किसी जाति विशेष अथवा जाति-समूह के हित में किए काम को राजनीतिक चश्मे से देखने की रवायत अब नई नहीं रह गई है। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने सम्बंधी बिल के लोकसभा में पास होने को भी इस नजरिए से देखा जाय। अलग बात है कि इस संविधान संशोधन विधेयक के पक्ष में 406 मतों के मुकाबले विपक्ष में एक भी वोट नहीं मिला। मतों की दृष्टि से तय है कि सरकार हो अथवा विपक्ष, शायद ही कोई दल इस विधेयक के विरोध में हो। फिर भी यह कहा जाना स्वाभाविक सा लगता है कि चुनावी वर्ष में केंद्र की मोदी सरकार भी अपने पूर्ववर्तियों की तरह जातीय संतुलन साधने का काम कर रही है। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को पलटने के लिए संविधान संशोधन का फैसला एससी-एसटी मामलों में भी कर लिया गया है। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने एससी-एसटी एक्ट के तहत तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। इस फैसले को सरकार ने बदलने का निर्णय कर लिया। बहरहाल, इन मसलों पर सरकार के फैसलों को जल्दबाजी में देखना गलत होगा। समाज के विभिन्न वर्गों के लिए कल्याणकारी कदमों को सकारात्मक ढंग से देखने की जरूरत है। हमें समझना होगा कि आजादी के करीब 70 साल बाद भी देश के बड़े हिस्सों में अपनी सामाजिक स्थिति को लेकर असंतोष क्यों है। आजादी के बाद आई हर सरकार ने इन जाति अथवा जाति-समूहों के लिए कुछ न कुछ किया अवश्य है। बावजूद इसके, पिछड़े वर्ग के तहत उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में यादव और कुर्मी को छोड़ दिया जाय तो अन्य पिछड़ी जातियों के मामलों में असंगतियां हैं। यह असंगतियां खत्म होने का  नाम ही नहीं लेतीं। ऐसे में जरूरत इस बात की थी कि इन जाति समूहों के मसलों पर विचार के लिए एक संवैधानिक इकाई काम करे। देश की नरेंद्र मोदी सरकार ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने की जो पहल की है, वह इसी दिशा में बढ़ने जैसा है। पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने और अनुसूचित जाति-जनजाति उत्पीड़न निरोधक कानून संशोधन बिल असल में पिछड़े और दलित समाज को अधिकार संपन्न करने के उपाय खोजने के कदम हैं। आंकड़ों के लिहाज से देखें तो पिछड़े और दलित समाज के लोग देश की कुल आबादी के करीब 70 फीसद हैं। इतनी बड़ी आबादी का मूलभूत जरूरतों से महरूम रह जाना राष्ट्रीय विकास का पिछड़ जाना है। इन जातियों का विकास करना है तो सबसे पहले उनकी सामाजिक सुरक्षा के साथ आर्थिक और शैक्षणिक सुविधाओं का ध्यान रखना होगा। इसी सोच को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के नये स्वरूप में उसको कई शक्तियों से लैस करने की तैयारी है। आयोग सिविल कोर्ट की तरह आरोपितों को समन कर सकता है और उन्हें सजा भी दे सकता है। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को यह अधिकार पहले से ही मिला हुआ है। अब अन्य पिछड़ी जातियों पर उनसे उच्च जाति का कोई व्यक्ति अत्याचार करता है और पुलिस में सुनवाई न हो, तो पीड़ित आयोग का दरवाजा खटखटा सकता है। इसी तरह नौकरियों में भेदभाव के मामले भी देखे जाएंगे। सच्चाई यह है कि केंद्र की सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़ी जातियों की भागीदारी केवल 17.31 फीसद है, जबकि एक आंकड़े के मुताबिक इनकी आबादी 44 फीसद है। एक अन्य आंकड़ा इसे 52 प्रतिशत बताता है। ऐसे बड़े समूह से ग्रुप ए नौकरियों में इनकी संख्या केवल 8.37 प्रतिशत, बी में 10.01 और सी में 17.98 फीसद ही है। आयोग देखेगा कि किन जातियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिला और कौन सी लगातार आरक्षण के लाभ ले रही हैं। इतने बड़े समूह की चिंता लोककल्याणकारी राज्य में सरकार करे, तो यह उचित ही है। हां, जरूरी यह भी है कि आर्थिक रूप से कमजोर उच्च जातिओं के लोगों का भी ध्यान रखा जाए। अब संयोग से चुनावी वर्ष है तो क्या किसी चुनावी वर्ष में सरकार कोई काम ही न करे? ध्यान रहे कि नया आयोग केवल अत्याचार सम्बंधी मामले ही नहीं देखेगा। यह इन जातियों के सामाजिक और आर्थिक विकास के उपाय भी सुझाएगा। निश्चित ही इस आयोग को पहले से अधिक युक्तिसंगत बनाने की आवश्यकता है। सरकार यही कर रही है। रही बात चुनाव की दृष्टि से लाभ मिलने की तो अनुभव बताते हैं कि बहुत बड़ी संख्या में मौजूद लोग हर वक्त एकजुट नहीं हुआ करते। फिर भी कोई समूह अपने हित तो पहचानता ही है। इसकी चिंता छोड़, सरकार के स्तर पर जरूरत इस बात की है कि जो अति पिछड़े हैं, उनका ध्यान रखा जाय। सबका साथ, सबका विकास के लक्ष्य के साथ चल रही सरकार इस दिशा में बढ़ रही है, इस बात पर कोई शक नहीं होना चाहिए।

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