलाई को वहां जो हुआ वह पूरे देश ने देखा और अपनी बात पूरी कहने के लिए उन्हें पार्टी मुख्यालय में प्रेस वार्ता करनी पड़ी। भाजपा अध्यक्ष ने वहां जो कहा उसका मूल यह था कि संप्रग सरकार की तरह नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार एनआरसी को अंजाम तक पहुंचाने से पीछे नहीं हटेगी। दूसरा यह कि बांग्लादेशी घुसपैठ एक राष्ट्रीय समस्या है और इसको लेकर एक ठोस नीति आवश्यक है। वोट बैंक की राजनीति के लिए देश की सुरक्षा को गिरवी नहीं रखा जा सकता है। उसके बाद की राजनीतिक गतिविधियां गवाह है कि अमित शाह ने विपक्ष खासकर ममता बनर्जी और राहुल गांधी के गले में घंटी बांध दी है। नतीजा सामने है। कांगेस समझ नहीं पा रही है कि उसे किधर जाना चाहिए और ममता इतनी उछल रही हैं कि उन्हें यह भी याद नहीं रहा कि वे एक राज्य की मुख्यमंत्री हैं। वे जब गृहयुद्ध की बात करती हैं तो अपने सरकार की योग्यता पर भी सवाल कर रही हैं। इस आधार पर उनकी सरकार को बर्खास्त भी किया जा सकता है। अगर उन्हें लगता है कि इससे भारत और बांग्लादेशी के बीच संबंध खराब होंगे तो इसे वे प्रधानमंत्री से मिलकर भी बता सकती थीं। सार्वजनिक मंच से इस तरह की बात कहने का क्या मतलब है? वैसे भी यह उनका नहीं बल्कि प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार का काम है। साफ है कि उनकी चिंता उस वोट बैंक को लेकर है, जो ऐसे ही अवैध रूप से देश में घुस आए लोगों से बना है। आज पश्चिम बंगाल के दर्जन भर जिले में यही लोग तय करते हैं कि ससंद और विधानसभा में कौन पहुंचेगा। उनको यह भी डर है कि आज नहीं तो कल पश्चिम बंगाल में भी घुसपैठियों की पहचान का काम आरंभ होगा। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष ने तो इसकी मांग भी कर दी है। उनके अनुसार वहां एक करोड़ से अधिक बांग्लादेशी हैं। उसके बाद भाजपा नेता नरेश अग्रवाल ने बिहार के लिए और मनोज तिवारी ने दिल्ली के लिए एनआरसी बनाने की मांग कर दी है। आने वाले दिनों में यह सूची लंबी होती जाएगी। असल दिक्कत कांग्रेस की है जो जिसे ममता बनर्जी की तरह अकेले पश्चिम बंगाल में ही नहीं, बल्कि पूरे देश की राजनीति करनी है। इसलिए एनआरसी को मुसलमान विरोधी ठहरा कर बहुसंख्यक आबादी को नाराज करने का खतरा मोल लेने का कोई तुक नहीं है। कारण यह है कि सोनिया-मनमोहन राज के दस बरसों में पार्टी पर अल्पसंख्यक तुष्टीकरण का जो आरोप लगा, उससे पार्टी आज तक पीछा नहीं छुड़ा पाई है। इसलिए राहुल और सोनिया ने ममता बनर्जी से मुलाकात भले ही कर ली हो उनके बयानों से असहमति जता दी। राहुल गांधी ने अभी तक इस पर प्रत्यक्ष रूप से कुछ नहीं कहा है। मीडिया में राहुल के एक फेसबुक पोस्ट की चर्चा अवश्य है, जिसमें उन्होंने एनआरसी तैयार किए जाने के तौर-तरीकों की आलोचना की है। उसमें लिखा है, ‘‘1985 के असम समझौते में किए गए वादों को पूरा करने के लिए मनमोहन सिंह जी की अगुवाई में संप्रग सरकार ने एनआरसी की शुरुआत की। लेकिन असम और केंद्र की भाजपा सरकार ने जिस तरह से इसे निपटाया है, उसमें काफी सुधार की आवश्यकता है। सरकार तत्परता से इस संकट को सुलझाने का उपाय करे।’’ साफ है कि पार्टी इस मामले में संभल कर चलना चाह रही है। इसलिए आनंद शर्मा ने इसको लेकर एक सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग कर दी।  दूसरी तरफ कांग्रेस की दुविधा यह है कि बांग्लादेशी घुसपैठिए केवल असम या पश्चिम बंगाल की समस्या नहीं हैं। बांग्लादेश से सटे राज्यों में लाखों की संख्या में घुसपैठियों ने घर बना लिया है। स्थानीय लोगों की मदद से उन्हें मतदाता पहचान पत्र और आधार तक हासिल हो जाता है। फिर राजनीतिक दलों का संरक्षण इनके लिए संजीवनी का काम करता है। बिहार के किशनगंज, अररिया, पुर्णिया जाकर देखिए कि ये लोग स्थानीय आबदी में किस तरह घुल-मिल गए हैं। हालत यह है कि ये लोग देहरादून से लेकर शिमला तक फैल गए हैं। झुग्गियों में काम करने वाले कुछ स्वयंसेवी संगठनों के अनुसार अकेले देहरादून में पांच लाख के करीब घुसपैठिए हैं, जिन्होंने नदियों और नहरों के किनारे की जमीन पर कब्जा कर घर बना लिया है। चूंकि अब वे वहां के वोटर हैं, इसलिए राजनीतिक दल भी कुछ बोल नहीं पाते। मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों में तो और भी बुरा हाल है। कारण यह है कि बड़े शहरों की झुग्गियों में इनके रहने का इंतजाम आसानी से हो जाता है और छोटा-मोटा काम भी मिल जाता है। ऐसा इसलिए कि ये बहुत कम पैसों पर हर काम करने को तैयार हो जाते हैं। ये अपराध करने में भी नहीं हिचकते। इसलिए दिल्ली पुलिस ने बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए एक स्पेशल सेल बना रखा है, जिससे बचने के लिए ये लोग अब गुड़गांव को ठिकाना बना रहे हैं। अनुमान है कि वहां करीब चालीस हजार बंगलादेशी और रोहंगिया हैं, जो प्रतिदिन दिल्ली आकर घरों में साफ-सफाई और कचरा वगैरह उठाने का काम करते हैं और शाम तक वापस लौट जाते हैं।

तो देखने में यही लगता है कि बांग्लादेशी या रोहंगिया यहां आकर मेहनत मजदूरी करके अपना पेट पाल रहे हैं, लेकिन समस्या उनका यहां काम करना नहीं है। असल समस्या उनका यहां अवैध रूप से रहना और स्थानीय लोगों का हक मारना है। सब्सिडी से लेकर रोजगार तक। जानबूझकर जनसंख्या बढ़ाना और आपराधिक वारदातों को अंजाम देना इनका अतिरिक्त काम है। अक्सर अपराध करने के बाद ये अपने देश भाग जाते हैं और पुलिस हाथ मलती रह जाती है। इनके बारे में कोई ठोस जानकारी ना होने के कारण समस्या और भी गहरी है। इसलिए असम का एनआरसी एक व्यावहारिक कदम है। लेकिन वोट बैंक के राजनीति की अपनी समस्या है, जिसका प्रमाण तृणमूल और कांग्रेस की प्रतिक्रियाओं में झलकता है।

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here