सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की ओर से अच्छी खबर आ रही है। केन्द्र सरकार की सख्ती की वजह से अब बैंकों की गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) में कमी आने लगी है, जबकि बैड लोन की रिकवरी तेजी से बढ़ी है। बैंकों के फंसे कर्ज को वसूलने की सरकार की कोशिश का प्रत्यक्ष परिणाम नजर आने लगा है और उम्मीद है कि मौजूदा वित्त वर्ष में एक लाख अस्सी हजार करोड़ रुपये के फंसे कर्ज की वसूली कर ली जायेगी। सरकार के प्रयासों की वजह से पिछले वित्त वर्ष में भी बैंकों ने 74,562 करोड़ रुपये की रिकवरी करने में सफलता पायी थी। अहम बात तो यह है कि कई बड़े डिफॉल्टर अब खुद अपने लोन की वापसी के लिए या लोन सेटेलमेंट के लिए आगे आने लगे हैं।

जानकारों का मानना है कि संशोधित दिवालिया कानून यानी इंसॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी) के सख्त प्रावधानों और नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) की कार्रवाई की वजह से सरकारी बैंकों का लोन लेकर पचा जाने वाले कारोबारी अब खुद लोन सेटेलमेंट करने के लिए आगे आ रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का एनपीए चिन्ताजनक स्तर तक पहुंच चुका है। इसी वजह से भारतीय रिजर्व बैंक ने प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (पीसीए) की प्रक्रिया के तहत सार्वजनकि क्षेत्र के 11 बैंकों पर कई बंदिशें लगा दी है, जिनमें नये कर्ज देने पर रोक लगाना भी शामिल है। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी 25 सितंबर को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के वार्षिक प्रदर्शन की समीक्षा बैठक में भाग लेने के बाद एनपीए रिकवरी में तेजी आने की बात की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि इससे एनपीए का आकार पहले की तुलना में कम हुआ है। उनका कहना था कि मौजूदा वित्त वर्ष में न केवल 1.8 लाख करोड़ रुपये के बैड लोन की रिकवरी की जायेगी, बल्कि बैंकों की स्थिति मजबूत करने के लिए उनकी नॉन कोर परिसंपत्तियों को बेचकर 18,500 करोड़ रुपये की पूंजी भी जुटायी जा सकेगी, जिससे सरकारी बैंकों का पूंजी आधार मजबूत हो सकेगा।

एनपीए की समस्या से बैंकिंग सेक्टर का दम निकला हुआ है। परंतु अब संशोधित दिवालिया कानून की वजह एनपीए के मोर्चे पर सकारात्मक परिणाम आने लगे हैं। बैंकों के फंस चुके कर्जों की वसूली में तेजी आयी है, जिससे एनपीए का आकार भी घटने लगा है।

जानकारों का कहना है कि संशोधित दिवालिया कानून (आईबीसी) के तहत हाल के दिनों में भूषण स्टील, इलेक्ट्रोस्टील, लैंको इंफ्रास्ट्रक्चर, आलोक इंडस्ट्रीज, भूषण पावर ऐंड स्टील और मोनेट इस्पात जैसे बड़े डिफॉल्टर्स पर जैसी कार्रवाई हुई है, उसने बैंक का पैसा दबा लेने वाले कारोबारियों में डर का माहौल बना दिया है। अभी भी इस कानून के तहत एस्सार स्टील, एरा इंफ्राटेक, जेपी इंफ्राटेक और एबीजी शिपयार्ड जैसी बड़ी कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई जारी है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में फिलहाल विभिन्न कंपनियों के 9,073 मामले विचाराधीन हैं, इनमें 2,511 मामले दिवालिया कानून को लेकर चलाये जा रहे हैं। इन 2,511 मामलों की सुनवाई पूरी होने के बाद बैंकों की बड़ी राशि बैड लोन के फंदे से मुक्त हो सकेगी। इसके अलावा कंपनी लॉ बोर्ड और डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल (डीआरटी) में भी विचाराधीन लगभग 25,000 मामलों को संशोधित दिवालिया कानून के तहत लाये जाने की तैयारी चल रही है। माना जा रहा है कि इन विचाराधीन मामलों में लगभग सात लाख करोड़ रुपये की राशि बैड लोन के रूप में फंसी हुई है।

वित्त मंत्रालय में संयुक्त सचिव स्तर के एक अधिकारी के अनुसार आने वाले दिनों में बैंक डिफॉल्टर्स से बैड लोन की वसूली के लिए केंद्र सरकार के निर्देश पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक और भी मामले नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के पास भेज सकते हैं, जिससे कि बैड लोन की रिकवरी में तेजी आयेगी। हालांकि प्रारंभिक तौर पर बैंकों की ओर से डिफॉल्टर्स को इस बात की चेतावनी भी दी जा रही है कि वे कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में केस जाने के पहले ही अपने बैड लोन का निपटारा कर लें। यदि एक बार दिवालिया कानून के तहत मामला नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के पास चला गया, तो वैसी स्थिति में कारोबारियों के पास अपना गला बचाने का कोई तरीका नहीं बचेगा। संशोधित दिवालिया कानून के तहत नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में विचाराधीन मामलों को अधिकतम 270 दिनों में निपटा लेने की बाध्यता तय की गयी है। ट्रिब्यूनल फिलहाल अपने 11 बेंच में इनकी सुनवाई कर रहा है। इसके पहले नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के सामने विचाराधीन मामलों का निपटारा करने के लिए कोई निश्चित समय सीमा नहीं होती थी, जिसकी वजह से बकायेदार मामले को लंबा खींचने की कोशिश में लगे रहते थे। अब 270 दिनों की बाध्यता हो जाने की वजह से बकायेदारों के लिए मामले को लंबा खींच कर अपना गला बचाना भी संभव नहीं रह गया है। टाटा संस लिमिटेड के पूर्व निदेशक आर गोपालकृष्णन का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में स्थितियां काफी तेजी से बदली हैं। 2008 से लेकर 2014 तक का दौर बैंकों द्वारा अंधाधुंध तरीके से बड़े कर्ज दिये जाने का था।

यही कारण है कि सिर्फ छह सालों में ही बैंकों ने कारोबारियों को लगभग 34 लाख करोड़ रुपये का कर्ज जारी कर दिया। बैंकिंग व्यवस्था के लिए सिरदर्द बने एनपीए में इस दौर में दिये गये कर्ज का काफी बड़ा योगदान है। परंतु, पिछले दो-ढाई सालों के दौरान कर्ज वसूली की प्रक्रिया तेज हुई है। दिवालिया कानून में संशोधन के बाद डिफॉल्टर्स को कड़ी कार्रवाई का डर भी सताने लगा है। केंद्र सरकार ने बैंकों को 50 करोड़ रुपये से अधिक के एनपीए के मामलों में फर्जीवाड़ा पकड़ने और कार्रवाई शुरू करने के लिए दिसंबर 2018 तक का वक्त दिया है। इसी तरह बैंकों को दिसंबर 2018 तक ही ऐसा तंत्र भी विकसित करने का निर्देश दिया गया है, जिससे किसी कर्ज खाता के एनपीए खाता के रूप में तब्दील होने के पहले ही चेतावनी के संकेत मिल जायें। ऐसा होने से समय रहते ही उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू की जा सकेगी, ताकि नये एनपीए का बोझ बैंकों पर कम से कम पड़े। ऐसा करने के लिए बैंकों की शाखाओं में वैधानिक आॅडिट को स्वतंत्र बनाये जाने का प्रावधान किया गया है। इसमें आॅडिटर कि जो भी टिप्पणी होगी, उन पर समयबद्ध तरीके से कार्रवाई सुनिश्चित करने की बात कही गयी है। साथ ही किसी कर्ज खाता के एनपीए होने के पहले ही व्यक्तिगत गारंटी पर भी कार्रवाई की जायेगी। इसके अलावा उधार लेने वाली कंपनियों और उसके प्रमोटरों पर भी लगातार नजर रखने की बात कही गयी है।

इसके अलावा चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में बैंकों को 50 करोड़ रुपये से अधिक के एनपीए को स्ट्रेस ऐसेट मैनेजमेंट कंपनी को हस्तांतरित करने के लिए कहा गया है। एनपीए पर नियंत्रण पाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक के देखरेख में एक डेटाबेस बनाया जायेगा और डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल में सभी दस्तावेजी प्रक्रिया समयबद्ध तरीके से पूरी की जायेगी। इसके तहत जिन परिसंपत्तियों की नीलमी की जा सकती है, उनका अलग से डेटाबेस तैयार किया जायेगा और उसे सक्रियता से प्रचारित किया जायेगा। ऐसा होने से नीलामी में भाग लेने के इच्छुक लोग समय रहते अपना मन बना सकेंगे और अगर कंपनी के प्रोमोटर भी नीलामी से बचने चाहें, तो उन्हें भी लोन सेटलमेंट करने के लिए समय मिल जायेगा। निश्चित रूप से दिवालिया कानून में संशोधन होने और केंद्र सरकार की सख्ती के बाद एनपीए की रिकवरी में तेजी आयी है, लेकिन अभी भी इसे और तेज करने की जरूरत है। इसके साथ ही नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के कामकाज में भी और तेजी लाए जाने की जरूरत है। ऐसा ट्रिब्यूनल के बेंच की संख्या को बढ़ाकर ही किया जा सकता है। फिलहाल एनसीएलटी के पास दिवालिया कानून के तहत ही 2,511 मामले विचाराधीन है। इन मामलों का निपटारा अधिकतम 270 दिनों में किया जाना है। इसमें भी मूल समय सीमा 180 दिन की ही है, जिसे 90 दिनों के लिए और बढ़ाया जा सकता है। निश्चित रूप से ये समय सीमा एक सकारात्मक संकेत देती है, लेकिन इसकी वजह से नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल पर मामलों के निपटारे का दबाव काफी ज्यादा हो गया है। इसलिए सरकार को इस दिशा में विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए और ट्रिब्यूनल के बेंच की संख्या जल्द बढ़ायी जानी चाहिए। अगर ऐसा हो सका, तो आने वाले समय में एनपीए के नाम से कुख्यात बैड लोन की समस्या पर काफी हद तक काबू पाने में सफलता मिल जायेगी।

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विनय के पाठक
रांची विश्वविद्यालय से स्नातक। वर्ष 1988 में रांची में ही फील्ड रिपोर्टर के रूप में रांची एक्सप्रेस से जुड़े। उसके बाद साप्ताहिक रविवार, प्रभात खबर, सेंटिनल, पांचजन्य, राजस्थान पत्रिका, टेलीग्राफ, इकोनॉमिक्स टाइम्स, अमर उजाला, बीएजी फिल्म्स, न्यूज 24, इंडिया टीवी, जी न्यूज जैसी संस्थाओं के लिए उप संपादक से लेकर विशेष संवाददाता, सहायक फीचर एडिटर, समन्वय संपादक, एक्जक्यूटिव प्रोड्यूसर जैसे पदों पर कार्य कर चुके हैं। टीवी की दुनिया में ‘पोलखोल’ और ‘सनसनी’ जैसे कार्यक्रमों का भी प्रोडक्शन किया है।

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