पेट्रोल और डीजल की कीमत में हुई कटौती से निश्चित रूप से उपभोक्ताओं को काफी राहत मिली है। केंद्र सरकार ने अपनी ओर से ढाई रुपये प्रति लीटर की राहत दी है और राज्य सरकारों से भी वैट में इतनी ही कटौती करने की अपील की है। केंद्र की अपील का असर भी हुआ है और अधिकांश बीजेपी शासित राज्यों ने वैट में ढाई रुपये की कटौती कर दी है। इससे देश के अधिकांश राज्यों में पेट्रोल और डीजल की कीमत पांच रुपये तक कम हो गयी है। पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत पिछले कुछ समय से लगातार बढ़ रही है। इसकी बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत का बढ़ना और डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत का गिरना ही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में फिलहाल 86 डॉलर प्रति बैरल की दर पर कच्चे तेल का सौदा हो रहा है। वहीं रुपया भी अपने रिकॉर्ड स्तर पर नीचे गिर चुका है। इसकी वजह से देश का आयात बिल लगातार बढ़ता जा रहा है और हर क्षेत्र में महंगाई बढ़ने की आशंका बन गई है। केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल की कीमत में जो ढाई रुपये की राहत दी है, उसमें उत्पाद शुल्क को डेढ़ रुपये प्रति लीटर कम किया गया है, जबकि आॅयल मार्केटिंग कंपनियों ने प्रति लीटर एक रुपये की राहत दी है। उत्पाद शुल्क में डेढ़ रुपये की कमी करने से सरकारी खजाने को लगभग 10,500 करोड़ रुपये का नुकसान होगा। हालांकि वित्त मंत्री अरुण जेटली का कहना है कि उत्पाद शुल्क में इस कटौती से वित्तीय घाटे पर महज 0.05 फीसदी का ही भार पड़ेगा। सच्चाई तो ये है कि जैसे-जैसे कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है, वैसे-वैसे उत्पाद शुल्क के रूप में सरकार को मिलने वाली राशि की मात्रा भी बढ़ती चली आती है। यही स्थिति वैट के साथ है। कच्चे तेल की कीमत में बढ़ोतरी के साथ-साथ राज्यों को वैट के रूप में मिलने वाली राशि की मात्रा भी बढ़ती जाती है। विपक्षी पार्टियां लंबे समय से केंद्र से उत्पाद शुल्क में कटौती करने की मांग करती रही हैं, लेकिन जिन राज्यों में इन पार्टियों की सरकार है, वहां ये खुद वैट को कम करने के प्रति इच्छुक नजर नहीं आतीं। कहा जा सकता है कि केंद्र पर पांच राज्यों में जल्द होने वाले विधानसभा चुनावों का दबाव था और इसीलिए उसे पेट्रोल-डीजल के उत्पाद शुल्क में कटौती करने के लिए बाध्य होना पड़ा। लेकिन उसे आगे भी उत्पाद शुल्क में और कटौती के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां अभी भी विकट बनी हुई हैं। ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंध और ओपेक देशों द्वारा कच्चे तेल के उत्पादन में बढ़ोतरी करने से इनकार करने के कारण कच्चे तेल की कीमत में अभी और तेजी आने के आसार हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने पर पेट्रोल-डीजल की कीमत में फिर से उछाल दिखने लगेगा और ये बात चुनावी साल में सरकार के लिए काफी चुनौतीपूर्ण होगी। इसलिए केंद्र सरकार को आने वाले दिनों में भी पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत पर नजर बनाए रखना होगा, ताकि पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमत आने वाले दिनों में उसके लिए गले की फांस न बन जाए। बेहतर तो यह होगा कि पेट्रोलियम पदार्थों के कीमत को नियंत्रित रखने के लिए सरकार इसे जीएसटी के दायरे में लाने की बात पर विचार करे। केंद्र को अब खुद आगे बढ़कर इसकी पहल करनी चाहिए, ताकि इनकी कीमत पर कुछ हद तक नियंत्रण किया जा सके। फिलहाल देश की जनता को पेट्रोल-डीजल की कीमत में मिली पांच रुपये की राहत स्वागत योग्य है। इस बात की उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार का नजरिया आगे भी उपभोक्ता सापेक्ष ही रहेगा और वह जरूरत के मुताबिक उत्पाद शुल्क में कटौती कर उपभोक्ताओं को राहत पहुंचाने की कोशिश करती रहेगी।

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