हुजन समाज पार्टी और कांग्रेस के चुनावी गठबंधन की संभावना ने उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा के माथे पर शिकन ला दी है। गठबंधन अपने अंजाम तक पहुंचता है तो इन दोनों ही राज्यों में उसका असर दिखेगा। सपा और बसपा के बीच गठबंधन की बात लगभग पक्की है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, फूलपुर और कैराना लोकसभा क्षेत्र और नूरपुर विधानसभा क्षेत्र में हुए उपचुनाव के नतीजों से भाजपा अंदरखाने सहमी हुई  है। हालांकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अपने पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को इसकी काट बता दी है और कहा है कि जीत के लिए भाजपा को अपने मतदाताओं को बूथ तक ले जाना होगा। हर हाल में भाजपा को 50 प्रतिशत से अधिक वोट लाना होगा। सुझाव बुरा नहीं है लेकिन यह लक्ष्य पूरा कैसे होगा, विचार तो इस पर करना है। यह गठबंधन केवल उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश तक ही सीमित रहेगा, इस मुगालते से भी बचना होगा। उसे पिछड़ी जातियों, दलितों और अल्पसंख्यकों के दिल में भी गुंजाइश पैदा करनी होगी। हाल की विकास योजनाएं भी भाजपा को चुनावी मजबूती दे सकती हैं लेकिन यूपी-एमपी में चुनाव जातिगत समीकरणों के बल पर भी जीते जाते हैं, इसे नकारा नहीं जा सकता।  

राहुल गांधी को भी प्रधानमंत्री बनना है और मायावती को भी। महत्वाकांक्षाएं दोनों की बड़ी हैं। ऐसे में बसपा और कांग्रेस का गठबंधन एक तरह से अपने-अपने मतलब के खेल से अधिक नहीं होगा। फिर भी कुछ तो है, जिससे भाजपा को सावधान रहना होगा।

कांग्रेस समर्थित नेशनल हेराल्ड में एक चुनावी सर्वेक्षण छपा है। इसमें कहा गया है कि मध्य प्रदेश विधानसभा के लिए अगर कांग्रेस और बसपा अलग-अलग चुनाव लड़ती हैं तो भाजपा को 147,कांग्रेस को 73, बसपा को 9 और अन्य को एक सीट मिल सकती है।  दूसरी ओर गठबंधन होने पर भाजपा को 126 और बसपा-कांग्रेस गठबंधन को 103 सीटें मिल सकती हैं। यह और बात है कि समाजवादी पार्टी भी बसपा की तरह राष्ट्रीय पार्टी कहलाने को बेताब है। इसलिए वह मध्य प्रदेश में भी चुनाव लड़ना चाहती है। हालांकि वह उत्तर प्रदेश वाले गठबंधन में कांग्रेस को शामिल करना नहीं चाहती। मायावती कांग्रेस के साथ जुड़ने में अपना दूरगामी लाभ देखती हैं।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अपना जनाधार खो चुकी है लेकिन सपा-बसपा के साथ उसके गठबंधन की ताकत को भाजपा समझती है। इसलिए उसने कई राजनीतिक प्रयोग किए हैं। मायावती के दौर में गैर जाटव और सुविधाओं से वं वंचित- उपेक्षित अन्य अनुसूचित जातियों को अपने साथ ले रही है। मुस्लिम महिलाओं के हितों से जुड़े तीन तलाक और हलाला जैसे मामले उठाकर उसने अल्पसंख्यकों की आधी आबादी की सहानुभूति हासिल करने का भी प्रयास किया है। असम का राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर मामला भी भाजपा को लोकसभा चुनाव और राज्यों के विधानसभा चुनावों में मजबूती दे सकेगा।

मध्य प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा को 7,कांग्रेस को 37 और भाजपा को 43 प्रतिशत वोट मिले थे। वर्ष 2013 में अपने प्रभाव क्षेत्र वाले विंध्य, बुंदेलखंड, ग्वालियर और चंबल संभाग से उसके केवल चार विधायक जीत पाए थे। यहां की 62 सीटों पर उसे दस हजार और 17 सीटों पर 30 हजार वोट मिले थे। मध्य प्रदेश की 230 में से भाजपा ने 165 और कांग्रेस ने 58 सीटें जीती थीं। बसपा अपने इन्हीं प्रभाव क्षेत्र वाले इलाके की 30 सीटें कांग्रेस से मांग रही है। अगर उसे ये सीटें मिलती हैं तो इससे बसपा को तो लाभ होगा शेष 200 सीटों पर कांग्रेस को कोई फायदा होगा, इसके आसार नहीं के बराबर हैं। अलबत्ते मायावती को अगर इस बहाने मध्य प्रदेश में सफलता मिलती है तो वे अन्य राज्यों में भी गठबंधन की धार को तेज करना चाहेंगी। देश में दलितों की आबादी 25 करोड़ 9 लाख 61 हजार 940 है जो कुल आबादी के एक चौथाई से कुछ ही कम है। इनमें 1666, 35700 अनुसूचित जाति के और 84326240 अनुसूचित जन जाति के लोग शामिल हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और तमिलनाडु में दलितों की आधी आबादी का अधिवास है। देश के 148 जिलों में 49.9 प्रतिशत और 271 जिलों में 19.9 प्रतिशत दलित हैं। देश की 543 लोकसभा सीटों में  84 सीटें अनुसूचित जाति और 47 सीटें अनुसूचित जन जाति के लिए आरक्षित हैं। देश की सभी विधानसभाओं में 607 और 544 सीटें क्रमश: अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षित हैं। अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम को अपने पुराने और मूल स्वरूप में फिर से लाने के लिए संशोधित बिल संसद में लाने की केंद्र सरकार की घोषणा दलितों की नाराजगी थामने का ही प्रयास है। बसपा, कांग्रेस और सपा अगर डाल-डाल चल रही है तो भाजपा पात-पात। देखना होगा कि इस बार कौन सत्ता की बाजी मार पाता है?

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सियाराम पांडेय ‘शांत’
देश के प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लेख, छह खंड काव्य, दो उपन्यास और दर्जन भर कहानियों के लेखक। विगत तीन दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अमर उजाला, हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर सहित देश के कई महत्वपूर्ण अखबारों में अहम संपादकीय दायित्वों का निर्वहन। इन दिनों हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषी न्यूज एजेंसी से जुड़े हैं।

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