ह बात अब भुला देनी चाहिए कि नेहरू-गांधी परिवार की जगह कांग्रेस का नेतृत्व कोई और व्यक्ति करेगा। इस परिवार पर पार्टी की निर्भरता के ढेर सारे कारण है। राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी नेता अब उन्हीं की  ओर आशा भरी नजरों से देख रहे हैं। अलग बात है कि प्रियंका के प्रति निष्ठा भी कभी-कभी कुलांचे भरने लगती है। ऐसे में कहने में परहेज नहीं कि राहुल के सामने अपने को सिद्ध करने की कठिन परीक्षा है। अब फिर एक परीक्षा आ खड़ी हुई। हमेशा की तरह,जब वे असमय छुट्टियों पर जाकर चर्चा के केंद्र में आ जाया करते थे, इस बार धर्म यात्रा पर जाकर बहस में आ गये। आम तौर पर धार्मिक आस्था पर सवाल नहीं हुआ करते, परन्तु इस क्षेत्र में कोई राजनेता खुद अपनी धार्मिक मान्यताओं पर अलग-अलग रुख अपनाये, तो विवाद से बच नहीं सकता। राहुल गांधी के मामले में भी यही हो रहा है। छुट्टियों के दौरान गुमनाम रहने वाले राहुल इस बार कैलास मानसरोवर यात्रा पर थे। पहले कहा गया कि सुरक्षा कारणों से उनकी यात्रा के मार्ग और पड़ाव की जानकारी नहीं दी जायेगी। भाजपा को मौका मिल गया। पार्टी प्रवक्ता संबित पात्रा ने दावा किया कि राहुल चूंकि चीन के रास्ते कैलास-दर्शन के लिए जाने वाले थे, इसलिए भारत में चीन के राजदूत से उन्होंने खुद को विदा करने की इच्छा जताई। संबित पात्रा यहीं नहीं रुके, उन्होंने राहुल के चीन के साथ रिश्ते उजागर करने की मांग भी कर डाली।

तीर्थ यात्रा को पहले निजी बताने वाले कांग्रेस अध्यक्ष ने अब इसका वीडियो तक भेजा है। ऐसा पहले भी हुआ, जब एक हिन्दू के तौर पर उनकी यात्राओं को उनकी पार्टी ने प्रचारित किया।

बीजेपी प्रवक्ता की बात यदि सच है तो, सवाल उठेंगे कि देश में विपक्ष का एक नेता अपनी धार्मिक यात्रा के समय राजनयिक प्रोटोकॉल क्यों चाहता है? जवाब शायद यही निकलेगा कि इस नेता को धर्म के साथ राजनीति का भी ख्याल रखना है। राहुल की मंशा जल्द ही उजागर भी हो गई। जिस यात्रा को गोपनीय रखने का दावा किया जा रहा था, राहुल ने खुद मानसरोवर के शांत और निर्मल जल की तस्वीर देकर उसके निष्कलुष होने का जिक्र किया। साफ तौर पर वह सत्तारूढ़ भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर इशारा कर रहे थे। उन्होंने अपने ट्वीट में यह भी संकेत किया कि वह यात्रा से लौटकर बहुत कुछ बताएंगे। कांग्रेस अध्यक्ष लौटकर आएं, उसके पहले ही बहुत कुछमें से बहुत बातें समझ में आने लगी थीं। हालांकि यह बातें नई नहीं रहीं। बातें वही पुरानी हैं कि आजादी के संघर्ष से निकली कांग्रेस पार्टी अपने आंतरिक बदलाव के साथ बाहरी दबाव से भी जूझ रही थी। दबाव राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की नीतियों का था, जो भारत के बंटवारे के बाद धर्मनिरपेक्षता की अवधारणासे कभी सहमत नहीं रही। साल 2014 के चुनाव परिणाम ने पहली बार दशार्या कि लोकतंत्र के साथ हिंदू उभार भी स्वीकार हो सकता है।  यह हिन्दू उभार नई कांग्रेस के लिए भी सवाल की तरह खड़ा रहता है। इसीलिए इसके नेता कभी नरम तो कभी कथित गरम हिंदूत्व के बीच झूलते दिखाई देते हैं। अभी पिछले साल 29 नवंबर की ही तो बात है। कांग्रेस अध्यक्ष सोमनाथ मंदिर पहुंचे और अहमद पटेल के साथ उनका नाम मंदिर में रखे गैर हिंदुओं के रजिस्टर में दिखाई दिया। कांग्रेस पार्टी ने सफाई दी थी कि मीडिया समन्वयक मनोज त्यागी के हस्ताक्षर करने के बाद रजिस्टर में राहुल गांधी का नाम बाद में जोड़ दिया गया। राहुल की सोमनाथ यात्रा के साथ भाजपा के कई प्रवक्ता ने उन्हें गैर हिंदू बताना शुरू किया। कांग्रेस में ऐसी तिलमिलाहट हुई कि उसके प्रवक्ता को सफाई देनी पड़ी कि राहुल गांधी न सिर्फ हिन्दू हैं, बल्कि जनेऊधारी शिवभक्त भी हैं।  

याद करें तो कांग्रेस अध्यक्ष की सोमनाथ यात्रा और गुजरात विधान सभा चुनाव के समय उनके मंदिर-मंदिर जाने की चर्चा ने भी जोर पकड़ा था। सोमनाथ के पहले वे 20 से ज्यादा हिंदू देवी-देवताओं के मंदिर जा चुके थे। कर्नाटक और पहले उत्तर प्रदेश में भी उन्होंने मंदिरों के चक्कर  लगाये। अलग बात है कि पार्टी अभी अपने मूल स्वरूप से भी मुक्त नहीं हो पा रही है। यूं भी कह सकते हैं कि वह धर्मनिरपेक्षता के साथ हिन्दुत्व की दोधारी तलवार पर चलने की कोशिश कर रही है। इसालिए रह-रह कर राहुल गांधी का यह बयान भी आता है कि वह न नरम, न गरम बल्कि सिर्फ हिन्दू धर्मावलंबी हैं। असल में यह दुविधा ही कांग्रेस और उसके अध्यक्ष का राजनीति-धर्म बनती जा रही है। कमलनाथ जैसे वरिष्ठ नेता जब मध्य प्रदेश में सरकार बनने पर हर ग्राम पंचायत में गोशाला खोलने का वादा करते हैं, यह स्पष्ट नहीं करते कि कांग्रेस को भी अब गौ माता का ख्याल क्यों आने लगा है। बहरहाल, यह भी कांग्रेस और उसके नेताओं के नये राजनीति- धर्मका एक अंग है।

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डॉ. प्रभात ओझा
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में परास्नातक करने के बाद पीएचडी। आज, दैनिक जागरण और अमर उजाला जैसे समाचार पत्रों के बाद एम एच वन और हरियाणा न्यूज जैसे चैनलों भी में कार्य किया है। इस दौरान कई पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन। ‘शिवपुरी से श्वालबाख तक’ पुस्तक लेखन के अलावा कई अन्य पुस्तकों का संपादन किया है। इन दिनों हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषी न्यूज एजेंसी से जुड़े हैं। फिलहाल युगवार्ता साप्ताहिक के सहायक संपादक हैं।

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