मानवीय चेतना को उसके पूर्ण विकास तक ले जाना ही हमारी ऋषि संस्कृति का एकमात्र उद्देश्य रहा है। मरणेत्तर श्राद्ध-तर्पण की क्रियाएं इसी का एक प्रखर प्रमाण हैं। वर्ष में पितृपक्ष के पंद्रह दिन विशेष तौर से इसी के लिए नियत किये गये हैं, जिसकी मिसाल अन्य किसी देश-संस्कृति में नहीं मिलती। कई लोग तर्क देते हैं कि जो मर गया उनके लिए यह कर्मकांड कोरा अंधविश्वास है; पर यह उनकी संकीर्ण सोच है। आत्मा के अनश्वर एवं शाश्वत अस्तित्व की सुस्पष्ट धारणा के अनुरूप भारतीय दर्शन में जीवन की परिभाषा अति व्यापक है। देह-त्याग के बाद भी जीवात्मा के विकास एवं परस्पर भावपूर्ण आदान-प्रदान की व्यवस्था इसमें निहित है। भारतीय श्राद्ध परम्परा में जीवन के प्रति एक समग्र दृष्टि एवं पद्धति के दिग्दर्शन होते हैं।

पिंडदान मोक्ष प्राप्ति का एक सहज और उत्तम मार्ग है। किसी वस्तु के गोलाकर रूप को पिंड कहा जाता है। प्रतीकात्मक रूप में शरीर को भी पिंड कहा जाता है।

पितरों के लिए श्रद्धा व शुभ संकल्प के साथ किया जाने वाला पिंडदान व तर्पण श्राद्धकहलाता है। यह परम्परा हमारी सनातन संस्कृति की एक अनूठी परम्परा है। माना जाता है कि श्राद्ध करने की परम्परा वैदिक काल के बाद से आरम्भ हुई। गरुण पुराण में कहा गया है कि इस अवधि में जिनके पुत्र-पौत्र व प्रपौत्र अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धाभाव से पिंड-तर्पण व दान-पुण्य करते हैं; उनके पितर प्रसन्न होकर उसे सूक्ष्म रूप से ग्रहण कर उनको अपना आशीर्वाद देते हैं।

हमारे धर्मग्रंथों में तीन पीढ़ियों तक का श्राद्ध करने का विधान बताया गया है। पौराणिक मान्यता है कि मृत्यु के देवता यमराज प्रतिवर्ष श्राद्ध पक्ष में सभी जीवों को मुक्त कर देते हैं ताकि वह अपने धरतीवासी स्वजनों के पास जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें। इसके लिए भाद्रपद माह की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक एक पखवारे की अवधि श्राद्ध कर्म के लिए निर्धारित है। इस वर्ष यह अवधि 24 सितंबर से आठ अक्टूबर तक रहेगी।

हिन्दू धर्म शास्त्रों में तीन प्रकार के ऋणों का उल्लेख मिलता है – देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। इन तीनों में पितृ ऋण सबसे बड़ा है और इस ऋण से मुक्ति के लिए ही हमारे पूर्वजों ने श्राद्ध का विधान बनाया था। शास्त्रीय मान्यता सूर्य के कन्याराशि में आने पर निर्धारित अवधि के लिए हमारे पितर पृथ्वी पर आते हैं तथा विभिन्न स्वरूपों में सूक्ष्म रूप से मौजूद रहकर उचित तरीके से किये गये श्राद्ध तर्पण को प्रेमपूर्वक ग्रहणकर तृप्त होकर अपने वंशजों को सुख तथा समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि जो लोग अपने पितरों का श्राद्ध तर्पण नहीं करते, वे कुपित हो उन्हें शाप भी देते हैं; इसलिए हिन्दू धर्म में प्रत्येक धरतीवासी को यथासंभव अपने पितरों का तर्पण करने की बात कही गयी है।

श्राद्ध के तत्वदर्शन की व्याख्या करते हुए ऋषि मनीषा कहती है कि पिंडदान मोक्ष प्राप्ति का एक सहज और उत्तम मार्ग है। किसी वस्तु के गोलाकर रूप को पिंड कहा जाता है। प्रतीकात्मक रूप में शरीर को भी पिंड कहा जाता है। पिंडदान के समय मृतक के निमित्त अर्पित किए जाने वाले पदार्थ, जिसमें जौ या चावल के आंटे को गूंथकर बनाया गया गोलाकृति पिंड कहलाता है। दक्षिणाभिमुख होकर आचमन कर अपने जनेऊ को दाएं कंधे पर रखकर चावल, गाय के दूध, घी, शक्कर एवं शहद को मिलाकर बने पिंडों को श्रद्धा भाव के साथ अपने पितरों को अर्पित करना पिंडदान कहलाता है। जल में काले तिल, जौ, कुशा एवं सफेद फूल मिलकार उस जल से विधिपूर्वक तर्पण किया जाता है। पितृभोज में गाय, कुत्ता, कौवा और चींटियों को देना आवश्यक माना जाता है। कहा जाता है कि कौवे व अन्य पक्षियों द्वारा भोजन ग्रहण करने पर पितरों को भोजन प्राप्त हो जाता है। पक्षियों को पितरों का दूत व विशेष रूप से कौवे को उनका प्रतिनिधि माना जाता है। मान्यता है कि इससे पितर तृप्त होते हैं। इसके बाद श्राद्ध के बाद सुपात्र ब्राह्मण को भोजन कराकर यथाशक्ति दक्षिणा देने का विधान श्राद्धकर्म कहलाता है।

काशी में त्रिपिंडी श्राद्ध

धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी वैसे तो मोक्ष की नगरी के नाम से जानी जाती है। कहा जाता है कि यहां प्राण त्यागने वाले हर इन्सान को भगवन शंकर खुद मोक्ष प्रदान करते हैं। मगर जो लोग काशी से बाहर या काशी में अकाल प्राण त्यागते हैं उनके मोक्ष की कामना से काशी के पिशाच मोचन कुण्ड पर त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है। काशी के अति प्राचीन पिशाच मोचन कुण्ड पर होने वाले त्रिपिंडी श्राद्ध की मान्यताएं हैं कि पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मरने के बाद व्याधियों से मुक्ति मिल जाती है। इसीलिए पितृ पक्ष के दिनों तीर्थ स्थली पिशाच मोचन पर लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है। काशी पूरे विश्व में घाटों और तीर्थ के लिए जाना जाता है। 12 महीने चैत्र से फाल्गुन तक 15-15 दिन का शुक्ल और कृष्ण पक्ष का होता है लेकिन आश्विन मास के कृष्ण पक्ष से शुरू होता है पितृ पक्ष, जिसको कि पितरों की मुक्ति का 15 दिन माना जाता है। इन 15 दिनों के अन्दर देश के विभिन्न तीर्थ स्थलों पर श्राद्ध और तर्पण का कार्य होता है। देश भर में सिर्फ काशी के ही अति प्राचीन पिशाच मोचन कुण्ड पर होता है त्रिपिंडी श्राद्ध जो पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मरने के बाद व्याधियों से मुक्ति दिलाता है। वाराणसी का ये तीर्थ पूरे उत्तर भारत का विमल तीर्थ है, जहां पर संस्कृत के श्लोकों के साथ तीन मिट्टी के कलश की स्थापना की जाती है जो काले, लल और सफेद झंडों से प्रतीक होते हैं। प्रेत बाधाएं तीन तरीके की होती हैं। सात्विक, राजस, तामस। इन तीनों बाधाओं से पितरों को मुक्ति दिलवाने के लिए काला, लल और सफेद झंडे लगाये जाते हैं। जिसे भगवन शंकर, ब्रह्मा और विष्णु के प्रतीक के रूप में मानकर तर्पण और श्राद्ध का कार्य किया जाता है।

शास्त्रों में कहा गया है कि हम सभी लोग अपने पूर्वजों के अंश हैं, उन्हीं से हमारी पहचान बनी हुई है। इसलिए हमें इस विशेष अवधि में अपने पूर्वजों को अवश्य याद करना चाहिए। इन दिनों पितरों की प्रसन्नता के लिए भगवद्गीता या भागवत पुराण का पाठ उत्तम माना जाता है। माना जाता है कि यदि इस अवसर पर पूर्वजों के सम्मान में उनके नाम से प्याऊ, स्कूल, धर्मशाला आदि के निर्माण में सहयोग करें तो पूर्वज कृपा बनाये रखते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि पितरों को धन से नहीं, बल्कि भावना से प्रसन्न करना चाहिए। विष्णु पुराण में कहा गया है कि निर्धन व्यक्ति अपने पितरों को तिल मिश्रित जल से तर्पण कर और गाय को हरा चारा खिलाकर अपने पितरों को श्रद्धा अर्पित कर सकता है। महाभारत के अनुसार महातपस्वी अत्रि मुनि ने सबसे पहले श्राद्ध का उपदेश महर्षि निमि को दिया था।

श्राद्ध तीर्थ गया

वैसे तो देश के कई स्थानों में पिंडदान किया जाता है परंतु बिहार में फल्गु नदी तट पर बसे बोधगया में पिंडदान का विशेष महात्म्य है। गया को विष्णु का नगर माना गया है। यह मोक्ष की भूमि कहलाती है। विष्णु पुराण और वायु पुराण में भी इसकी चर्चा की गई है। विष्णु पुराण के मुताबिक, गया में पिंडदान करने से पूर्वजों को मोक्ष मिल जाता है।

माना जाता है कि स्वयं विष्णु यहां पितृ देवता के रूप में विद्यमान हैं। ऐसा माना जाता है कि भगवान राम और देवी सीता ने भी राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए गया में ही पिंडदान किया था। महाभारत में लिखा है कि फल्गु तीर्थ में स्नान करके जो मनुष्य श्राद्धपक्ष में भगवान गदाधर (भगवान विष्णु) के दर्शन करता है, वह पितर ऋण से मुक्त हो जाता है। कहा जाता है कि गया में पहले विभिन्न नामों की 360 वेदियां थीं, जहां पिंडदान किया जाता था। इनमें से अब 48 ही बची हैं।

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