जानन गणेश भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। हिन्दू समाज का कोई भी कार्य गणपति को नमन के बिना शुरू नहीं किया जाता क्योंकि वे सुख-समृद्धि, वैभव एवं आनंद के अधिष्ठाता हैं। वे विघ्नहर्ता हैं। शुभत्व का पर्याय हैं। श्री विनायक की अनूठी काया में मानवीय प्रबंधन के ऐसे अनूठे सूत्र समाये हुए हैं, जो दुनिया की किसी भी पाठशाला में पढ़ाए नहीं जा सकते। रोचक तथ्य यह है कि शिव-पार्वती नंदन की जितनी भी भाव-भंगिमाएं हैं शायद ही उतनी किसी और देवी-देवता की होंगी। रिद्धि-सिद्धि के दाता और बुद्धि के देवता स्वयं अपने आप में ज्ञान हैं, विज्ञान हैं, प्रबंधक हैं।

गणेश का जन्मोत्सव जन-जन का त्योहार है। भगवान गणेश की सरलता ही उन्हें आज भी सर्वाधिक जनप्रिय और जनग्राह्य बनाए हुए है।

प्रथम पूज्य श्री गणेश ही एकमात्र ऐसे देव हैं जिनकी विशाल आकृति इतना लचीलापन लिए हुए है कि हर चित्रकार को अपने-अपने नजरिए से उन्हें चित्रित करने का अवसर प्रदान करती है। भारतीय देव परम्परा में प्रथम पूज्य की गरिमामयी उपाधि से विभूषित विघ्नहर्ता गणेश का दस दिवसीय जन्मोत्सव भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से समूचे देश ही नहीं, अपितु विश्वभर में भारतीय समुदाय के लोगों के मध्य प्रतिवर्ष अत्यन्त श्रद्धा व भक्ति के साथ मनाया जाता है। यूं तो अब गणेश उत्सव की धूम समूचे देश में दिखती है, बावजूद इसके, महाराष्ट्र में पुणे व मुंबई तथा मध्य प्रदेश में इंदौर के गणेशोत्सव की रौनक अलग की देखते बनती है। वर्तमान में केवल महाराष्ट्र में ही 50 हजार से ज्यादा सार्वजनिक गणेश मंडल हैं। इसमें अकेले पुणे में 5 हजार से ज्यादा गणेश मंडल हैं। इसके अलावा आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात में काफी संख्या में गणेशोत्सव मंडल हैं। जानना दिलचस्प होगा कि स्वतंत्रता आंदोलन से पूर्व गणपति पूजन आज की तरह सार्वजनिक रूप में नहीं होता था। ऐतिहासिक साक्ष्यों के मुताबिक महाराष्ट्र में सातवाहन, राष्ट्रकूट व चालुक्य राजवंश के शासकों ने गणेश पूजन की प्रथा शुरू की थी। कालान्तर में छत्रपति शिवाजी महाराज के बाल्यकाल में उनकी मां जीजाबाई ने पुणे के ग्राम्यदेवता के रूप में कस्बा गणपति की स्थापना की थी। शिवाजी महाराज के बाद पेशवा शासकों ने गणेशोत्सव को बढ़ावा दिया। लेकिन गणेश पूजन को लोक उत्सव का रूप लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने दिया।

भगवान गणेश के बारे में पौराणिक ग्रंथों में अनेक कथाएं वर्णित हैं। देवाधिदेव शिव और जगतजननी मां पार्वती के पुत्र गणेश के जन्म का एक पौराणिक वृतांत सर्वाधिक लोकप्रिय है। कथा है कि एक बार माता पार्वती ने अपने उबटन के मैल से एक बालक का पुतला बनाकर उसमें प्राण फूंक दिये। मगर उस बालक की मनोहारी छवि ने उनमें वात्सल्य जगा दिया और उन्होंने उसे अपना पुत्र बना लिया। उस नन्हें बालक को पहरेदारी का दायित्व सौंप कर माता पार्वती गुफा के भीतर स्नान को चली गयीं। उसी समय महादेव वहां आये और गुफा में प्रवेश करने लगे। बालक ने उन्हें गुफा प्रवेश से रोका तो महादेव ने पहले तो बालक समझ कर उसे समझाया किंतु उस बालक का हठ देखकर क्रुद्ध शिव ने बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया। जब माता पार्वती को इसकी जानकारी हुई, तो पूरे कैलाश पर कोहराम मच गया। तब माता का क्रोध शांत करने के लिए भगवान शिव ने बालक के मस्तक पर गजशीश लगाकर उसे पुनर्जीवन दिया। वह बालक गजानन गणेश के नाम से लोक विख्यात हुआ। शास्त्रीय विवरणों के मुताबिक वह पावन तिथि भाद्रपद शुक्ल की चतुर्थी थी। उक्त अवसर पर गजानन गणेश को आशीर्वाद देने सभी देव शक्तियां कैलाश पहुंचीं। ब्रह्मा ने यश का, विष्णु ने ज्ञान का और महादेव ने प्रथम पूज्य होने का आशीष दिया। लक्ष्मी ने कहा कि जहां गणेश रहेंगे, वहां मैं रहूंगी। सरस्वती ने वाणी, स्मृति एवं वक्तृत्व-शक्ति प्रदान की।

गजानन गणेश की आकृति जितनी मनोहारी है, उसका तत्वदर्शन भी उतना ही शिक्षाप्रद। गणेश का गज मस्तक उनकी सर्वोपरि बुद्धिमत्ता व विवेकशील होने का प्रतीक है। उनकी सूंड़ कुशाग्र घ्राणशक्ति की द्योतक है, जो हर विपदा को दूर से ही सूंघ लेती है। छोटी छोटी आंखें गहन व अगम्य भावों की परिचायक हैं, जो जीवन में सूक्ष्म लेकिन तीक्ष्ण दृष्टि रखने की प्रेरणा देती हैं। उनका लंबा उदर दूसरों की बातों की गोपनीयता, बुराइयों, कमजोरियों को स्वयं में समाविष्ट कर लेने की शिक्षा देता है। गणेश के सूपकर्ण कान का कच्चापन न होने की सीख देते हैं। उनकी स्थूल देह में वह गुरुता निहित है, जो गणनायक में होनी चाहिए। गणपति का वाहन मूषक चंचलता एवं दूसरों की छिद्रान्वेषण की प्रवृत्ति को नियंत्रित करने का प्रेरक है। अत्यंत छोटे एवं क्षुद्र प्राणी मूषक को अपना वाहन बना कर गणपति ने यह संदेश दिया है कि गणनायक को तुच्छ से तुच्छ व्यक्ति के प्रति भी स्नेहभाव रखना चाहिए।

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