खिरकार, समलैंगिक सबंधों को वैधानिक मान्यता दे दी गई। सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय दंड विधान की धारा 377 के उस हिस्से को असंवैधानिक करार दिया, जिसमें दो वयस्कों के बीच समलैंगिक संबंध को अपराध माना गया था। मुख्य न्यायाधीष दीपक मिश्र की अगुवाई में पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 493 पन्ने के फैसले में कहा कि यह अव्यवहारिक और मनमाना है, जिसका बचाव नहीं किया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र समेत न्यायमूर्ति एएम खनविलकर, रोहिंगटन एफ नरीमन, डीवाई चंद्रचूड़ और इंदू मलहोत्रा ने अपने फैसले में कहा कि अगर दो वयस्क सहमति से समलैंगिक संबंध बनाते हैं, तो उसे अपराध नहीं माना जाएगा। लेकिन पीठ ने धारा 377 को पूरी तरह से खारिज नहीं किया।

समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से हटा दिया गया है, लेकिन समाज पर इसके प्रभाव को लेकर संशय बरकरार है। समलैंगिकता का उत्सव मनाने का क्या मतलब है। क्या इसके पीछे बाजार है।

दरअसल यह आज की लड़ाई नहीं है। 1990 के दशक में ही एड्स भेदभाव विरोधी आंदोलन नामक संगठन ने इसके खिलाफ आवाज उठाई और 1994 में दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। तब से लेकर अब तक इस मामले में कई मोड़ आए और अंत में इसे सर्वोच्च न्यायालय के संविधान पीठ को सौंप दिया गया। सुनवाई जुलाई में ही पूरी हो गई थी, फैसला 6 सितंबर को आया। झगड़े की जड़ में धारा 377 का वह प्रावधान था, जिसके तहत समलैंगिक संबंध को अप्राकृतिक मानते हुए उसे अपराध करार दिया गया था। इसके तहत आरोपी को आजीवन कारावास या दस साल के जेल की सजा और जुर्माना हो सकता था। समलैंगिकों की दलील थी कि यह उनका व्यक्तिगत निर्णय होना चाहिए कि वह किसके साथ शारीरिक संबंध बनाएंगे। दो वयस्क बंद कमरे में एक-दूसरे के साथ क्या करते हैं, इसमें कानून को झांकने की क्या आवश्यकता है। यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है, जिसके तहत कानून के सामने सब बराबर हैं। जबकि समलैंगिकता का विरोध करने वालों का कहना था कि यह एक बीमारी है और सामाजिक व्यवस्था के लिए खतरा है। उनकी मुख्य चिंता यह थी कि इससे परिवार नामक संस्था तबाह हो जाएगी। वैसे समलैंगिकता के समर्थकों को आधी जीत तो 24 अगस्त, 2017 को ही मिल गई थी जब सर्वोच्च न्यायालय ने निजता के अधिकार को मूल अधिकार करार दिया था। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर की अगुवाई में नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने धारा 377 की खास तौर पर चर्चा की। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ भी उस पीठ में थे और उन्होंने ही उस निर्णय का मूल हिस्सा लिखा था। इससे पहले 2012 में ही पीओसीएसओ यानी पॉक्सो कानून पास हो चुका था। इसने 18 साल से कम आयु के बच्चों के साथ समलैंगिक संबंधों की संभावना को काफी हद तक कम कर दिया। फिर 2014 में केएस राधाकृष्णन और एके सीकरी की पीठ ने किन्नरों को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दे दी और कहा कि उन्हें भी संविधान द्वारा दिए गए सभी अधिकार हासिल हैं। एलजीबीटी समुदाय को इन्हीं फैसलों के आधार पर आगे बढ़ना था और उनको इसके लिए व्यापक समर्थन भी मिला। खासकर पढ़े-लिखे संपन्न तबके के लोगों से, जिनमें से कुछ के अपने परिवार के लोग समलैंगिक थे। दूसरी बात यह थी कि आज का समाज खुली अर्थव्यवस्था वाला समाज है। वह 1990 के दशक की मानसिकता से बाहर आ चुका है। इसलिए कई स्वनामधन्य लोगों के साथ आईआईटी के 20 लोग इस मामले में पैरोकार बन गए। एक तरह का जनमत तैयार हो गया। इसलिए केंद्र सरकार ने भी इसका विरोध नहीं किया और फैसला न्यायालय के विवेक पर छोड़ दिया।

अमेरिकी खेल है। इसकी आड़ में समलैंगिकता का व्यापार किया जाएगा। गे बार खोले जाएंगे। उम्मीद करता हूं कि अगली सरकार इस मामले को 7 जजों की पीठ के सामने उठाएगी।

सुब्रह्मण्यम स्वामी, सांसद, राज्य सभा

सर्वोच्च न्यायालय की तरह हम भी इसे अपराध नहीं मानते लेकिन समलैंगिक संबंध और रिश्ते प्राकृतिक नहीं हैं। हम लोग इस तरह के संबंधों को बढ़ावा नहीं देते।

अरुण कुमार, अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख, आरएसएस

लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। समलैंगिकता का इतिहास आज का नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि समलैंगिक लोग भारत में पहले नहीं थे। बेशक उनकी संख्या बहुत ही कम है, लेकिन किसी ने उनसे जीने का अधिकार नहीं छीना। अपने तरीके से वे अपनी जिंदगी जी ही रहे थे। तो फिर इस मुद्दे को कानूनी लड़ाई में क्यों घसीटा गया। ठीक है कि 377 का प्रावधान अमानवीय है और कुछेक मामलों में पुलिस या प्रशासन ने ज्यादती की होगी। लेकिन यह संख्या बहुत ही कम है। फिर इसे इतना खतरनाक बनाकर पेश करने का क्या मतलब है। क्या इसके पीछे बाजार है? सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोग मानते हैं कि यह बाजारवाद का खेल है। वे बता रहे हैं कि समलैंगिकों के अधिकार के नाम पर पश्चिमी देशों में क्या सब चल रहा है। यह सब भारत में भी हो सकता है। उनके लिए अलग से मसाज पार्लर भी खोला जा सकता है। कहने के लिए आप कह सकते हैं कि इसमें क्या बुराई है। आखिर उन्हें भी रोजी कमाने का हक है। लेकिन क्या यह एक तरह का कोठा नहीं होगा जहां समलैंगिक संबंध बनाने वालों का जमावड़ा होगा। सोचिए कि अगर आपके घर के पास ऐसा कुछ होने लगे तो आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी?

संभवत: इसलिए इसे अपराध की श्रेणी में रखा गया था। ध्यान रहे कि 1860 का भादवि हवा से नहीं आया था। उसमें उन्हीं नियमों का संकलन किया गया था, जो तत्कालीन भारत में प्रचलित थे। मनुस्मृति में भी समलैंगिकता को उचित नहीं माना गया है। ऐसा इसलिए कि तब संतान पैदा करने के लिए शारीरिक संबंध बनाए जाते थे, मजे के लिए शारीरिक संबंध नहीं बनाए जाते थे। आज समय बदल गया है। विवाह, परिवार, बच्चे पीछे छूट गए हैं। शारीरिक सुख अहम हो गया है। तो समलैंगिक लोग भी खुल कर जीना चाहते हैं। शारीरिक सुख का आनंद लेना चाहते हैं। कानून ने उन्हें इसकी आजादी दे दी है, लेकिन कहना कठिन है कि समाज इसे आसानी से स्वीकार करेगा। इसीलिए सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा था कि बंद कमरे में समलैंगिक संबंध बनाए, इसका उत्सव ना मनाएं। क्योंकि समाज में इसकी प्रतिक्रिया होगी। वास्तव में यह सिर्फ शारीरिक संबंध का मामला नहीं है। आज नहीं तो कल इससे आगे का खेल शुरू होगा। शादी और संपत्ति का अधिकार, गोद लेने का अधिकार वगैरह। भारतीय समाज अभी इस तरह की स्थिति के लिए तैयार नहीं है। सोचिए अगर किसी व्यक्ति का इकलौता बेटा समलैंगिक हो और वह अपने ही समान किसी समलैंगिक से शादी कर ले तो उसकी अगली पीढ़ी का क्या होगा। क्या कोई अपनी बहू के रूप में एक पुरुष को स्वीकार करेगा। इन्ही परिस्थितियों को ध्यान में रखकर केंद्र सरकार ने न्यायालय से साफ कर दिया था कि समलैंगिकों के शारीरिक संबंध पर उसे कोई ऐतराज नहीं है, लेकिन इससे आगे की बात होगी तो अलग से शपथ पत्र दिया जाएगा। मतलब सरकार का रुख अलग होगा। तो कहा जा सकता है कि मामले का अंत नहीं हुआ है।

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