र्थिक मोर्चे पर रुपये की कीमत में हुई गिरावट और पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत में हो रही बढ़ोतरी की वजह से देश विषम आर्थिक परिस्थितियों का सामना कर रहा है। लेकिन इसी बीच भारत की अर्थव्यवस्था के लिए नये साल की पहली तिमाही के विकास दर के आंकड़ों के रूप में बड़ी राहत वाली खबर आयी है। कृषि, विनिर्माण और कंस्ट्रक्शन के क्षेत्र में अच्छे प्रदर्शन की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था ने पिछली नौ तिमाहियों की सर्वोच्च विकास दर हासिल करने में सफलता पायी है। इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में आर्थिक विकास दर 8.2 फीसदी रही है। प्रतिकूल हालात में भी विकास दर ने ये साबित कर दिया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था फर्राटा भरने के लिए तैयार है।

वैश्विक दबाव की वजह से रुपया गिर रहा है, पेट्रोलियम समेत तमाम आयातित चीजें महंगी हो रही हैं। ऐसे वक्त में विकास दर के आंकड़ों से उम्मीद की किरण जगी है। ये आंकड़े देश की अर्थव्यस्था की बुनियादी मजबूती का संकेत देने वाले हैं।

केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) द्वारा जारी विकास दर के आंकड़ों में बताया गया है कि देश की अर्थव्यवस्था में लगातार सुधार हो रहा है और अर्थव्यवस्था के तमाम नकारात्मक प्रभाव खत्म होने लगे हैं। नये वित्त वर्ष की पहली तिमाही में विकास दर के 8.2 फीसदी के स्तर पर रहने की उम्मीद किसी को नहीं थी। ज्यादातर अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों का मानना था कि जीडीपी की विकास दर अधिक से अधिक 7.5 फीसदी के आसपास ही रहेगी। लेकिन जब आंकड़े आये, तो पता चला की विकास दर ने 8 फीसदी के मनोवैज्ञानिक स्तर को भी पार कर लिया है।

बुनियादी मजबूती का संकेत

अर्थशास्त्री डॉ. रमेंद्र अग्रवाल का मानना है कि विकास दर में आयी ये उछाल इस बात का संकेत है कि भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी के साथ आगे बढ़ रही है और अब भारत दुनिया के विकासशील देशों में तेजी से तरक्की करने वाला एक प्रमुख देश बन गया है। विकास दर के आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सुखद तो हैं ही, ये देश की अर्थव्यवस्था की बुनियादी मजबूती का भी संकेत देते हैं। विकास दर के आंकड़े का एक फायदा आने वाले दिनों में विदेशी निवेश को भी प्रभावित करने में काम आयेगा। क्योंकि इन आंकड़ों से यह भी स्पष्ट हो गया है कि भारत लगातार अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में नयी ऊंचाई की ओर बढ़ रहा है। इसकी वजह से देश में विदेशी निवेश में भी बढ़ोतरी होगी, जिससे न केवल अर्थव्यवस्था की रफ्तार और तेज होगी, बल्कि रोजगार के नये अवसरों का भी सृजन होगा। साथ ही आकर्षक और तेज गति से बढ़ती विकास दर को आगे भी हासिल करने का सिलसिला बना रहेगा। एक अहम बात ये भी है कि यदि विदेशी निवेश बढ़ेगा, तो इससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी मजबूत होगा, जो कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के मौजूदा उथल-पुथल वाले दौर में काफी महत्वपूर्ण है।

केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक 2018-19 की पहली तिमाही में देश की जीडीपी 33.74 लाख करोड़ की रही है, जबकि 2017-18 की पहली तिमाही में जीडीपी का आकार 31.18 लाख करोड़ रुपये था। अगर तुलनात्मक विकास दर की बात की जाये, तो 2017-18 की पहली तिमाही में यह 5.6 फीसदी के स्तर पर थी। हाल के वर्षों में विकास दर का ये सबसे निचला स्तर रहा था। क्योंकि इसके बाद से ही विकास दर ने कुलांचे भरना शुरू कर दिया। 2017-18 की पहली तिमाही के बाद विकास दर दूसरी तिमाही में 6.3 फीसदी, तीसरी तिमाही में 7 फीसदी और आखिरी तिमाही में 7.7 फीसदी के स्तर तक पहुंच गयी। उसके बाद इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में विकास दर ने पहले के तमाम आंकड़ों को पीछे छोड़कर नया मुकाम हासिल किया है।

हर क्षेत्र में विकास जरूरी

ताजा विकास दर से केंद्र सरकार चौतरफा आलोचनाओं से घिरे होने के बावजूद अपनी पीठ थपथपा सकती है। लेकिन इन आंकड़ों को लेकर ज्यादा उत्साहित होने के पहले इस बात को भी याद रखना चाहिए कि इस सरकार के कार्यकाल में यह सबसे अधिक विकास दर नहीं है। इसके पहले 2015-16 की चौथी तिमाही में विकास दर 9.3 फीसदी रही थी। इसलिए उस स्तर तक पहुंचने या फिर उससे भी आगे बढ़ने के लिए जीडीपी से संबद्ध हर क्षेत्र के विकास पर आगे भी ध्यान देने की जरूरत है। इसके बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि 8.2 फीसदी की विकास दर भी अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिहाज से एक बेहतर संकेत है।

क्रिसिल के साउथ एशिया प्रमुख रहे सुशांत देब का मानना है कि वैश्विक दबाव के बावजूद भारत विकास दर के मामले में चीन पर बढ़त कायम रखते हुए विश्व की सबसे तेज रफ्तार वाली अर्थव्यवस्था बना रहेगा। ऐसा कहने की एक वजह यह भी है कि 2018-19 की पहली तिमाही में चीन की विकास दर 6.7 फीसदी ही रही है। इसके पहले की तीन तिमाहियों में भी चीन की विकास दर भारत से कम ही रही है। सबसे अच्छी बात तो यह है कि पहली तिमाही की विकास दर में विनिर्माण क्षेत्र और कृषि क्षेत्र में जबरदस्त वृद्धि देखी गयी है। कृषि, वानिकी और मत्स्य क्षेत्र में 5.3 फीसदी, विनिर्माण क्षेत्र में 13.5 फीसदी, कंस्ट्रक्शन के क्षेत्र में 8.7 फीसदी की उछाल ने जीडीपी विकास दर को 8.2 फीसदी के स्तर पर पहुंचाया है।

प्रदर्शन सुधारने की चुनौती

कुछ क्षेत्रों में उछाल के आंकड़ों को लेकर उत्साहित होते वक्त इस तथ्य पर भी ध्यान देना होगा कि खनन के क्षेत्र में तुलनात्मक तौर पर कमी दर्ज की गयी है। इसके साथ ही रियल स्टेट, पेशेवर सेवाएं, होटल, परिवहन आदि क्षेत्रों में विकास दर पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही की तुलना में कम हुई है। इन क्षेत्रों की विकास दर को सरकार को चुनौती के रूप में लेना चाहिए, तभी विकास दर की छलांग आगे भी जारी रहेगी।

इस संबंध में दिल्ली स्कूल आॅफ इकोनॉमिक्स में प्रोफेसर डॉ. कविता शर्मा का कहना है कि विकास दर के आगे बढ़ने का सिलसिला आगे भी बना रहे, इसके लिए उन सभी क्षेत्रों पर ध्यान देना जरूरी है, जहां अभी कमजोरी नजर आ रही है। सबसे अच्छी बात तो यह है कि पहली तिमाही के आंकड़ों में कृषि क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन नजर आया है। भारत गांवों का देश कहा जाता है और यहां की अर्थव्यवस्था का मूल कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था ही है। ऐसे में सरकार को हरसंभव इस बात की कोशिश करनी होगी कि कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सके। ताकि देश का सबसे बड़ा वर्ग खुशहाली की ओर बढ़ सके।

विकास दर में उछाल के ये आंकड़े उस समय आये हैं, जब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है और डॉलर की मजबूती की वजह से आयात लगातार महंगा हो रहा है। ऐसा होने की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। रुपया रिकॉर्ड स्तर पर नीचे जा चुका है, जिसके कारण विदेशी बाजार से जिन्सों का आयात करने वाली कंपनियों पर भारी दबाव बना हुआ है। रुपये की कीमत में गिरावट के कारण महंगाई दर में भी बढ़ोतरी होने की आशंका बन गयी है, जिससे देश में एक बार फिर ब्याज दर बढ़ने की संभावना जतायी जा रही है। ये सारे संकेतक अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक रूप से असर डालते हैं। इसलिए सरकार को समय रहते ही सचेत होना होगा, ताकि अर्थव्यवस्था में रफ्तार की जो स्थिति अभी है, वह आगे भी बनी रहे।

सबको मिले फायदा

योजना आयोग के सदस्य रह चुके डॉ. अश्विनी शरण का मानना है कि मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही के विकास दर के आंकड़े सरकार का आत्मविश्वास बढ़ायेंगे ही, कारोबारियों और आम लोगों के मन में भी अच्छे दिन की उम्मीद जगायेंगे। लेकिन इसका फायदा समग्र रूप से तभी मिल सकेगा, जब इसका असर आम लोगों तक भी पहुंचे। सरकार के सामने अभी सबसे बड़ी चुनौती जीडीपी के सभी अंगों को मजबूत करने की होनी चाहिए। ऐसा होने से ही देश के हर वर्ग तक अर्थव्यवस्था की मजबूती का फायदा पहुंच सकेगा। अगर ऐसा हो सका तो विकास दर भी लगातार कुलांचे भरते हुए आगे निकलती जायेगी। भारत दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश है लेकिन अगर देश को इस साल के अंत तक अर्थव्यवस्था के आकार के मामले में ब्रिटेन को भी पीछे छोड़ना है, तो अर्थव्यवस्था की मजबूती बनाये रखने पर विशेष ध्यान देना होगा। ऐसा करके ही देश की आर्थिक हालत को और मजबूत किया जा सकता है और अपने पड़ोसी चीन से प्रतिद्वंदिता भी की जा सकती है।  

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विनय के पाठक
रांची विश्वविद्यालय से स्नातक। वर्ष 1988 में रांची में ही फील्ड रिपोर्टर के रूप में रांची एक्सप्रेस से जुड़े। उसके बाद साप्ताहिक रविवार, प्रभात खबर, सेंटिनल, पांचजन्य, राजस्थान पत्रिका, टेलीग्राफ, इकोनॉमिक्स टाइम्स, अमर उजाला, बीएजी फिल्म्स, न्यूज 24, इंडिया टीवी, जी न्यूज जैसी संस्थाओं के लिए उप संपादक से लेकर विशेष संवाददाता, सहायक फीचर एडिटर, समन्वय संपादक, एक्जक्यूटिव प्रोड्यूसर जैसे पदों पर कार्य कर चुके हैं। टीवी की दुनिया में ‘पोलखोल’ और ‘सनसनी’ जैसे कार्यक्रमों का भी प्रोडक्शन किया है।

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