तेलंगाना मंत्रिमंडल की बैठक के कई दिन पहले से साफ हो चला था कि राज्य में समय से पहले ही विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने शायद इसे पहले ही भांप लिया था। बार-बार मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव का दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री से मिलने पर कांग्रेस की नजर बनी हुई थी। मंत्रिपरिषद की बैठक हो, उसके पहले ही कांग्रेस ने अपना चुनाव घोषणा पत्र जारी कर दिया। दरअसल शिक्षक दिवस, 05 सितंबर को जिस तरह राजधानी में हलचल तेज हुई, लगने लगा कि अगले दिन मंत्रिपरिषद क्या करने जा रही है। मंत्रिमंडल की बैठक से पहले मुख्यमंत्री ने पार्टी के कोर ग्रुप से मंत्रणा कर राज्य में चुनाव कराने का मन बना लिया था। उनके संकेत पर राज्य सरकार के मुख्य सचिव एस.के. जोशी और विधानसभा सचिव नरसिम्हा चायुर्लु ने राज्यपाल ईएसएल नरसिम्हन से मुलाकात का समय मांगा और उनके साथ बैठक की। वहीं राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी रजत कुमार का मुख्य सचिव से मिलना भी बहुत कुछ कह गया।

तेलंगाना में राज्य सरकार का कार्यकाल अगले साल मई तक था। राज्य में चुनावी तैयारियों के साथ सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति ने समय के पूर्व जनादेश लेने का फैसला क्यों किया, इस पर भी चर्चा चल रही है।

विपक्षी कांग्रेस के साथ ही तेलंगाना तेलुगु देसम पार्टी ने भी एक आपातकालीन बैठक बुलाई। बैठक में कांग्रेस से  तालमेल पर फैसले का अधिकार पार्टी अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू को दिया गया। पिछले विधानसभा चुनाव में टीआरएस को 63, कांग्रेस को 22 तथा भाजपा को नौ सीटें मिलीं थीं। हालांकि चुनाव के बाद कांग्रेस और अन्य दलों के कई विधायक टीआरएस में शामिल हो चुके हैं। दल बदले विधायकों पर उच्च न्यायलय में योग्यता रद्द करने की याचिका दायर की गयी। इधर विधान सभा अध्यक्ष के फैसलों के सहारे तेलंगाना राष्ट्र समिति बहुमत बनाये रखने में कामयाब रही। टीआरएस नेतृत्व का आत्मविश्वास ही है कि वह राज्य में लोकसभा के पहले ही विधानसभा चुनाव कराने को तैयार हो गई। जल्द चुनाव के पीछे उसका मकसद राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की पहचान बनाने और लोकसभा में अपनी संख्या बढ़ाने की भी है। माना जाता है कि दोनों चुनाव एक साथ होने से क्षेत्रीय दलों को नुकसान पहुंचता है, ऐसे में टीआरएस यह जोखिम नहीं लेना चाहती है। अगले साल लोकसभा चुनाव के पहले कई विधानसभाओं के चुनाव इसी साल के अंत तक होने हैं। इनमें भाजपा शासित राज्य मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम शामिल हैं।  तेलंगाना राष्ट्र समिति इन्हीं राज्यों के साथ प्रदेश विधानसभा का चुनाव चाहती है। इसी के मद्देनजर सत्तारुढ़ पार्टी ने अपने कार्यकाल के चौथे साल में कई लोक-लुभावन कार्य शुरू किए। इन कार्यों के तहत रैतू बंधु योजना के अंतर्गत किसानों को सरकारी भूमि पट्टे देना, भीमा – रैतु बीमा योजना में किसानों का बीमा कराना और पांच महीने तक चलने वाली कंटि वेलुगु’ (आंख की रोशनी) योजना के तहत 3.7 करोड़ लोगों की आंखों की जांच और आॅपरेशन आदि शामिल है। केंद्र सरकार ने तेलंगाना की नये जोनल सिस्टम को भी मंजूरी दी है। चंद्रशेखर राव ने हाल ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर इसके लिए आग्रह किया था। नये जोनल सिस्टम से स्थानीय लोगों को अधिक नौकरियां मिलेगी। मुख्यमंत्री ने यह भी दावा किया कि घोषणा पत्र में किए वादों को उनकी सरकार ने पूरा किया। साथ ही 76 अतिरिक्त कल्याण योजनाएं चलाई। राज्य में अब किसानों को सिंचाई कि लिए निर्बाध 24 घंटे बिजली आपूर्ति की जा रही है।

सवाल है कि क्या ऐसी योजनाओं के बूते सरकारें फिर वापस आती हैं। राजस्थान में तो ऐसा नहीं हुआ। वहां अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार 2013 में विधानसभा चुनाव हार गई थी। वहां कांग्रेस के 96 से घटकर केवल 21 विधायक रह गये। इसके विपरीत उसी चुनाव में कुल 199 विधानसभा क्षेत्रों में से भारतीय जनता पार्टी ने 162 सीटों पर कब्जा कर लिया। इसी साल हुए कर्नाटक के चुनाव में सिद्धारमैया की सरकार भी पराजित हो गई। वहां अन्ना भाग्यजैसी बहुचर्चित योजना के बावजूद सामाजिक समीकरण में अहिंदा (दलित, आदिवासी, लिंगायत पिछड़ा और अल्पसंख्यक) के लोगों ने कांग्रेस को वोट नहीं दिया। कारण साफ है कि किसी भी राज्य की जनता समझ जाती है कि चुनाव के पास आते ही सत्तारूढ़ पार्टियां किसान,बेरोजगारों और अल्पसंख्यकों की चिंता ज्यादा ही करने लगती हैं। यही कारण है कि तेलंगाना में विपक्षी भारतीय जनता पार्टी ने निशाना साधते हुए कहा कि सरकार लाख योजनाएं बना ले, लेकिन जब तक उसका क्रियान्वयन सही तरीके से नहीं होगा, तब तक प्रदेश के बेरोजगार युवाओं का भला नहीं होने वाला है।

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