वैश्वीकरण के इस दौर में यदि कोई भी देश उन्नति करना चाहता है तो उसे उन दीवारों को तोड़ना होगा जो मैदान को समतल होने से रोकती हैं या फिर समतल मैदान में होने वाली स्वतंत्र प्रतियोगिता को बाधित करती है। इसके साथ ही ऐसे सेतुओं का निर्माण करना होगा, जो बाहरी दुनिया को आपस में जोड़ने का काम करते हों। वर्तमान विश्व में ऐसे सेतुओं की प्रासंगिकता बढ़ रही है जो क्षेत्रीय आर्थिक मंच, क्षेत्रीय बाजार, क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग अथवा उपक्षेत्रीय आर्थिक सहयोग या क्षेत्रीय एवं उपक्षेत्रीय पहल के रूप में कार्य कर रहे हैं। बिम्सटेक इसी तरह की एक उपक्षेत्रीय आर्थिक एवं प्रौद्योगीकीय पहल है जो एशिया के सात देशों को एक स्वाभाविक समूह में बांधता ही नहीं है बल्कि उन्हें भौगोलिक बंधनों व ऐतिहासिक संबंधों का एहसास भी कराता है।

बिम्सटेक एक उभरता हुआ मध्यम वर्ग का आर्थिक उपक्षेत्रीय समुदाय है जिसमें इनोवेशन, कनेक्टिविटी और कॉम्पिटीशन की अपार संभावनाएं हैं। चूंकि भारत सबसे अधिक पोटैंशियल वाली उभरती अर्थव्यवस्था के साथ-साथ सबसे युवा देश है इसलिए बिम्सटेक को भारत के लिए उम्मीदों भरी पहल के रूप में देखा जा सकता है।

भारत इस समूह को पोषित करने और दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, लेकिन इसके बावजूद यह प्रश्न तो किया ही जा सकता है कि क्या भारत इस उपक्षेत्रीय सहयोग के नेतृत्व के रूप में सभी को स्वीकार्य होगा? कारण यह है कि सार्क या साफ्टा जैसे संगठन बिम्सटेक से कम महत्व और कम पोटैंशियल वाले नहीं हैं लेकिन वे भारत के नेतृत्व में आगे बढ़कर दक्षिण एशिया में व्यापक आर्थिक साझेदारी की बुनियाद नहीं रख सके? ‘द बे आॅफ बंगाल इनीशिएटिव फॉर मल्टी-सेक्टोरल टैक्निकल एण्ड इकोनॉमिक कोआॅपरेशन (बिम्सटेक अथवा बंगतक्षेस) में भूगोल, इतिहास, संस्कृति, सुरक्षा और व्यापार के साथ-साथ भौतिक व डिजिटल कनेक्टिविटी भी शामिल हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो बिम्सटेक के देश भूगोल और इतिहास द्वारा एक-दूसरे से बंधे हैं। संस्कृति, धर्म एवं वास्तुशिल्प इन संबंधों को मजबूती प्रदान करता है और समुद्री व्यापार अर्थव्यवस्थाओं को समृद्ध बनाता है। इसलिए इसके सदस्य देश दक्षिण एशिया अथवा दक्षिण पूर्व एशिया की क्षेत्रीय संकीर्णताओं और परम्परागत परिभाषाओं से बाहर निकल सकते हैं और एशिया के सबसे सशक्त एवं गतिशील परिधि का निर्माण कर सकते हैं। इस संगठन की एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे पाकिस्तान को बाहर रखा गया है। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि सार्क व साफ्टा में पाकिस्तान का रवैया पूरी तरह से असहयोगात्मक रहा है इसलिए बिम्सटेक के निर्माण के समय ही भारत ने यह पक्ष रखा था कि यदि पाकिस्तान अपना असहयोगात्मक रवैया नहीं छोड़ेगा, तो भारत इस उपक्षेत्रीय सहयोग में उसे शामिल नहीं करेगा। अंतत: जब वर्ष 2004 में बिम्सटेक अपने वर्तमान स्वरूप में आया तथा सम्मेलन की प्रक्रिया तथा अन्य आयाम तय हुए तो पाकिस्तान को भी बाहर रखा गया। पाकिस्तान एक तरफ साफ्टा में भारत को तरजीही राष्ट्र का दर्जा देने से मना करता रहा है और दूसरी तरफ वह आतंकवाद को पोषित करने और उसके जरिए भारत के साथ एक छद्म युद्ध लड़ने की प्रक्रिया से जुड़ा रहा है। यही वजह रही कि आज सार्क स्टैंडबाइ मोड पर है, संभव है कि आगे चलकर यह समाप्त भी हो जाए। ऐसी स्थिति में बिम्सटेक को प्रोत्साहन उपयोगी होगा। एक दूसरा पक्ष यह भी है कि यह भारत की एक्ट ईस्ट (पहले लुक ईस्ट) नीति का हिस्सा भी है, जो नब्बे के दशक में शुरू हुई थी। ध्यान रहे कि बिम्सटेक में 7 देश हैं जिनका जुड़ाव बंगाल की खाड़ी से है। इसमें एक तरफ भारत, श्रीलंका, थाइलैंड, म्यांमार और बांग्लादेश हैं जो बंगाल की खाड़ी में अवस्थित हैं और दूसरे वे देश जिनका पोर्ट एक्सेस बंगाल की खाड़ी के पास है अर्थात नेपाल और भूटान। इस दृष्टि से भारत बिम्सटेक के जरिए आर्थिक एक्सेस का विस्तार दक्षिण पूर्व एशिया तक कर सकता है। चूंकि पहले भारत का क्षेत्रीय विकास संबंधी फोकस सार्क एवं साफ्टा के इर्द-गिर्द था लेकिन अब भारत के पास विकल्प के रूप में बिम्सटेक आ गया है जो पूर्वी एशिया तक आर्थिक एक्सेस को विस्तार देगा।

बिम्सटेक देशों के विकास के लिए डेवलपमेंटल पार्टनर एडीबी (एशियन डेवलपमेंट बैंक) बना है जो बिम्सटेक देशों के बीच में भौतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने हेतु फंड प्रदान करेगा। ऐसे में इस बात की संभावनाएं भी निर्मित होती हैं कि इस संगठन के सदस्य देश चीन की चेक कूटनीति के झांसे में आने से बच जाएंगे और स्वतंत्र रूप से नईदिल्ली-कोलम्बो-ढाका-नेपी दॉ-बैंकाक-काठमाण्डू और भूटान के बीच मजबूत बॉण्ड बनाने में सफल होंगे। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस उद्देश्य से त्रिपक्षीय संपर्क मार्ग की व्यवस्था बनाई है, जो भारत, थाइलैंड और म्यांमार के बीच है। वर्ष 2013 में इस समूह का आंतरिक व्यापार 74.63 अरब डॉलर था, जो 2005 में महज 25.16 अरब डॉलर ही था। मुक्त व्यापार समझौते के लागू होने के बाद इस समूह के आंतरिक व्यापार की सीमा 43 से 59 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है। हमें ध्यान रखना होगा कि बिम्सटेक के पास दुनिया की लगभग 22 प्रतिशत आबादी है। इसका सीधा सा मतलब यह हुआ कि बिम्सटेक एक बड़े उपभोक्ता बाजार का प्रतीक है, इसलिए यदि बिम्सटेक देशों की कनेक्टिविटी बढ़ती है तो भारत सहित दक्षिण व दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों की तस्वीर बदल जाएगी। लेकिन इस समूह का दूसरा पक्ष बहुत अच्छा नहीं है। बिम्सटेक देशों का सकल विश्व उत्पाद के मुकाबले सम्मिलित जीडीपी (लगभग 3.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर ) है। यदि थाईलैंड और श्रीलंका को छोड़ दिया जाए तो शेष देशों की प्रतिव्यक्ति आय बहुत कम है, जो उन देशों के लोगों की गरीबी का संकेत देते हैं। तो फिर इन देशों के नागरिक सक्षम उपभोक्ता कैसे बन पाएंगे? बिना इसके किसी भी निर्यातक देश को कितना लाभ हो पाएगा, यह विचार करने वाला विषय है। ऐसे में यह कैसे मान लिया जाए कि बिम्सटेक सदस्य एक स्थायी एवं प्रभावी मांग आधारित बाजार का निर्माण कर लेंगे जिससे भारत जैसे देश के निर्यातों को पर लग जाएंगे और भारत समृद्धता की ओर तेजी से खिसकेगा। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या बिम्सटेक पश्चिमी दुनिया से प्रतियोगिता कर पाएगा? वैसे तो यह माना जा रहा है कि यदि प्रस्तावित फ्री ट्रेड समझौता लागू हो जाता है तो भारत की पोटेंशियल के हिसाब से बिम्स्टेक इन्ट्रा-रीजनल ट्रेड में काफी वृद्धि हो जाएगी।  

बिम्सटेक भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत की 1990 के दशक की लुट ईस्ट नीति तथा थाईलैंड की लुक वेस्ट नीति के साथ शुरू हुआ था। गौर से देखें तो बिम्सटेक भारत के लिए पूर्वोत्तर में संभावित गेम चेंजर हो सकता है। वास्तव में पूर्वोत्तर की विशिष्ट सापेक्षिक महत्ता दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ एक पूरक के रूप में देखी जा सकती है। इसका कारण है कि पूर्वोत्तर के साथ दक्षिण पूर्व एशिया का निकटतम सांस्कृतिक संबंध। यही संबंध भारत की बिम्सटेक सहित पूर्वी एशिया के देशों में स्वीकार्यता बढ़ा रहा है जिसके फलस्वरूप भारत को उनके आर्थिक संसाधनों से जुड़ने और उन्हें एक्सेस करने का अवसर प्राप्त होगा। अगर पूर्वोत्तर अपने संसाधनों को सही तरह से सक्रिय कर ले जाता है तो व्यवसायिक पक्ष दक्षिण एशिया को आकर्षित करने में एक्सीलिरेटर की तरह कार्य करेगा। यदि भारत वास्तव में पूर्वोत्तर का विकास कर उसकी पोटेंशियल का दोहन करने में सफल हो जाता है तो यह संभव है कि पूर्वोत्तर एक दिन दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रमुख पॉवर हाउस बने। यह बात इसलिए भी कही जा सकती है, क्योंकि भारत का तिब्बत और बर्मा या अन्य दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों के साथ होने वाले व्यापार में इस क्षेत्र के दर्रे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उदाहरण के तौर पर पूर्वोत्तर दिफू दर्रा (भारत, चीन और बर्मा तीनों की सीमाओं को जोड़ता है और पूर्वी असम के लिए तो यह अति रणनीतिक महत्व का है), दोंग्खा या दोंकिया दर्रा (सिक्किम और तिब्बत को जोड़ता है), गोएचा दर्रा (रणनीतिक महत्व का, सिक्किम), जेलेप दर्रा (भारत और तिब्बत के मध्य, सिक्किम), नाथू ला (सिक्किम को तिब्बत से जोड़ता यह दर्रा प्राचीन रेशम मार्ग का एक हिस्सा है, जो आज भी भारत-चीन व्यापार के लिए सर्वाधिक अनुकूल है), कोंगका दर्रा और पांगसाउ दर्रा(भारत-म्यांमार सीमा पर स्थित) आदि दर्रे सामरिक और वाणिज्यिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं।

लेकिन कुछ शंकाएं भी हैं। शंकाएं इसलिए कि भारत-बांग्लादेश संबंधों में तीस्ता नदी बंटवारा और बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति अवरोध का कारण बन सकती है। नेपाल अभी भी संक्रमण से गुजर रहा है और इससे उबरने के लिए वह चीनी छतरी को ओर खिसक रहा है। श्रीलंका में मानवाधिकार एवं तमिल नृजातीय समस्या है, जिसको लेकर भारत और श्रीलंका संबंधों में गैप बना रहता है। म्यांमार में भले ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल हो रही हो, लेकिन वह उतनी प्राकृतिक नहीं है, जितनी की दिख रही है बल्कि कुछ बाहरी शक्तियों के कारण ऐसा दिख अधिक रहा है। इसके अतिरिक्त म्यांमार अभी नस्लीय संघर्ष की चपेट में है, विशेषकर रोहिंग्या मामले में जिस पर संयुक्त राष्ट्र संघ बेहद नकरात्मक टिप्पणी कर चुका है। क्या ऐसे में यह उम्मीद की जा सकती है कि बिम्स्टेक वास्तव में जितने कदम आगे बढ़ना चाहिए, उतने बढ़ पाएगा?

बहरहाल बिम्सटेक में संभावनाएं बहुत ज्यादा है लेकिन इसके बावजूद भी संशय बना हुआ है। काठमांडू सम्मेलन में जो प्रस्ताव पारित हुए हैं, उनसे इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि बिम्सटेक एक उभरता हुआ मध्यम वर्ग को आर्थिक उपक्षेत्रीय समुदाय है जिसमें इनोवेशन, कनेक्टिविटी और कॉम्पिटीशन की अपार संभावनाएं हैं। चूंकि भारत सबसे अधिक पोटैंशियल वाली उभरती अर्थव्यवस्था के साथ-साथ सबसे युवा देश है इसलिए बिम्सटेक को भारत के लिए उम्मीदों भरी पहल के रूप में देखा जा सकता है।  

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