गुजरात में कच्छ जिले के एक गांव सतपार में एक सभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत बहुत तेजी से आर्थिक प्रगति कर रहा है। जल्दी ही वह ब्रिटेन को पीछे छोड़कर संसार की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हो जाएगा। इस तरह की घोषणाएं करने वाले प्रधानमंत्री पहले व्यक्ति नहीं हैं। उनसे पहले कई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक विशेषज्ञ इस तरह की भविष्यवाणी कर चुके हैं। दरअसल प्रधानमंत्री उन्हीं की बातों को दोहरा रहे थे। संसार के विभिन्न देशों की समृद्धि आंकने का यह सिलसिला अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक ने आरंभ किया था। फिर संयुक्त राष्ट्र का सांख्यिकी विभाग भी इस तरह के तुलनात्मक आंकड़े प्रसारित करने लगा। अंतरराष्ट्रीय जगत में इस तरह की तुलनाओं का महत्व इसलिए है कि उन्हीं से संकेत लेकर पूंजी निवेश करने वाली अंतरराष्ट्रीय शक्तियां अपने पूंजी निवेश की दिशा तय करती हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक ने पिछली आधी से अधिक शताब्दी से संसार के अधिकांश देशों की आर्थिक नीतियों को प्रभावित किया है। भारत में जब तक अपने आर्थिक विकास के लिए इन संस्थाओं से मिलने वाले कर्ज पर निर्भरता रही विपक्षी राजनीतिज्ञों और अनेक आर्थिक विशेषज्ञों द्वारा सरकार की तीखी आलोचना होती रही। सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए यह आक्षेप किए जाते रहे कि सरकार अपनी नीतियां स्वयं नहीं बना रही, बल्कि उसकी नीतियां अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के इशारे पर तय हो रही हैं। अब भारत अपनी विकास योजनाओं के लिए इन संस्थाओं के कर्ज पर निर्भर नहीं है। भारत के अपने साधन भी तेजी से बढ़े हैं। दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय निवेश का स्वरूप ही बदल गया है। अब विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाओं का काफी पैसा निजी या वित्तीय संस्थाओं के माध्यम से आसानी से सरकारों और निजी कंपनियों को उपलब्ध हो जाता है, बशर्तें कि निवेश की गई पूंजी और उस पर मिलने वाले लाभ की उचित गारंटी हो।

भारत में जब तक अपने आर्थिक विकास के लिए इन संस्थाओं से मिलने वाले कर्ज पर निर्भरता रही विपक्षी राजनीतिज्ञों और अनेक आर्थिक विशेषज्ञों द्वारा सरकार की तीखी आलोचना होती रही। अब भारत अपनी विकास योजनाओं के लिए इन संस्थाओं के कर्ज पर निर्भर नहीं है।

यह पैसा भी दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं पर उतना ही घातक असर डाल रहा है, जितना अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष या विश्व बैंक से मिलने वाले कर्ज के साथ मिलने वाले उनके नीति संबंधी आग्रह डाला करते थे। भारत भी उसका अपवाद नहीं है। हमारे आर्थिक विशेषज्ञों और नेताओं का ध्यान भी वैसा ही औद्योगिक तंत्र खड़ा करने पर लगा रहता है, जैसा अन्य औद्योगिक देशों ने अपने यहां खड़ा किया है। प्रधानमंत्री का अपने भाषण में यह कहना कि हवाई यात्रा के मामले में भारत की उपलब्धियां काफी बड़ी हैं, एक तरह की गर्वोक्ति है। इस गर्वोक्ति में अपने आपमें कोई दोष नहीं है। लेकिन देश की प्रगति नापने का आधार केवल इस तरह की उपलब्धियां नहीं हो सकतीं। प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार का लक्ष्य घोषित करते हुए अपने इस भाषण में कुछ अत्यंत सार्थक बातें भी कहीं थी। उन्होंने कहा था कि वे इस बात के लिए कृतसंकल्प हैं कि भारत में हर बच्चे को शिक्षा मिले, हर खेत को पानी उपलब्ध हो, हर युवा के पास अपना आय का कोई साधन हो और हर बुजुर्ग को चिकित्सा की सुविधाएं उपलब्ध हों। कोई प्रधानमंत्री इस तरह के लक्ष्य अपने सामने रखे, यह प्रशंसनीय बात है। लेकिन इस तरह की सब योजनाओं में मात्रा का ही ध्यान रह पाता है, गुणवत्ता का नहीं। हमने पिछले सात दशकों में स्कूलों की संख्या खूब बढ़ाई है। लेकिन उनमें जिस तरह की शिक्षा दी जाती है, वह देश को कुशल और विवेकशील नागरिक देने के बजाय अकुशल बेरोजगार ही उपलब्ध कर रही है। खेती के लिए सिंचाई सबसे आवश्क तत्व है। लेकिन कृषि को हमने मिट्टी, जल, रासायनिक और नियंत्रित परिस्थितियों में तैयार किए गए बीज का एक फार्मूला बना दिया है। भारत का किसान हरित क्रांति से पहले तक संसार का सबसे कुशल किसान माना जाता था। अब वह अपनी खेती के बारे में कोई निर्णय स्वयं नहीं करता। कृषि वैज्ञानिकों के इशारे पर नाचता और अक्सर बर्बाद होता है। किसानों की जितनी आत्महत्याएं अपने देश में होती है, उतनी और कहीं सुनने में नहीं आती। नौजवानों को स्वरोजगार के साधनों की आज कमी नहीं है। लेकिन उन्होंने पुराना पारिवारिक कौशल सीखना छोड़ दिया है और नया कौशल उन्हें ठीक से सिखाया नहीं गया। बुजुर्ग आज जितने असहाय दिखाई देते हैं, पहले कभी नहीं थे। परिवार की संस्था के कमजोर होने का यह स्वाभाविक परिणाम है।

इन सब परिस्थितियों के लिए निश्चय ही प्रधानमंत्री को दोष नहीं दिया जा सकता। लेकिन प्रधानमंत्री राज्य का मुखिया ही नहीं होता, वह अपने समाज का अग्रणी नेता भी होता है। उसकी शक्ति उसके राज्यतंत्र की शक्ति से ऊपर है। इसलिए उसकी भाषा में राज्य की उपलब्धियां ही ध्वनित नहीं होनी चाहिए, समाज के लक्ष्य और समाज का गौरव भी ध्वनित होना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय शक्ति तंत्र में इस बात का महत्व हो सकता है कि भारत ने 2016 में फ्रांस को पीछे छोड़कर संसार की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का गौरव प्राप्त कर लिया और शीघ्र ही वह ब्रिटेन को पीछे छोड़कर संसार की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने जा रहा है। लेकिन एक अरब तीस करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले भारत की तुलना सात-आठ करोड़ जनसंख्या वाले देशों से नहीं की जा सकती। इस बात का सांकेतिक महत्व हो सकता है कि सात दशक में हम उस ब्रिटेन को पीछे छोड़ने की तैयारी कर रहे हैं, जो 1947 तक लगभग 90 वर्ष भारत पर शासन करता रहा और जिसके साम्राज्य में उस समय सूरज कभी डूबता नहीं था। पर भारत की स्थिति उससे पहले संसार की सबसे अग्रणी सभ्यता के रूप में रही थी। वही अब हमारा लक्ष्य होना चाहिए। सभ्यता केवल आर्थिक साधनों के जोड़ से नहीं आंकी जाती। बहुत से मामलों में भारतीय आज भी संसार के सबसे अग्रणी समाज के रूप में देखे जा सकते हैं। लेकिन आर्थिक, सामरिक और सामाजिक क्षेत्र में हम अब भी अपने उस स्थान से काफी पीछे हैं, जो कुछ शताब्दी पहले तक हमारा स्थान रहा है। हमें चीन की तरह संसार की पहली या दूसरी शक्ति बनने की होड़ में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि इस तरह की होड़ केवल राज्य की शक्ति और साधनों के बल पर की जा सकती है। हमारी सभ्यता हमारे लोगों की सामाजिकता, नैतिक आचरण, उचित साधनों से प्राप्त समृद्धि और अपने आसपास के सभी प्राणियों के हितों के साथ अपने हितों का समाहार करते हुए विकसित की गई जीवनशैली के लिए प्रशंसित रही है। वही आज भी हमारा लक्ष्य होना चाहिए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दिशा में कुछ कदम उठाए हैं। स्वच्छता अभियान तथा योग आदि पर बल ऐसे ही कुछ कदम हैं। लेकिन अभी भी हर तरह का नीति-निर्धारण कुछ मुट्ठीभर लोग ही कर रहे हैं। नीतियों के कार्यान्वयन में भी हमने टेक्नोलॉजी पर आवश्यकता से अधिक निर्भरता दिखाई है। उसके पीछे तर्क यह है कि उससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा है। लेकिन हमारा लक्ष्य ऐसी सामाजिक विधियां खोजना होना चाहिए, जिससे भ्रष्ट आचरण करने वाले लोग निंदित हों और साफ-सुथरे लोग समाज की व्यवस्थाओं को चला रहे हों। टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से हम एक मशीनी व्यवस्था तो बना सकते हैं, जो कुछ मुट्ठीभर लोग चला रहे हों और उसका लाभ सीधे विभिन्न वर्गों तक पहुंच रहा हो। लेकिन इससे समाज का नैतिक अनुशासन पैदा या दृढ़ नहीं होता। फिर भी पराधीनता के दौर में हमारे निचले वर्गों में जो साधनहीनता और असामर्थ्य आया है, उसे देखते हुए हमें उन्हें जल्दी से जल्दी समर्थ बनाना है। अगर वह काम समाज का स्थापित तंत्र समुचित रूप से नहीं कर रहा तो दूसरे साधनों का उपयोग होगा ही। लेकिन यह सब करते हुए हमें इतना भर याद रखना है कि हमारा बड़ा लक्ष्य अच्छा समाज है, टेक्नोलॉजी पर टिका दक्ष राज्यतंत्र नहीं।

यह सही है कि हम अपने स्वतंत्र लक्ष्य रखते हुए भी बाकी दुनिया से आंखें मूंदे नहीं रह सकते हैं। इस समय अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं चार तरह से विभिन्न देशों की आर्थिक शक्ति और दिशा का आकलन करती हैं। एक तरीका तो सकल घरेलू उत्पादन के आधार पर तालिका बनाना है, जिसमें अभी हम छठे स्थान पर हैं और शीघ्र ही पांचवें स्थान पर आ जाने वाले हैं। दूसरा तरीका आर्थिक वृद्धि की दर के हिसाब से अर्थव्यवस्था की शक्ति और दिशा आंकना है। इस हिसाब से भी भारत आज संसार के सबसे तेज वृद्धि दर वाले देशों में गिना जाता है। तीसरा तरीका प्रति व्यक्ति आय के आधार पर तुलना करने का है। यह विश्वसनीय नहीं है क्योंकि कुछ अत्यंत छोटे देश कम आबादी और प्राकृतिक या दूसरे साधनों से मिली अमीरी के बल पर अग्रणी दिखने लगते हैं। चौथा तरीका वस्तुओं की कीमतों का संयोजन करके सकल घरेलू उत्पादन का आकलन करना है। इसके हिसाब से भारत, चीन और अमेरिका के बाद तीसरे नंबर पर गिना जाता है। लेकिन इस आकलन में भी बहुत सी कमियां हैं। पारिवारिक और सामुदायिक या सामाजिक सेवाओं का कोई विश्वस्त आकलन संभव नहीं हो सकता, लेकिन वे हमारे आर्थिक जीवन को और हमारे देश की आर्थिक शक्ति को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसी तरह यह बात कम महत्वपूर्ण नहीं है कि भारत के नागरिक अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्र हैं, भारत में अपेक्षाकृत अधिक सामाजिकता है और प्रकृति से बहुत कुछ आज भी बहुत से लोगों को बिना कोई मूल्य दिए मिल जाता है। गैर-औद्योगिक वस्तुओं की गुणवत्ता के मामले में भी भारत औरों से आगे ही है। इस तरह भारत आज अग्रणी शक्ति भले न हो, एक अग्रणी समाज अवश्य है। लेकिन हम अपनी नादानी में अपनी इसी शक्ति को कम करते चले जा रहे हैं।

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