हागठबंधन बनाने की जुगत जारी है। साथ ही हर बार की तरह उम्मीदों के बरक्स अपने शेयर हासिल करने की कवायद भी हो रही है। हर दल यही देख रहा है कि वह कैसे अभी से बड़ा दल बनने की ओर बढ़ सकता है। कांग्रेस के नये-नये अध्यक्ष बने राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने की इच्छा राजनीतिक गलियारों में विदेश से गूंजी थी। इधर देश में संभावित साथियों को लगने लगा कि यह उनके हित में सेंध लगाने की तरह है। लिहाजा अधिकतर ने इस पर मौन साध लिया। लगता है कि राहुल गांधी को बात समझ में आ गई और अब वह कहने लगे हैं कि प्रधानमंत्री पद पर फैसला चुनाव बाद होगा। सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी और उसके साथी दलों को सम्पूर्ण विपक्ष की यह सबसे बड़ी कमजोरी लगती है। नारा उछाला गया कि मोदी के मुकाबले कौन? उसके लिए यह नारा बनता भी है। जिस मोदी के नाम पर पार्टी ने अपने इतिहास की सबसे बड़ी जीत हासिल की है, उसके मुकाबले बाहर का कोई एक नेता दिखाई न दे, भाजपा के सुकून के लिए बहुत है।   विपक्ष अपने तरीक से जल्द ही यह दलील देता दिखाई दे सकता है कि पहले मोदी को हटाओ, हम तय कर लेंगे कि हमारा नेता कौन होगा। कहीं महंगाई और कहीं आर्थिक भगोड़ों को लेकर नारे तो दोनों ओर गढ़े जा रहे हैं। राजनीतिक दलों से अधिक सोशल मीडिया वाले गढ़ रहे हैं। नारे गढ़ने में दलों की ओर से कुछ कढ़े हुए लोग’  लगे हैं।

अगर मौका मिल गया तो सत्ता में भागीदारी भी छोटे-बड़े के लिहाज से ही मिलती है। महागठबंधन के लिए कुछ भी कुर्बान करने के बयानों के बीच कोई दल नहीं चाहता कि इस प्रक्रिया में अपना हित कमतर रखे।

दरअसल कढ़े हुए तो नेता भी हैं। जब भी गठबंधन की जरूरत महसूस हुई, सब बैर-भाव भुलाने की कोशिशें करते हुए दिखाई दिए। सम्भावित विपक्षी एकता की सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि इस बार ऐसा नहीं दिख रहा है। सपा और बसपा जैसी धुर विरोधी पार्टियां बुआ और बबुआ गठबंधनके तौर पर पहले से ही सक्रिय हैं। इस गठबंधन ने लोकसभा के दो और विधानसभा का एक उपचुनाव जीता तो लगने लगा कि गठबंधन को औपचारिक रूप जल्द ही मिल जायेगा। पहले से इन दोनों के साथ चौधरी अजित सिंह का आरएलडी था ही, कैराना उपचुनाव के बहाने कांग्रेस ने भी गठबंध को सहयोग किया था।

अब कांग्रेस को बीएसपी साथ रखने को तैयार नहीं दिखती। एसपी यानी समाजवादी पार्टी भी लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल से दूरी बनाती दिख रही है। पिछले विधानसभा चुनाव के मामले में पिता मुलायम सिंह यादव की नाराजगी झेलकर भी अखिलेश यादव ने राहुल गांधी की तरफ बड़ी मजबूती के साथ दोस्ती के हाथ बढ़ाये थे। परिणाम सकारात्मक नहीं रहे तो दोस्ती के प्रति उत्साह कम होता गया। इस बीच फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हुए तो कांग्रेस का साथ लिए बिना सपा ने बसपा के सहयोग से जीत हासिल कर ली। ये दोनों सीटें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद ने खाली की थीं। ऐसे महत्वपूर्ण उपचुनाव में कांग्रेस के बिना जीत का गणित अपने अनुकूल कर लेने वाले दलों को कांग्रेस के महत्वहीन होने का अंदाज लगने लगा। हाल यह है कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में बनने वाले गठबंधन में शामिल होना चाहती है और सपा-बसपा की बेरुखी कायम है।

कांग्रेस को लेकर सपा की न केवल बेरुखी है, बल्कि बसपा सुप्रीमो मायावती तो भाजपा के साथ कांग्रेस पर बराबर हमलावर भी हैं। पेट्रोल-डीजल के दाम पर कांग्रेस के नेतृत्व में भारत बंद से दोनों दलों ने अपने को अलग रखा। सपा ने जरूर बंद की जगह जिला और तहसील मुख्यालयों पर प्रदर्शन किया। इससे अलग बसपा सुप्रीमो ने  पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम के लिए कांग्रेस नेतृत्व वाली मनमोहन सिंह सरकार को भी दोषी बताया। पेट्रोल-डीजल के मूल्य सरकारी नियंत्रण से बाहर रखने के लिए उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए-2 सरकार को जिम्मेदार बताया। मायावती कहती हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार भी मनमोहन सिंह की पूर्ववर्ती सरकार के रास्ते पर चल रही है। सही मायनों में भाजपा के साथ कांग्रेस को भी अपने निशाने पर रखने वाली मायावती का बयान रणनीतिक लिहाज से देखा जाना चाहिए। हाल तक वह केवल भाजपा पर ही हमला करती रही हैं। आज जबकि कांग्रेस नेतृत्व सपा और बसपा के मामले में सहयोगात्मक रुख अपनाने की कवायद में जुटा है, मायावती भाजपा के साथ कांग्रेस को भी हमले के दायरे में रख रही हैं। राजनीतिक गलियारों में मायावती के बदले रुख को उनके पहले के एक बयान के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। उन्होंने कहा था कि वह अपनी पार्टी-हित की कीमत पर कोई भी समझौता नहीं करेंगी। दरअसल, वह भविष्य में बनने वाले गठबंधन में अपनी हिस्सेदारी को लेकर ऐसा कर रही हैं।

मायावती के दलीय-हित वाले बयान के बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा था कि वह विपक्षी एकता के लिए कोई भी बलिदान कर सकते हैं। तब सूत्रों के हवाले से खबर आई थी कि बबुआ और बुआके बीच लोकसभा और विधानसभा सीटों को लेकर समझौता हो रहा है। कहा गया कि लोकसभा सीटों के लिए सपा को अधिक सीटें दी जायेंगी, तो बसपा विधानसभा की अधिक सीटों पर चुनाव लड़ेगी। दोनों के बीच अजित सिंह के रालोद के लिए कोई मुश्किल नहीं दिखती। वहां तो लोकसभा के लिए पिता-पुत्र अजित-जयंत चौधरी के साथ कोई एक और लोकसभा की सीट मिल जाय तो विधानसभा के लिए रालोद 10 सीटों पर भी सहमत हो सकता है। मुश्किल कांग्रेस के सामने है कि 44 सीटें पाकर भी लोकसभा का सबसे बड़ा विपक्षी दल उत्तर प्रदेश में कितनी सीटों पर लड़ेगा।

राजस्थान के साथ मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, मिजोरम और तेलंगाना में भी विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं। मायावती की कोशिश मध्यप्रदेश में भी अपना प्रभाव बढ़ाने की है। दबाव बनाने की रणनीति में वह अन्य राज्यों में भी सीट शेयरिंग की बात कर सकती हैं। इस बार सफल हुईं तो इसी आधार पर लोकसभा चुनाव में दावेदारी की जा सकती है। कांग्रेस ऐसा नहीं चाहेगी।

राज्यों में अधिक सीटें हासिल करने के गरज से कांग्रेस ने अपने सारे घोड़े खोल दिए हैं। वह विपक्षी एकता के लिए कई स्तर पर काम कर रही है। महाराष्ट्र के नाराज दिग्गज नेता राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार को लगता है कि कांग्रेस नेताओं ने मना लिया है। पवार ने तो यहां तक कह दिया है कि चुनाव में जो सबसे बड़ी पार्टी होगी, उसी को प्रधानमंत्री की कुर्सी मिलेगी। पवार का यह बयान कांग्रेस को अपने अनुकूल लगता है। फिर भी सवाल यह है कि राज्यों के दिग्गज क्या अपने यहां कांग्रेस को चुनाव पूर्व बड़ी पार्टी मानने को तैयार होंगे। ऐसे में कांग्रेस राज्यों में अधिक सीटों पर नहीं लड़ी तो वह उस राज्य की क्षेत्रीय पार्टी को अपने से कमतर कैसे जता सकती है। खुद महाराष्ट्र में जहां बीजेपी की सरकार है, मुमकिन है कि इसके पूर्व के चुनाव के आधार पर कांग्रेस और पवार की एनसीपी से समझौता हो जाय। फिर भी सवाल बना रहेगा कि दलित मतदाता प्रभाव वाले क्षेत्रों में मायावती की बीएसपी भी अपने को आजमाना चाहेगी। उत्तर प्रदेश के बाद बिहार में लालू प्रसाद यादव को भी पवार की तरह कांग्रेस से कोई एतराज नहीं है। फिर भी इस बात से कैसे इंकार किया जा सकता है कि अपनी दूसरी पीढ़ी के लिए जी-जान से जुटे लालू अधिक सीटें नहीं मांगेंगे। वैसे भी वह पहले से ही महागठबंधन की मजबूरीबने हुए हैं। इन दिनों पड़ोसी राज्य झारखंड की रांची जेल में बंद होने के बावजूद लालू महागठबंधन के लिए काम कर रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि उनकी कोशिश से हेमंत सोरेन के झारखंड मुक्ति मोर्चा और बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व वाले झारखंड विकास मोर्चा जैसे ध्रुव भी एक हो रहे हैं। दोनों पार्टियां मजबूत जनाधार भी रखती हैं। देखना यह होगा कि कांग्रेस के प्रति अनुकूल नजरिया रखने वाले लालू इन दोनों के साथ खुद का भी ख्याल रखते हुए कैसे कांग्रेस-हित को संतुष्ट कर पाते हैं।   

सवाल तो तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दलों को लेकर भी है। बिहार और तमिलनाडु में कांग्रेस का साथ चाहने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी माकपा अपने प्रभाव वाले पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को सहभागी नहीं बनाना चाहती। और तो और, राजस्थान जैसे प्रदेश में भी उसे अकेले लड़ना बेहतर लग रहा है। माकपा ने तेलंगाना में भी कांग्रेस, टीडीपी और टीजेएस वाले महागठबंधन से शुरू में दूरी ही दिखाई। पश्चिम बंगाल में माकपा की कांग्रेस से दूरी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पूर्ववर्ती कांग्रेसी होने भर से नहीं है। वहां लंबे समय तक सत्ता में रही माकपा राज्य में अपने पुराने वजूद के लिए संघर्ष कर रही है और वह गठबंधन के जरिए हासिल नहीं हो सकती। ऐसा इसलिए कि कभी उसके प्रभाव वाले राज्य में कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल है। माकपा बिहार में राजद और तमिलनाडु में डीएमके से समझौते के लिए तो तैयार है, पर कांग्रेस के प्रति उसकी कोई रुचि नहीं है। बिहार में माकपा जूनियर होगी, तो तमिलनाडु में कांग्रेस जूनियर रहेगी। राज्य विधानसभा का सवाल हो तो कांग्रेस मान भी जाय। लोकसभा का चुनाव कांग्रेस और उसके अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए करो या मरो की तरह है। उस चुनाव में वह कहां-कहां क्षेत्रीय दलों के पीछे रहेगी। ऐसा नहीं हुआ तो महागठबंधन पर भी सवाल उठना लाजिमी है।

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डॉ. प्रभात ओझा
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में परास्नातक करने के बाद पीएचडी। आज, दैनिक जागरण और अमर उजाला जैसे समाचार पत्रों के बाद एम एच वन और हरियाणा न्यूज जैसे चैनलों भी में कार्य किया है। इस दौरान कई पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन। ‘शिवपुरी से श्वालबाख तक’ पुस्तक लेखन के अलावा कई अन्य पुस्तकों का संपादन किया है। इन दिनों हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषी न्यूज एजेंसी से जुड़े हैं। फिलहाल युगवार्ता साप्ताहिक के सहायक संपादक हैं।

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