भारतीय सिनेमा के इतिहास में विशेष महत्व रखने वाले अनेक स्टूडियो आज आवासीय कॉलोनियों और व्यावसायिक भवनों में बदल चुके हैं। पिछले कुछ दिनों से खबर गर्म है कि 1948 में राज कपूर द्वारा स्थापित आरके स्टूडियो भी इसी नियति को प्राप्त हो सकता है। हमारे देश के आधुनिक सांस्कृतिक इतिहास की बड़ी त्रासदी रही है कि उसे संजोने-संभालने का काम न तो हमारी सरकारें कर पाती हैं और न ही दुनिया में सबसे अधिक फिल्में बनाने का रिकॉर्ड बनाने वाली हमारी फिल्म इंडस्ट्री।

बहरहाल, आरके स्टूडियो का कारोबार कई वर्षाें से घाटे में था। कपूर परिवार के पास इसे बेच देने के अलावा आज कोई विकल्प नहीं बचा है। इस खस्ताहाली को पिछले साल सितंबर में लगी भयावह आग ने बहुत बढ़ा दिया था। उस भीषण दुर्घटना में संपत्ति का जो नुकसान हुआ, सो तो हुआ ही, इसमें राज कपूर की बनायी फिल्मों की तमाम यादगार चीजें भी जलकर खाक हो गयीं। यह भी एक अजीब संयोग ही है कि 1948 में जिस फिल्म के साथ इस स्टूडियो की शानदार यात्रा शुरू हुई थी, उसका नाम आगथा, और आग ने ही इस यात्रा को हमेशा के लिए विराम के बिंदु तक ला खड़ा कर दिया।

आरके स्टूडियो सिनेमा इतिहास के लिए एक अमूल्य निधि है। इसका नष्ट हो जाना एक अपूर्णनीय क्षति होगी। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि इसे या इस जैसी तमाम धरोहरों को आगामी पीढ़ियों के लिए बचा कर रखा जा सके।

आजादी के एक साल बाद जब यह स्टूडियो मुंबई के उपनगर चेंबूर में बना था, तब यह इलाका शहर से बाहर था, लेकिन कुछ ही सालों में तेजी से बढ़ते शहर का भाग बन गया। उस समय राज कपूर की उम्र महज 23 साल थी। पहली फिल्म आगतो कामयाब नहीं हो सकी थी, पर 1949 की बरसातने आरके स्टूडियो की किस्मत को लहलहा दिया। राज कपूर की यह फिल्म उनकी अन्य फिल्मों की तरह आज भी बड़े चाव से देखी जाती है।

इसी स्टूडियो में आवारा‘, ‘बूट पॉलिश‘, ‘जागते रहो‘, ‘श्री 420‘, ‘जिस देश में गंगा बहती है‘, ‘मेरा नाम जोकर‘, ‘बॉबी‘, ‘सत्यम शिवम सुंदरम‘, ‘प्रेम रोग‘, ‘राम तेरी गंगा मैलीजैसी अनेक फिल्में राज कपूर की सरपरस्ती में बनीं। ये फिल्में हमारे सिनेमा की सबसे उम्दा फिल्मों में शुमार की जाती हैं। जब 1980 के दशक में राज कपूर की सक्रियता कम हुई और 1988 में उनका निधन हुआ, तो उनके बेटों ने स्टूडियो की कमान संभाली और कई फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया। आरके स्टूडियो की एक खास विशेषता यह थी कि वहां बनने वाली फिल्मों में इस्तेमाल की गयीं चीजों को संभाल कर रख दिया जाता था। यह एक अनूठी बात थी क्योंकि तब अन्य स्टूडियो या निमार्ता ऐसा नहीं करते थे। इसी स्टूडियो में कैमरामैन राधू करमाकर, संगीतकार शंकर-जयकिशन, गीतकार शैलेंद्र जैसे अनेक नामचीन प्रतिभाओं ने उपलब्धियों के शिखर को छुआ। नरगिस, वैजयंती माला, पद्मिनी, जीनत अमान, सिमी ग्रेवाल, डिंपल कपाड़िया, पद्मिनी कोल्हापुरी, मंदाकिनी जैसी अभिनेत्रियों का कॅरियर परवान चढ़ा। अन्य कलाकारों और तकनीशियनों की गिनती करना मुश्किल है। यहां पर अन्य कई निमार्ता-निर्देशकों ने अपनी फिल्में बनायी थीं। कलात्मक और कारोबारी गतिविधियों के अलावा इस स्टूडियो में फिल्मी दुनिया का जुटान भी अक्सर होता था। राज कपूर की होली पार्टी तथा परिवार और करीबियों के शादी-ब्याह के आयोजनों के लिए भी यह जगह मशहूर हुआ करती थी।  जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह सिनेमा उद्योग के आर्थिक और तकनीकी पक्ष में भी लगातार बदलाव होता रहता है। एक बड़े स्टूडियो के रख-रखाव और मुनाफे के लिए जरूरी है कि अच्छी तादाद में फिल्मकार उस जगह को किराये पर लें। कई नयी जगहें कारोबार में आ गयी हैं। तकनीक और देश-विदेश में शूटिंग के बढ़ते प्रचलन का असर भी हुआ है। एक कारण यह भी है कि अपनी अन्य प्राथमिकताओं के चलते कपूर खानदान के मौजूदा वारिस स्टूडियो के प्रबंधन और सुविधाओं को बेहतर कर पाने में सफल न हो सके। ऐसे में स्टूडियो को कभी तो बंद होना ही था। लेकिन, कपूर परिवार और सरकार इतना तो कर ही सकती है कि स्टूडियो के एक हिस्से को राज कपूर की यादगार के रूप में सहेज लें।

ऐसा ही संकट 1950 के दशक में पुणे के प्रभात फिल्म कंपनी के सामने आया था। कर्ज की चुकौती नहीं हो पाने के कारण बैंक आॅफ महाराष्ट्र ने उस ऐतिहासिक स्टूडियो को अपने कब्जे में ले लिया था। तत्कालीन सरकार ने दूरदर्शिता दिखाते हुए उसे अधिग्रहित कर शिक्षण-प्रशिक्षण के संस्थान और संग्रहालय में बदल दिया। उस जगह को आज हम पुणे फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान तथा राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार के रूप जानते हैं।  सांस्कृतिक विरासत एक अमूल्य निधि है, जिसे आगामी पीढ़ियों के ज्ञान और संवेदना के विकास के लिए बचा कर रखा जाना चाहिए। आरके स्टूडियो का खत्म हो जाना सिनेमा इतिहास के एक गौरवपूर्ण अध्याय का खत्म हो जाना भी है।

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