भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की अर्धरात्रि को कारागृह के भीतर विशिष्ट ग्रहीय दशाओं में शिशु रूप में जन्मे लीलाधर श्रीकृष्ण का समूचा जीवन एक युगांतकारी अवतरण माना जाता है। यदा-यदा हि धर्मस्य…संभवामि युगे-युगे का उद्घोष करने वाले युग नायक कृष्ण ने असुरत्व के विनाश और देवत्व के संरक्षण के लिए धरती पर अवतार लेकर समग्र क्रांति का बिगुल बजाया और अपने सम्मोहक व्यक्तित्व व अनूठे न्यायप्रिय आचरण से पथभ्रष्ट समाज को सही दिशा दी। जीवन के विभिन्न आयामों को एक साथ अधिकारपूर्वक जीना इस लीलापुरुष की विशेषता थी। भगवान श्रीकृष्ण की पूर्णता व पारंगतता अद्भुत है। गीता जैसे अनुपम ग्रन्थ के प्रणेता श्रीकृष्ण आध्यात्मिकता के सर्वोच्च शिखर कहे जाते हैं। सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जनजागरण करने वाले योगेश्वर कृष्ण की लोकलीलाओं में आमजन को अत्याचार से लड़ने और जागरुक रहने का प्रेरणादायी संदेश निहित है। श्रीकृष्ण का जीवन जितना रोचक व नाटकीय है, उतना ही मानवीय और मर्यादित भी। यही वजह है कि आज के तकनीकी युग का मानव भी श्रीकृष्ण के जीवन को अपने सर्वाधिक निकट व तर्कों पर खरा पाता है।

कर्मयोद्धा कृष्ण सही अर्थों में जीवन के सबसे बड़े शिक्षक हैं। वे बताते हैं कि हमारे कर्म ही हमारे जीवन की दशा और दिशा तय करते हैं। कर्म की प्रधानता उनके संदेशों में सबसे ऊपर है। इसी कारण वे ईश्वरीय रूप में भी आम इंसानों से जुड़े दिखते हैं।

गोकुल के नटखट कान्हा से लेकर महाभारत समर में सारथी के रूप में पल पल अर्जुन का मार्गदर्शन करने वाले श्रीकृष्ण का समूचा जीवनचरित मानव कल्याण और जन सरोकारों के दिव्य सूत्रों को स्वयं में संजोये हुए है। बालपन से लेकर कुटुम्बीय जीवन तक; उनके प्रत्येक क्रियाकलाप में सारगर्भित शिक्षाएं निहित हैं। आसुरी शक्तियों के विरुद्ध श्रीकृष्ण का संघर्ष जन्म से ही शुरू हो गया था। दुधमुंही आयु में ही उन्होंने पूतना, वक्कासुर, शटकासुर जैसी शक्तिशाली आसुरी शक्तियों का नाश किया। नन्हीं नन्हीं लातों से छकड़े उलटा दिये। यशोदा मैया को माटी भरे मुख में विश्व ब्रह्मांड दिखा दिया। मैया ने ऊखल से बांधने का प्रयास किया तो रस्सी छोटी हो गयी। हर लीला का अनूठा तत्वज्ञान। बालपन में ग्वाल सखाओं के साथ वन-वन गोवंश चराकर गऊ माता की महिमा बढ़ायी। मुरली की मधुर तान से सभी का मन मोह लिया। देवराज इन्द्र का दंभ तोड़कर गोवर्धन पूजा का महत्व प्रतिपादित किया। किशोरवय में मथुरा से आया मामा कंस का छलपूर्ण आमंत्रण पूरी सहजता से स्वीकार तथा अत्याचारी मामा को मार कर निर्दोष जनता को उनके आतंक से मुक्त कर अपनी जननी व पिता को कारागार से मुक्त किया। पुन: उनके राजपद पर प्रतिष्ठित किया। गौरतलब हो कि कोई भी आतातायी जिसके शौर्य के समक्ष टिक नहीं सका; ऐसे शूरवीर महामानव ने धर्मरक्षा के लिए रणछोड़का सम्बोधन भी पूरी सहजता से स्वीकार कर लिया।  सनद रहे कि महान कर्मयोगी की बाललीलाओं का तत्वदर्शन भी खासा महत्वपूर्ण है। उनकी मान्यता थी कि जो ग्वाल-बाल सारे दिन गौवें चराएं और जिनकी माताएं दूध- मक्खन निकालें, उनके बच्चों को उस गोधन से इसलिए दूर रहना पड़े कि उस पर पहला हक राजा कंस व उसके संगी-साथियों का है। इसी की प्रतिक्रिया थी उनकी माखनचोरी की लीला। जानना दिलचस्प होगा कि भगवान श्रीकृष्ण ने ही सर्वप्रथम गाय को माताका दर्जा दिया। उनको गोपालसम्बोधन अत्यन्त प्रिय था। एक भाई हल संभाले और दूसरा गो पालन करे। भारतीय समाज की भौतिक उन्नति का यह मूलमंत्र आज भी उतना प्रासंगिक है जितना कि द्वापर युग में था। भारतीय दर्शन में गाय को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना गया है। अब तो वैज्ञानिक प्रयोगों से भी गोदुग्ध की उपयोगिता साबित हो चुकी है। यह भी साबित हो चुका है कि गोघृत की यज्ञ आहुतियां पर्यावरण शुद्धि में अहम भूमिका निभाती हैं। खास बात यह है कि यदि गायें दूध देने में अक्षम हो जाएं तो भी उनकी अहमियत कम नहीं होती। आयुवेर्दीय विधि से गोमूत्र, गोमय व पंचगव्य का उपयोग करके अनेकानेक लाभ उठाये जा सकते हैं।

भागवत कथा मनीषी देवकी नंदन ठाकुर के शब्दों में कहें तो 16 कलाओं के पूर्णावतार श्रीकृष्ण ने तद्युगीन समाज में प्रचलित पूर्व धारणाओं और जड़ परंपराओं को तोड़कर यह प्रतिपादित किया कि धर्म सदा देश-काल व परिस्थिति के सापेक्ष होता है। कोई कर्म ऐसा नहीं है जो स्वयं में पाप या पुण्य हो। पाप व पुण्य की इस महीन रेखा के वे पूर्णज्ञाता थे। दुष्टों के दमन के लिए वे साम, दाम, दंड व भेद हर प्रकार की नीति के हिमायती थे। कर्ण व अर्जुन युद्ध में निहत्थे कर्ण को मारना उन्होंने धर्मोचित बताया। इसके पीछे उनका प्रबल तर्क यह था कि अधर्म के पोषक को धर्माचरण की आशा रखने का आखिर क्या अधिकार है! इसी तरह अनुचित रूप से मथुरा पर चढ़ाई करने आए कालयवन को धोखा देने में उन्होंने कुछ अनुचित नहीं समझा। उनकी मान्यता थी कि अधार्मिकों के साथ यदि पूर्ण धर्म का पालन किया जाए तो इससे उनका हौसला बढ़ता है और धर्म की हानि होती है। कहां-कहां धर्म को प्रधानता देनी है और कहां-कहां नीति को, यह वे बखूबी जानते थे। उन्होंने एक साथ यशोदा के नटखट लल्ला, राधा के प्रेमी, सुदामा के मित्र, उद्धव के आचार्य, गोपियों के स्वामी, अर्जुन के सखा व महाभारत के सूत्रधार की भूमिका का सफलता से निर्वहन किया। सम्राट युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में चरण धोकर व जूठे पत्तल उठाकर श्रम की महत्ता का प्रतिपादन किया।

चेहरे पर दिव्यता से भरी मनमोहक मुस्कान और मस्तिष्क में जीवन की गूढ़ समस्याओं के हल निकालने की गहरी समझ; यह है इस महामानव के चमत्कारी व्यक्तित्व का सबसे आकर्षक पहलू। कृष्ण की दूरदर्शी सोच समस्या नहीं बल्कि समाधान ढूंढने की बात करती है। वे उदासी नकारात्मकता के घोर विरोधी है। कृष्ण यह सिखाते हैं कि जीवन की लड़ाई संयम और सधी सोच के साथ लड़ी जाए। उनका जीवन इस बात को रेखांकित करता है कि जीवन में आने वाली हर तरह की परिस्थितियों का सामना करने के लिए सतत कर्मशीलता के साथ धैर्य भी जरूरी है। कर्मयोद्धा कृष्ण सही अर्थों में जीवन के सबसे बड़े शिक्षक हैं। वे बताते हैं कि हमारे कर्म ही हमारे जीवन की दशा और दिशा तय करते हैं। कर्म की प्रधानता उनके संदेशों में सबसे ऊपर है। इसी कारण वे ईश्वरीय रूप में भी आम इंसानों से जुड़े से दीखते हैं। उनका चिंतन राष्ट्र-समाज के लिए हितकर विचारों को प्रोत्साहन देने वाला है। वे सिखाते हैं कि इंसान के विचार और व्यवहार स्वयं उनके ही नहीं बल्कि राष्ट्र और समाज की भी दिशा तय करते हैं। एक ऐसी जीवनशैली सुझाते हैं जो सार्थकता और संतुलन के साथ समस्याओं से जूझने की ललक हो।  गीता में वर्णित उनके सन्देश जीवन-रण में अटल विश्वास के साथ खड़े रहने की सीख देते हैं। कर्मयोगी कृष्ण अन्याय व दमन के खिलाफ तो हैं ही, वे मन की पूर्णता के भी समर्थक हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि इंसान को फल की इच्छा किये बगैर कर्म करना चाहिए। याद रहे कि हमारी जिंदगी तभी तक तनाव, दुखों और परेशानियों से भरी है जब तक हम जिंदगी के मूल को नहीं समझते। बिखराव भरे वर्तमान दौर में भी राष्ट्र-राज्य की उन्नति के लिए उनके जीवन सूत्र पूर्ण प्रासंगिक हैं। उन्होंने हमें अनुशासन में जीने, व्यर्थ चिंता न करने और भविष्य की बजाय वर्तमान पर ध्यान केंद्रित करने का मंत्र दिया। वे हमें सिखाते हैं कि मुसीबत के समय या सफलता न मिलने पर हिम्मत नहीं हारनी चाहिए वरन हार की वजहों को जानकर पुन: प्रयास करना चाहिए। आज देश दुनिया के जाने माने मैनेजमेंट गुरु श्रीकृष्ण की इन सूत्रों पर अमल कर सफलता के पायदान चढ़ रहे हैं।

कृष्ण का जीवन हर तरह से एक आम इंसान का जीवन लगता है। आम मनुष्य के समान दुर्जनों के लिए कठोर और सज्जनों के लिए कोमल। कर्ममय जीवन के समर्थक कृष्ण जीवन को एक संघर्षों से भरा मार्ग ही समझते हैं। हम मानवीय मनोविज्ञान के आधार पर समझने की कोशिश करें तो पाते हैं कि अकर्मण्यता जीवन को दिशाहीन करने वाला बड़ा कारक है। उनकी विशेषताएं उन्हें सच्चे अर्थों में लोकनायक के रूप में प्रतिष्ठित करती हैं। अगर हम अपने जीवन को सफल बनाना चाहते हैं और जिंदगी को बिना किसी तनाव और परेशानी से जीना चाहते हैं, तो अपने जीवन में श्रीकृष्ण के सूत्रों को अमल करके देखिये; जीवन सफल और आनंदमय हो जाएगा। कृष्ण की समाधानमूलक दूरदर्शी सोच राष्ट्रीय और सामाजिक समस्याओं के सन्दर्भ में भी लागू होती है। तभी तो भाग्य की बजाय कर्म करने पर विश्वास करने की सीख देने वाला मुरली मनोहर का दर्शन आज के दौर में भी पूर्ण रूप से प्रासंगिक है।

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