त 1 सितंबर को नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा अगली जनगणना यानी 2021 में पहली बार अन्य पिछड़ी जातियों की गणना कराने के फैसले पर देश भर में बहस हो रही है। इसका विरोध और समर्थन दोनों हो रहा है। मजे की बात यह है कि पहले जो मंडलवादी नेता और सक्रियतावादी पिछड़ी जाति की गणना कराने की मांग कर रहे थे वे भी कई किंतु परंतु के साथ इसका विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि जब संप्रग सरकार ने जातियों की गणना कराई थी तो उसे जारी करना चाहिए था। ये वही लोग हैं जो पहले कह रहे थे कि वह जनगणना सही तरीके से नहीं हुई। इनकी समस्या समझ में आने वाली है। ये नहीं चाहते कि पिछड़ी जाति की गणना का श्रेय भाजपा को मिले। यह मुद्दा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण तो है ही। आज मंडल आयोग से निकले अनेक नेता अपने-अपने राज्यों से लेकर केन्द्र तक की राजनीति में प्रभावी दखल रखते हंै। वे और उनके समर्थक नहीं चाहते कि भाजपा को पिछड़ी जातियों का हितैषी होने का दावा करने का कोई भी मौका मिले। मोदी सरकार एवं भाजपा की राज्य सरकारों को वैसे भी विरोधियों द्वारा पिछड़े और दलितों का विरोधी साबित करने की कोशिश हो रही है। मोदी सरकार ने आम धारणा के विपरीत पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने का कानून संसद से पारित करा दिया। अब 2021 में अन्य पिछड़ी जातियों की जनगणना की घोषणा के बाद इन्हें लगता है कि इससे उसे राजनीतिक लाभ मिल सकता है। बहरहाल, राजनीतिक लाभ हानि के बिंदु को यहीं छोड़कर हम जरा पिछड़ी जातियों की जनगणना से जुड़े अन्य प्रमुख पहलुओं पर विचार करें।

अनुसूचित जाति-जनजाति की गणना पहले से होती ही है और अब पिछड़ी जातियों की भी होगी तो शेष लोगों की भी गणना करा ली जाए। शेष लोगों की गणना न कराने का कोई तार्किक कारण नजर नहीं आता है। जो तर्क पिछड़ी जातियों पर लागू होता है वह अन्य बची जातियों पर भी होता है।

यह बात सच है कि कुछ पार्टियों और नेताओं द्वारा लंबे समय से पिछड़ी जातियों की जनगणना कराने की मांग की जा रही थी। इसके पीछे उनकी दलील यह है कि वास्तविक संख्या जानने के बाद आरक्षण और अन्य विकास योजनाओं में उनकी सही भागीदारी सुनिश्चित की जा सकेगी। अभी तक जाति के जो आंकड़े हमारे पास उपलब्ध हैं वो 1931 की जनगणना पर आधारित हैं। उसके आधार पर मंडल आयोग ने अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की और उसे स्वीकार कर लिया गया। 1941 में हालांकि जाति जनगणना हुई थी लेकिन देश की हालत ऐसी हो गई कि उसे जारी नहीं किया जा सका। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) ने 2006 में एक नमूना सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी किया था। इसके अनुसार देश की कुल आबादी में से 41 प्रतिशत अन्य पिछड़े वर्ग की है। उसके बाद से ही मंडलवादी नेताओं ने उसे स्वीकारने या पिछड़ी जाति की जनगणना कराने की मांग आरंभ कर दी थी। संप्रग सरकार के दौरान 2011 की जनगणना नजदीक आने के साथ यह मांग ज्यादा तेज हुई। इस पर संसद मेंं भी बहस हुई। पूर्व संप्रग सरकार ने भी विपक्षी दलों की मांग को स्वीकार करते हुए जाति आधारित जनगणना अलग से कराने का फैसला किया। हालांकि ऐसा करने के पहले सरकार ने इस मुद्दे पर विचार करने के लिए तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में एक मंत्रिसमूह गठित किया था। इस समूह ने सभी दलों से अलग-अलग राय लेने के बाद जाति आधारित जनगणना कराने की सिफारिश की थी।

किंतु यह गणना जनगणना कानून के तहत नहीं हुई। इसे आम जनगणना से अलग करने का फैसला हुआ। चूंकि ऐसी जनगणना पहले नहीं हुई थी, इसलिए इसका कोई नाम दिया जाना जरुरी था। केवल जतिगत गणना नहीं देने का फैसला हुआ। तो इसका नाम दिया गया- सामाजिक, आर्थिक, जाति जनगणना’ (एसईसीसी)। किंतु यह राष्ट्रीय जनगणना आयुक्त एवं महापंजीयक के नेतृत्व में नहीं, केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के नेतृत्व में हुआ जिसमें सरकार की कई एजेंसियां लगीं। इसे करने में समय लगा और 2013 में यह पूरा हुआ। संप्रग सरकार इसे जारी नहीं कर सकी। क्यों नहीं जारी कर सकी इसका जवाब देश को आज तक नहीं मिला है। उसके बाद मोदी के नेतृत्व में राजग सरकार गठित हो गई। इसमें 16 जुलाई, 2015 को वित्त मंत्री अरुण जेटली ने घोषणा किया कि जनगणना में अलग-अलग जातियों की संख्या वह प्रकाशित कर देगी। किंतु यह इतना आसान नहीं था। उसमें 46 लाख जातियां, उपजातियां, वंश, गोत्र सामने आए थे। अब नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पानगड़िया की अध्यक्षता में विशेषज्ञों की एक समिति गठित की गई। बावजूद इसे सार्वजनिक करना संभव नहीं हुआ। यह स्वाभाविक भी था।

पता नहीं अंग्रेजी शासनकाल में कैसे जाति जनगणना होती थी। मेरा मानना है कि अंग्रेज भारतीय समाज को विभाजित रखने के लिए ऐसा करते थे और उस आंकड़े का आजादी के बाद कोई अर्थ नहीं रह गया था। यह नहीं भूलना चाहिए कि आजादी के बाद की पहली सरकार ने ही यह निर्णय किया कि अब देश में जाति जनगणना नहीं होगी। इसके लिए कई तर्क दिए गए थे जिनमें सर्वप्रमुख यही था कि भारत अब ऐसे लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक शासन प्रणाली में आ गया है जहां प्रत्येक व्यक्ति कानून की दृष्टि में समान है और सभी वयस्क को मताधिकार मिल गया है। आजादी के बाद जिस भारत का सपना देखा गया था उसमें धीरे-धीरे जातिभेद खत्म होने की कल्पना थी और शासन को उसी दिशा में बढ़ना था। 1951 की जनगणना में जातियों की गिनती नहीं हुई। हालांकि यह तय हुआ कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की जनगणना की जाएगी, क्योंकि संविधान में इनके उत्थान के लिए विशेष प्रावधान की बात थी। उस समय से 2011 की जनगणना तक उनकी गिनती होती रही है। हालांकि यह भी स्थायी व्यवस्था नहीं थी, किंतु धीरे-धीरे जो स्थिति बन गई है उसमें यह अब जारी ही रहने वाला है।

लेकिन जब मंडल आयोग का गठन हुआ और उसकी रिपोर्ट पर आरक्षण लागू भी हो गया तो फिर यह तर्क स्वाभाविक लगने लगा कि अनुसूचित जाति-जनजाति की तरह अन्य पिछड़ी जातियों की भी जनगणना हो। उसके आधार पर उनका आरक्षण तय किया जाए। मंडल आयोग ने 1931 की जनगणना को आधार बनाया जब देश की जनसंख्या 35 करोड़ 30 लाख थी, जिसमें वो भी शामिल थे जो 1947 के बाद पाकिस्तान में रह गए। मंडल आयोग ने अपनी सिफारिश देते समय पिछड़ी जातियों की संख्या 52 प्रतिशत बताया था। उसने यह भी कहा था कि अगली जनगणना जब भी हो इनकी संख्या पता कर ली जाए।

कुछ लोग तर्क दे रहे हैं कि अनुसूचित जाति-जनजाति की गणना पहले से होती ही है और अब पिछड़ी जातियों की भी होगी तो शेष लोगों की भी गणना करा ली जाए। शेष लोगों की गणना न कराने का कोई तार्किक कारण नजर नहीं आता है। जो तर्क पिछड़ी जातियों पर लागू होता है वह अन्य बची जातियों पर भी होता है। पिछड़ी जातियों की पहचान कैसे होगी? एक राज्य में जो जाति अन्य पिछड़ी जाति में शामिल है वह दूसरे राज्य में नहीं है और केन्द्रीय सूची में भी नहीं है। यही स्थिति अनुसूचित जाति-जनजाति के मामले में भी है। ऐसी कई जातियां, जो एक राज्य में अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति में शामिल हंै, वही दूसरे राज्य में नहीं हंै। वह केन्द्रीय सूची में भी नहीं है। इसलिए इनकी गणना आसान नहीं है। जब इनकी आसान नहीं है तो भी किया जा रहा है तो फिर तथाकथित अगड़ी जातियों को छोड़ दिया जाए इसका कोई ठोस कारण नजर नहीं आता। न्याय का तकाजा तो यही है कि सभी जातियों की जनगणना हो जाए। इसके साथ उनकी सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थितियों की भी स्थिति का पता लग जाना चाहिए। कुछ कॉलम तो पहले से जनगणना में हैं, कुछ और जोड़ दिए जाएं। मसलन, जीवनयापन के साधन और आय, वेतनमान के साथ सरकारी या संगठित क्षेत्र की नौकरी, आरक्षण का लाभ कितने लोगों को परिवार में और कितनी पीढ़ियों को, असंगठित क्षेत्र का अस्थायी रोजगार या नौकरी और आय, व्यापार एवं आय-व्यय के साथ सलाना कारोबार, कारोबार के लिए धन कहां से, बैंक से तो किस योजना के तहत, ऐसी नौकरी या अन्य कार्य या व्यापार आदि करने का कारण, कोई काम नहीं यानी बेरोजगार, बेरोजगार क्यों…. आदि आदि।

निस्संदेह, इनसे प्राप्त गणना की छंटाई कर परिशुद्ध आंकड़ा देने में कड़ी मशक्कत करनी होगी, किंतु यह देश के साथ न्याय होगा। जिस तरह का असंतोष अनुसूचित जाति-जनजाति तथा पिछड़ी जातियों के अलावा अन्य जातियों में अब पैदा हो रहा है उसे देखते हुए यह जरूरी है। इससे यह पता चल जाएगा कि वाकई किन जातियों की समाजिक-आर्थिक स्थिति क्या है और क्यों हैं? उसके बाद किसी भी सरकार को इनके लिए विकास की नीतियां बनाने में आसानी होगी। यह भी पता चल जाएगा कि अभी तक जो नीतियां बनाई गईं उनका लाभ वाकई कितने लोगों तक पहुंंचा? तो उसके आधार पर नीतियों में संशोधन और सुधार किया जा सकता है। जिन जातियों में असंतोष है उनको भी पता चल जाएगा कि सच क्या है। यानी आरक्षण का लाभ किस स्तर तक उन जातियों में कितने लोगों को पहुंचा है। जिस तरह सतह के नीचे आरक्षण को लेकर वंचित वर्ग में इससे असंतोष का भाव पैदा हुआ है उनके सामने भी यथार्थ आ जाएगा। केन्द्र एवं राज्य सरकारों के सामने भी स्पष्ट हो जाएगा कि आगे उन्हें किन जाति श्रेणियों के लिए कैसे कदम उठाने की आवश्यकता है। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह कि कुछ की गणना करना और कुछ की न करना आज की स्थिति में उचित नहीं है। ऐसे में सभी जातियों की गणना ही श्रेयस्कर है।

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