Nagaon: People check their names on the final draft of the state's National Register of Citizens after it was released, at a NRC Seva Kendra in Nagaon on Monday, July 30, 2018. (PTI Photo) (PTI7_30_2018_000108B) *** Local Caption ***

विपक्षी दल संसद और उसके बाहर असम की राष्ट्रीय नागरिक पंजी को लेकर जो हो-हल्ला मचा रहे हैं, वह काफी दुर्भाग्यपूर्ण है। सभी राजनैतिक दलों की एक राष्ट्रीय जिम्मेदारी होती है। वे हर मुद्दे को सरकार के पक्ष और विपक्ष का मुद्दा बनाएंगे तो यह राजनीति नहीं होगी। असम की राष्ट्रीय नागरिक पंजी के दूसरे और अंतिम प्रारूप के प्रकाशित होने के बाद एक समस्या सामने आई है। नागरिक पंजी में दर्ज होने के लिए 3.29 करोड़ लोगों ने आवेदन दिए थे। उनमें से केवल 2.89 करोड़ लोगों के आवेदन सही पाए गए और उनके नाम इस पंजी में शामिल कर लिए गए। इसका अर्थ यह हुआ कि जिन 40 लाख लोगों के नाम इस पंजी में नहीं है, वे नागरिक नहीं है। ऐसा लगता है कि पंजी तैयार करने की प्रक्रिया में कुछ दोष था और बहुत से वैध नागरिकों के नाम छूट गए हैं। केंद्र और राज्य दोनों सरकारों ने कहा है कि यह केवल प्रारूप है। केवल उसके आधार पर किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी। प्रारूप जारी करते समय यह स्पष्ट कर दिया गया था कि जिनके नाम छूट गए हैं, वे 30 अगस्त से 28 सितंबर तक फिर से अपने नागरिकता संबंधी प्रमाण दाखिल कर सकते हैं। केंद्र सरकार इस अवधि को बढ़ाने के बारे में भी सोच रही है। यह स्पष्ट कर दिया गया है कि किसी के साथ अन्याय नहीं होगा। इसके बाद केंद्र सरकार और राज्य सरकार पर यह आरोप लगाना कि वे देश को हिन्दू और मुसलमानों में बांट रहे हैं। एक गंभीर समस्या को राजनैतिक स्वार्थ की दृष्टि से देखना है। ममता बनर्जी ने तो यहां तक कह दिया कि असम जिन लोगों को निकालेगा उन्हें वे अपने राज्य में बसा लेंगी। वे स्वयं जानती हैं कि ऐसा नहीं कर पाएंगी। यह सिर्फ पश्चिम बंगाल के मुसलमानों को अपना वोट बैंक बनाए रखने के लिए कहा जा रहा है। लेकिन वे और अन्य विपक्षी नेता राजनेताओं की तरह नहीं, विदेशी पैसे से चलने वाले मानवाधिकार संगठनों के कार्यकर्ताओं की तरह व्यवहार कर रहे हैं। विपक्षी दल अपने आपको एनजीओ के स्तर पर उतार दें, इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण क्या होगा?

राष्ट्रीय नागरिक पंजी को लेकर विपक्षी दल जो हो-हल्ला मचा रहे हैं, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। इस तरह की समस्याओं पर राजनैतिक दलों को अधिक गंभीर होकर सोचना चाहिए। उसे हिन्दू बनाम मुस्लिम सवाल भाजपा नहीं, विपक्षी नेता बना रहे हैं। यह देश के लिए अच्छा नहीं है।

सब जानते हैं कि यह समस्या भारतीय जनता पार्टी की राज्य या केंद्र सरकार द्वारा पैदा की गई समस्या नहीं है। यह कांग्रेसी राज की विरासत है, जिसे राज्य की भाजपा सरकार को अपने कंधों पर झेलना पड़ रहा है। भारत और पाकिस्तान का बंटवारा कांग्रेस के नेताओं के कारण हुआ था। उसी की अगली कड़ी 1971 में बांग्लादेश की स्थापना थी। 1947 में बंटवारे के समय भी दोनों देशों के 80-80 लाख लोग पलायन करके दूसरे देश पहुंचे थे। बांग्लादेश के निर्माण के लिए मुक्तिवाहिनी के आंदोलन के समय तो और भी बड़ी संख्या में लोग पूर्वी पाकिस्तान से पलायन करके भारत आ गए थे। भारत ने पूर्वी पाकिस्तान में जो सैनिक हस्तक्षेप किया था, उसका एक बड़ा कारण यह शरणार्थी समस्या हुई थी। उस समय इंदिरा गांधी की सरकार थी और अपनी सैनिक कार्रवाई के लिए यही तर्क दिया था। बांग्लादेश बन गया लेकिन वहां से भारत पलायन करने वाले लोगों का तांता लगा रहा। वे मुख्यत: असम, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में आकर बस गए। इससे इन सभी राज्यों पर न केवल एक बड़ा बोझ आ गया, बल्कि इन सभी राज्यों का धार्मिक जन-भूगोल बदल गया। असम और पश्चिम बंगाल के नेताओं को इसकी अधिक परवाह नहीं थी, क्योंकि वे इन शरणार्थी मुसलमानों को अपने भविष्य के वोट बैंक के रूप में ही देख रहे थे। बहुत से कांग्रेसी नेताओं ने तो अपने-अपने क्षेत्रों में योजनापूर्वक इन शरणार्थियों को बसाने का ही काम किया था। कांग्रेस या मार्क्सवादी दल की राज्य सरकारें और स्थानीय प्रशासन या तो मूकदर्शक बना रहा या वह भी राष्ट्रीय हित के पहले अपने राजनैतिक हित देखता रहा। राजनैतिक नेतृत्व का यह हाल था तो प्रशासन इस समस्या को क्यों गंभीरता से लेता।

इस जन-प्लावन ने असमियों को इतना आहत किया कि वहां एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया। यह आंदोलन 1979 में शुरू हुआ था, अर्थात् बांग्लादेश बनने के आठ वर्ष बाद। अगर बांग्लादेश बनते समय कांग्रेस की केंद्र और राज्य सरकारों ने सीमापार से हो रहे इस जन-प्लावन को रोकने के लिए गंभीरता से कोशिश की होती तो यह नौबत नहीं आती। असम आंदोलन संसार का सबसे अनोखा आंदोलन था। उसमें असम के स्त्री-पुरुष सभी की व्यापक भागीदारी थी। वे अपनी समूची अवधि में इतना शांतिपूर्ण बना रहा कि पूरी दुनिया में उसका कोई सादृश्य नहीं मिलेगा। असम आंदोलन के सभी नेताओं ने बार-बार यह कहा कि उनका आंदोलन मुसलमानों के खिलाफ नहीं है। बांग्लादेश से आकर असम में बस गए या बसा दिए गए शरणार्थियों के खिलाफ है। मुसलमान वहां 1971 से पहले से रहते आए हैं। उन्हें लेकर किसी को कोई आपत्ति नहीं है। यह आंदोलन छह वर्ष चला और 1985 में केंद्र सरकार, राज्य सरकार और असम गण परिषद के नेताओं के बीच एक समझौता हुआ। इस समझौते के अंतर्गत यह पता लगाना शामिल था कि असम में 24 मार्च, 1971 के बाद बांग्लादेश से आकर गैर-कानूनी तौर पर बसने वाले कौन और कितने लोग हैं। यह समझौता राजीव गांधी के शासन में उन्हीं के द्वारा किया गया था और उन्होंने और उनकी राज्य सरकार ने इस समझौते को लागू करने का वचन दिया था।

असम को पूर्वी पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों की समस्या का शुरू से सामना करना पड़ रहा है। इस समस्या को देखते हुए 1951 की जनगणना के समय असम के भीतर एक राष्ट्रीय नागरिक पंजी तैयार करने का निर्णय लिया गया था। असम देश का अकेला राज्य है, जहां इस तरह की पंजी तैयार करने का निर्णय हुआ था। यह किसी और ने नहीं, कांग्रेस के नेताओं ने ही किया था। उस पंजी को तैयार करते समय बड़े पैमाने पर शरणार्थियों की जानकारी सामने आई। इस समस्या से निपटने के लिए विदेशी नागरिक ट्रिब्यूनल बनाए गए। 1964 में उन्होंने काम शुरू किया, यह पाया गया कि उस समय कोई 90 हजार पूर्वी पाकिस्तान से आए शरणार्थी असम में रह रहे थे। लेकिन इस समस्या के बारे में जो गंभीर कार्रवाई की जानी चाहिए थी, नहीं की गई। करना आसान भी नहीं था, अगर मूल देश अपने नागरिकों को वापस न लेना चाहे तो आप क्या कर सकते हैं? लोगों को आप जानवरों की तरह सीमा पार तो नहीं खदेड़ सकते। जब राजीव गांधी ने 1985 में असम समझौता किया तो इन दोनों स्तरों पर अधिक सतर्कता और जिम्मेदारी से काम करने का निर्णय हुआ। नए सिरे से राष्ट्रीय नागरिक पंजी बनाने की बात भी उठी और ट्रिब्यूनल को और अधिक अधिकार देकर सक्रिय करने का निर्णय भी हुआ। अभी असम में इस तरह के सौ ट्रिब्यूनल है। 2014 में लोकसभा चुनाव के दौरान यह समस्या फिर मुद्दा बनी। 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया कि राष्ट्रीय नागरिक पंजी को फिर से तैयार किया जाए। सुप्रीम कोर्ट के उसी आदेश के आधार पर यह पंजी तैयार हुई है और इसके प्रकाशित प्रारूप में असम में रह रहे 40 लाख लोगों के नाम नहीं हैं अर्थात वे अपनी नागरिकता सिद्ध नहीं कर पाए।

बांग्लादेश की किसी सरकार ने आज तक यह स्वीकार नहीं किया कि उसका कोई नागरिक गैर-कानूनी तौर पर भारत में रह रहा है। ऐसी स्थिति में आप इतनी बड़ी संख्या में गैर-कानूनी तौर पर भारत में रहते पाए गए लोगों का क्या कर सकते हैं? राष्ट्रीय नागरिक पंजी में नाम दर्ज करवाने की शर्तें काफी उदार हैं। असम में रह रहे लोगों को ऐसा कोई एक प्रमाण देना है, जिससे सिद्ध हो सके कि वह या उसके पूर्वज 24 मार्च, 1971 से पहले असम में रह रहे थे। 30 अगस्त से पुनरीक्षण की जो प्रक्रिया शुरू होगी, उसमें हो सकता है दस-पांच लाख लोग पंजी में शामिल होने लायक प्रमाण जुटा लें। लेकिन फिर भी जो लाखों में लोग बचे रहेंगे, उनका क्या होगा? न आप उन्हें वापस बांग्लादेश भेज सकते हैं, न जेल में डाल सकते हैं, न शरणार्थी कैंपों में रख सकते हैं। केवल एक मनोवैज्ञानिक दबाव बनेगा, जो आने की योजना बना रहे नए लोगों को रोकेगा। यह सिर्फ शरणार्थियों की मानवीय समस्या नहीं है, इस तरह के संगठित गिरोह काम कर रहे हैं, जो भारत का धार्मिक आधार पर जन-भूगोल बदलने के लिए पड़ोसी देश की मुस्लिम आबादी को भारत में लाकर बसा रहे हैं। रोहिंग्या इसका सबसे ताजा उदाहरण हैं। उनके खिलाफ कार्रवाई करना भी कठिन हो रहा है। फिर असम में पंजी में न आ पाए लोगों को लेकर इतना हो-हल्ला क्यों मचाया जा रहा है? कांग्रेस, अन्य विपक्षी नेता और ममता बनर्जी जानते हैं कि इन लोगों को देश से निकालना आसान नहीं है। आप अधिक से अधिक उनका वोट देने का अधिकार छीन सकते हैं। आप इतने अधिक लोगों को सामान्य नागरिक सुविधाओं से भी वंचित नहीं कर सकते। इसलिए इस तरह की समस्याओं पर राजनैतिक दलों को अधिक गंभीर होकर सोचना चाहिए। उसे हिन्दू बनाम मुस्लिम सवाल भाजपा नहीं विपक्षी नेता बना रहे हैं। यह देश के लिए अच्छा नहीं है। 

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