लोक कुमार कानून के जानकार हैं। हाल ही में विश्व हिन्दू परिषद ने उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है। विश्व हिन्दू परिषद राम जन्मभूमि के लिए लंबे समय से काम कर रही है। एक कार्यकारी अध्यक्ष होने के नाते उनकी जिम्मेदारियों और अयोध्या मसले पर विहिप की योजनाओं पर हिन्दुस्थान समाचार के डिजिटल मीडिया हेड विजय त्रिवेदी ने उनसे लंबी बात की। यहां इस बातचीत के मुख्य अंश दिए जा रहे हैं।


० सुप्रीम कोर्ट ने रामजन्म भूमि मसले पर रोजाना सुनवाई की बात की है, इससे लगता है कि हम मामले को सुलझाने की तरफ बढ़ रहे हैं?

मैंने सुप्रीम कोर्ट का फैसला पढ़ा है। 29 अक्टूबर से इस मामले की सुनवाई हो, उन्होंने ऐसा कहा है। इसमें प्रतिदिन सुनवाई का आदेश नहीं है। इस मसले की सुनवाई प्रतिदिन हो या नहीं, यह फैसला उसी बेंच को करना होगा। 68 वर्ष हो गए हैं, इसके बावजूद लोक महत्व के इस विषय ने देश के दो बड़े समुदायों के बीच तनाव पैदा कर रखा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिदिन सुनवाई हो, ऐसा फैसला न करना मुझे चिंतित करता है। दरअसल अयोध्या विवाद में दो मसले हैं। एक तो क्रिमिनल प्रकरण है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने डिस्ट्रिक कोर्ट को आदेश दिया कि फैसला जल्दी करो। पर इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ऐसी जल्दी नहीं दिखा रही है। मैं सुप्रीम कोर्ट से आशा करता हूं कि अब वे इस मामले की प्रतिदिन सुनवाई करें।

० अगर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ जाता है तो क्या वह इस पूरे मामले को हल करने में कामयाब होगा? क्या दोनों पक्ष इसे मानने को तैयार होंगे।

मैं सोचता हूं कि ऐसी कोई च्वाइस दोनों पक्षों के पास नहीं है। हमने अपने वकीलों से बात की है। हम निश्चिंत हैं कि हम विजयी होंगे। इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला भी हमारे पक्ष में था। उन्होंने भी पाया कि मस्जिद मंदिर की भूमि पर बनाई गई है। उनके ध्वंसावशेषों पर बनाया गया है। यहां पर भी हम जीतेंगे। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला तो अंतिम फैसला है। इसलिए मैं चाहता हूं कि सभी पक्ष इस फैसले को स्वीकार कर लें।

० यदि आपके पक्ष में फैसला नहीं आता है तो?

हम निश्चित जीतेंगे।

० यह भरोसा तो आपको दिलाना पड़ेगा कि आप सुप्रीम कोर्ट का फैसला मानेंगे?

फैसला हमारे पक्ष में ही आ रहा है। हम क्यों नहीं मानेंगे।

० राम में आस्था रखने वाले कोर्ट में आस्था कैसे रख पाएंगे?

ये दोनों परस्पर कंट्राडिक्टरी नहीं हैं। संविधान आज की व्यवस्था है। कोर्ट में हम सब की आस्था इसलिए होनी चाहिए कि चीजों पर अंतिम निर्णय लेने का वह एक फोरम है।

० मैं विश्व हिन्दू परिषद की बात कर रहा हूं। मंदिर आंदोलन से जुड़े लोग ऐसा नहीं मानते थे। इसे आस्था का विषय कहते रहे हमेशा।

उसका संर्दभ यह था कि यह आस्था का विषय है, इसलिए इंतजार मत करो, कानून बनाओ। उसका संदर्भ यह नहीं था कि यह कानून तोड़कर करो। हम संविधान पर विश्वास करते हैं।

० कहते हैं कि विश्व हिन्दू परिषद ने भगवान राम को 25 साल का वनवास दिला दिया।

ये सच है कि रामलला 26 साल से टेंट में बैठे हैं। यह हमारे समाज का दुर्भाग्य है। इसकी जिम्मेदारी हम सब की है। हमें इस बात की ग्लानि है कि सतत इच्छा और प्रयत्न के बाद इतने वर्ष बीत गए। इन 26 वर्षो में निरंतर हम मंदिर निर्माण का काम करते रहे। हमारी कार्यशाला में मंदिर के फर्श का पत्थर तैयार हो गया है। ग्राउंड फ्लोर के सभी खंभे हमने तैयार कर लिए हैं। एक खंभे की पच्चीकारी में तीन महीने लगते हैं। इसी तरह सीलिंग के पत्थरों की पच्चीकारी तैयार हो चुकी है। मंदिर बनाने की जितनी व्यवस्थाएं हैं, वह सब हमने पूरी कर रखी हैं।

० अभी संघ सर संचालक ने कहा कि मंदिर शीघ्र बनना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि इसमें आपकी राय भी शामिल है।

हम मानते हैं कि यह सरकार राम भक्तों की सरकार है। इस सरकार के पास बहुमत है। इस समय राम मंदिर निर्माण के लिए जितनी अनुकूल परिस्थितियां हैं, वह पहले कभी नहीं थीं।

० क्या अभी जो समय बचा है, उसमें आप केंद्र सरकार पर मंदिर निर्माण के लिए दबाव डालेंगे।

हमने अपने लिए एक मर्यादा तैयार की है। हम इस आंदोलन के लिए सौ प्रतिशत कमिटेड हैं।

० सरसंघचालक ने हाल ही में हिन्दुत्व की जो नई परिभाषा दी। उसे आप कैसे समझाते हैं?

इस बात का उत्तर वही व्यक्ति दे सकता है जिसने इन सब बातों का अध्ययन किया हो। फिर भी, मैं एक बार कोच्ची गया था। यहां देश की सबसे पुरानी मस्जिद है। इसकी भूमि वहां के राजा ने उन लोगों के मांगने पर दान में दे दी थी। इसलिए हिन्दुत्व वह नहीं हो सकता, जो यह कहे कि इन मुसलमानों को देश में नहीं रहना चाहिए। हम हिन्दू समाज को संगठित कर रहे हैं, संस्कारित भी कर रहे हैं। हमारा संघर्ष किसी के खिलाफ नहीं है। अगर भारत में एक भी मुसलमान और ईसाई नहीं होता और छुआछूत होती, तो भी हमें उतना ही काम करने की जरूरत रहती?

० आपको लगता है कि कार्यकर्ता के स्तर पर यह बात पहुंच रही होगी? जब मॉब लिंचिंग होती है, लव जिहाद करते हैं और भी बहुत सी घटनाएं होती हैं। इस परिप्रेक्ष्य में आपका कहना कहां तक फिट बैठता है?

जब मुंबई में ताज होटल पर हमला हुआ, तो बहुत से समाचार पत्रों में लिखा गया कि जिहादी लोगों ने हमला किया। उन्हें पकड़ा जाना चाहिए, पर प्रत्येक मुस्लिम आतंकवादी नहीं है। किसी एक समुदाय को इसका दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए। हमें पत्रकार बंधुओं से शिकायत है कि वैलेंटाइन डे पर राम सेना के लोग कैफेटेरिया में बैठे एक युगल को परेशान करते हैं। तब अखबार छापते है कि हिन्दुत्व इसके विरोध में हैं। यह सब हमारे खाते में डाल दिया। कलबुर्गी जैसी हत्याएं भी हिन्दुत्व के खाते डाली गई।  मॉब लिंचिंग, गौहत्या जैसे मामलों पर हमने कार्यकतार्ओं को कानूनी और प्रशासनिक बातों को समझाया है। हमने यह सब न करने के निर्देश दिए हैं। विहिप को यह सब नहीं करना है।

० अशोक सिंघल विहिप से जुड़ा एक बड़ा नाम रहा है। क्या उनके जाने का कोई नुकसान विहिप या आंदोलन को हुआ है?

वे इस देश के सर्वनाम नेता थे। हमें विश्वास है कि उनकी सद्इच्छाएं हमारे साथ हैं। हम उनके ही रास्ते पर चल कर अपने लक्ष्य को पूरा करेंगे।

० विहिप की लीडरशिप में बहुत लंबे समय बाद परिवर्तन हुआ है। क्या आपको नहीं लगता कि आपके पास एक बहुत बड़ा चैलेंज है।

हमसे पहले अशोक जी, आचार्यजी, चिन्मयानंदजी आदि संस्थापकों में थे। मैं बिना किसी अहंकार के कह सकता हूं कि यह हिन्दुओं का बड़ा और ताकतवर संगठन है। साथ ही विश्व में भी यही संगठन है। यह वह देह है जिसे इन सब लोगों ने आत्मा प्रदान की है। उन्होंने जो जिम्मेदारी हमें सौंपी है उसे हम पूरा करेंगे।

० आप देहदान पर महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। ऐसा सफल काम आप कैसे कर पा रहे हैं?

यह मूल हिन्दू भावना का काम है। गुरु नानक ने कहा था कि पशु मरे तो दस काम सधाए, मनुष्य मरे तो कोई काम न आए। मृत देह को सभी मिट्टी कहते हैं और दाह संस्कार होता है कि देह पंचतत्व में मिल जाए। अगर ऐसी मिट्टी को चिकित्सा शास्त्र की शिक्षा के लिए दे दें, तो इससे ज्यादा पुण्य का काम क्या हो सकता है। मेरे मां-पिता ने भी देहदान किया था। हमने उनका अंतिम संस्कार अग्नि से नहीं किया। हमने उनकी देह मेडिकल कॉलेज के लिए दान कर दी। हमें संतोष है कि पिताजी स्वयंसेवक होने के नाते अंतिम क्षण तक कार्यरत रहें। और मरने के बाद अपनी देह भी इसी काम में लगी।

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