14 सितंबर 2018 को भारत सरकार के गजट नोटिफिकेशन के आलोक में 328 फिक्स डोज कंबिनेशन की दवा बनाना, बेचना एवं वितरित करना पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है। लेकिन विडंबना यह है कि आज भी ये प्रतिबंधित दवाएं देश के सभी दवा दुकानों पर धड़ल्ले से बिक रही हैं। क्या सबके सब मिले हुए हैं जो सरकार के नोटिफिकेशन के  बावजूद अभी तक प्रतिबंध को अमलीजामा नहीं पहनाया गया है।

सितंबर के दूसरे  सप्ताह में जब सरकार ने यह घोषणा की कि अब फिक्स डोज कंबिनेशनवाली हानिकारक दवाइयां नहीं बेची जायेगी। सभी दुकानों से दवाइयों को वापस करने के लिए नोटिफिकेशन भी जारी हो गया। लेकिन सच्चाई यह है कि देश के लगभग सभी रिटेल काउंटरों पर प्रतिबंधित दवाइयां धड़ल्ले से बिक रही हैं। दिल्ली के उत्तम नगर इलाके में लगभग 10-12 दवा दुकानों पर आधा-आधा घंटा बिताने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि न सिर्फ इन दुकानों पर पहले से पड़ी और अब प्रतिबंधित हो चुकी दवाइयां बेची जा रही हैं, बल्कि इन दवाइयों को स्टॉकिस्ट से भी मंगवाया जा रहा है। इस बावत एक दवा दुकानदार से जब मैंने पूछा कि आखिर आप प्रतिबंधित खिचड़ी दवाइयां क्यों बेच रहे हैं तो उसका सीधा जवाब था कि मेरे पास कोई लेटर नहीं आया है और न ही प्रतिबंधित दवाइयों की कोई लिस्ट मिली है। एक दुकानदार ने हमारे सामने ही ड्रग इंस्पेक्टर से बातचीत किया। फोन स्पीकर पर था। ड्रग इंस्पेक्टर का कहना था कि जितनी दवाइयां है उसे बेच दो। जब सब के सब मिले हुए हैं तो आम जनता का ख्याल कौन रखेगा?

14 सितंबर, 2018 का दिन दवा कंपनियों के लिए काला दिन साबित हुआ। नई दिल्ली स्थित एफडीए भवन से एक चिट्ठी निकली। विषय में लिखा था-अधिसूचना एस.ओ. 4379 (ई) से एस.ओ. 4706 (ई) के संदर्भ में केन्द्र सरकार द्वारा 328 फिक्स डोज कंबिनेशन को प्रतिबंधित करने के संबंध में। इस पत्र के निकलते ही दवा कंपनियों के मालिकों के होश उड़ गए। भारत के औषधि नियंत्रक डॉ. एस. ईश्वर रेड्डी के हस्ताक्षर से निकले इस पत्र ने हड़कंप मचा दिया। इस पत्र में ड्रग कंट्रोलर ने स्पष्ट रूप से लिखा है कि भारत सरकार द्वारा 7.09.2018 को जारी गजेट अधिसूचना एनओएस. एस.ओ.4379 (ई) से एस.ओ 4706 (ई) एवं ड्रग एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 के सेक्शन 26 ए के आलोक में 328 फिक्स डोज कंबिनेशन की दवा बनाना, बेचना एवं वितरित करना पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है। इस पत्र में डॉ. रेड्डी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि औषधि तकनीक सलाहकार परिषद (ऊळअइ) के अनुशंसा पर यह कदम उठाया गया है। यहां गौर करने वाली बात यह है कि सलाहकार परिषद ने स्पष्ट रूप से कहा है कि इन 328 फिक्स डोज कंबिनेशन में डाले गए तत्व या साल्ट का थिरैप्यूटिक (उपचारात्मक) उपयोग न्यायपूर्ण नहीं है और मानव स्वास्थ्य पर इसका बुरा असर पड़ रहा है। इस पत्र को देश के सभी फार्मा एवं केमिस्ट संगठनों, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, ड्रग कंट्रोल अधिकारियों के एसोसिएशन एवं सीडीएससीओ की वेबसाइट को प्रेषित किया गया है।

डीसीजीआई पर आरोप

सरकार के इस फैसले का स्वागत करते हुए दवा मामलों के जानकार एवं उत्तराखंड के स्टेट ड्रग लाइसेंसिंग आॅथोरिटी रह चुके हरे राम गुप्ता कहते हैं कि, फिक्स डोज कंबिनेशन पर प्रतिबंध बहुत पहले ही लग जाना चाहिए था। उनका कहना है कि उन स्टेट ड्रग लाइसेंसिंग अधिकारियों को दंड दिया जाना चाहिए जिन्होंने बिना ड्रग कंट्रोलर आॅफ इंडिया की सहमति से न्यू ड्रग्स को बनाने एवं बेचने एवं वितरण करने की सहमति दी। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहते हैं कि, जब तक स्टेट ड्रग कंट्रोलर बीएससी पास आदमी बनता रहेगा जिसे न तो फार्माक्लोजी समझ है और न ही दवाइयों की महत्ता मालूम है, तो इस तरह की दुर्घटनाएं होती रहेगी। उन्होंने आगे कहा कि डीसीजीआई को स्टेट लाइसेंसिग आॅथोरिटी के लिए एक स्टैंडर्ड मानक बनाना चाहिए। इसके अभाव में राज्य की लाइसेंसिंग आॅथोरिटी बोरा भर कर दवाइयों का लाइसेंस गैर-कानूनी तरीके से देती रही हैं। उन्होंने डीसीजीआई पर आरोप लगाते हुए कहा कि डीसीजीआई स्टेट ड्रग लाइसेंसिंग आॅथोरिटी को बचाने का काम कर रही है।

2016 में ही इन दवाओं पर लगा था प्रतिबंध

गौरतलब है कि इससे पूर्व केंद्र सरकार ने 2016 के 10 मार्च को औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 की धारा 26ए के तहत मानव उपयोग के उद्देश्य से 344 एफडीसी के उत्पादन, बिक्री और वितरण पर प्रतिबंध लगाया था। इसके बाद सरकार ने समान प्रावधानों के तहत 344 एफडीसी के अलावा 5 और एफडीसी को प्रतिबंधित कर दिया था। हालांकि, इससे प्रभावित उत्पादकों या निर्माताओं ने देश के कई हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में इस निर्णय को चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट की ओर से 15 दिसंबर, 2017 को सुनाए गए फैसले में दिए गए निर्देशों का पालन करते हुए इस मसले पर दवा तकनीकी सलाहकार बोर्ड द्वारा गौर किया गया, जिसका गठन औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 की धारा 5 के तहत हुआ था। इस बोर्ड ने इन दवाओं पर अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप दी। दवा तकनीकी सलाहकार बोर्ड ने अन्य बातों के अलावा यह सिफारिश भी की कि 328 एफडीसी में निहित सामग्री का कोई चिकित्सीय औचित्य नहीं है और इन एफडीसी से मानव स्वास्थ्य को खतरा पहुंच सकता है। बोर्ड की सिफारिश थी कि औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 की धारा 26ए के तहत व्यापक जनहित में इन एफडीसी के उत्पादन, बिक्री या वितरण पर प्रतिबंध लगाना आवश्यक है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने पिरामल की दर्द निवारक दवाई सेरीडॉन और दो अन्य दवाइयों- पिरिटन और डार्ट से फिलहाल प्रतिबंध हटा दिया है।

प्रतिबंध से खुश हैं चिकित्सक

इस बाबत न्यूरो सर्जन डॉ. मनीष कुमार कहते हैं कि, यह फैसला सही हुआ है। दुनिया के कई देशों का हवाला देते हुए डॉक्टर मनीष कहते हैं कि भारत ही एक ऐसा देश है जहां पर इतनी खिचड़ी दवाइयां मिलती हैं। आॅर्थोपेडिक सर्जन एवं नी ट्रांसप्लांट एक्सपर्ट के रूप में जाने जा रहे डॉ. अनुराग अग्रवाल का मानना है कि इस तरह की दवाइयां रेसिसटेंसी को बढ़ा रही है। भोपाल के डॉ. सुनील निगम भी इस फैसले का स्वागत करते हुए कहते हैं कि निश्चित रूप से यह एक बेहतर फैसला है। फार्मा मामलों के जानकार डॉ. आत्माराम पंवार का मानना है कि जहां तक एफडीसी दवाइयों का सवाल है इसके सुरक्षा एवं उपयोगिता को लेकर कोई भी तथ्यपरक साहित्य उपलब्ध नहीं है। ये दवाइयां किसी भी विकसित देश में उपलब्ध नहीं हैं। 2007 के बाद दवा निर्माताओं से जरूरी क्लिनिकल डाटा मांगा जा रहा है। 2012 में भी सरकार ने इस बाबत बहुत कड़ाई बरती थी। लेकिन ये दवा निर्माता डाटा नहीं दे  पाए। इसका मतलब यह हुआ कि ये दवा निर्माता यह जानते थे कि एफडीसी के पक्ष में उनके पास वैज्ञानिक तथ्य कुछ भी नहीं है। यही कारण है कि सरकार ने इन दवाइयों को प्रतिबंधित किया है। यह सराहनीय है।

30 साल से चल रहा था गोरखधंधा

ऐसे में यह बहुत बड़ा प्रश्न है कि आखिर इस देश में ड्रग कंट्रोलर आॅफ इंडिया कर क्या रहा है? आखिर कब तक लोगों के सेहत के साथ इसी तरह खिलवाड़ होता रहेगा? दरअसल सवा अरब आबादी वाले भारत के सेहत का हाल बहुत ही बुरा है। न तो लोगों को अपनी सेहत का ख्याल है और न ही सरकार को। विगत 30 वर्षों में देश की दवा कंपनियों ने खिचड़ी दवा बनाकर देश की जनता को न केवल आर्थिक रूप से लूटा है बल्कि उनकी सेहत से भी खिलवाड़ किया है। इसी आलोक में 1988 से चली आ रही गड़बड़ियों को भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने अब जाकर कुछ हद तक दुरुस्त करने का काम किया है। भारत में बन रहे एवं बिक रहे 325 ऐसी फिक्स डोज कंबिनेशन वाली दवाइयों को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने पूर्ण रूप से पिछले महीने से ही प्रतिबंध लगाया है जो सेहत के लिए हानिकारक थीं। इस प्रतिबंध से यह साफ हो गया है कि पिछले 30 वर्षों से दवा कंपनियां भारतीयों को किस तरह से झांसा देकर उनके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रही थी। और जानबूझकर देश की सेहत के साथ ये खेलती रही। अब जब इनकी सच्चाई पूरी तरह से सामने आ चुकी है, सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि पिछले 30 वर्षों में बीमारी की खेती करने वाली इन दोषी दवा कंपनियों एवं दोषी सरकारी अफसरों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है!

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