तेलंगाना में चुनावी मूड बन चुका है। इसी के साथ सियासी पारा भी चढ़ने लगा है। समय पूर्व विधानसभा चुनाव की आहट पाकर राजनीतिक दलों ने अपनी कमर कसनी शुरू की दी है। चुनावी टेंशन ने सभी दलों और नेताओं के माथे पर पसीने की बूंदें ला दी हैं। सूबे की सबसे बड़ी पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति में टिकट बंटवारे को लेकर पैदा हुआ असंतोष थमने का नाम नहीं ले रहा है। वहीं कांग्रेस-टीडीपी-सीपीआई-टीजेएस गठबंधन की जमीनी पेंच अभी तक सुलझे नहीं हैं। इधर, सीपीएम ने अलग राह अपनाकर विपक्षी एकता को बड़ा झटका दे दिया है।

समय से पूर्व विधानसभा भंग करके चुनावी नैया पार होने की पूरी आशा कार्यवाहक मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव को है। पर पार्टी में सीट बंटवारे को लेकर जो असंतोष देखा जा रहा, उससे उनकी उम्मीदों को झटका लग सकता है।

सबसे पहले 105 उम्मीदवारों की सूची जारी करने वाले कार्यवाहक मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव की पार्टी टीआरएस में भारी असंतोष है। टिकट बंटवारे से उपमुख्यमंत्री कादियम श्रीहरि नाराज हैं तो टिकट कटने से कोंडा सुरेखा खुलेआम बगावत का झंडा बुलंद कर चुकी हैं। अभिनय से राजनीति में आए पूर्व मंत्री पी. मोहन बाबू तो टीआरएस छोड़कर विधिवत बीजेपी में शामिल हो गये हैं। यानी टीआरएस में जो बवंडर उठा है, वो शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। चुनाव के दौरान ऐसा होना अस्वाभाविक भी नहीं है। करीब साढ़े चार साल सत्ता में रहने और दोबारा जनादेश पाने की उम्मीद लगाये टीआरएस में विधायक बनने का ख्वाब पाले नेताओं की भरमार है। चुनाव सामने देख उनकी उम्मीदें हिलोरें मार रही हैं। पार्टी में सबसे ज्यादा पेंच उन सीटों पर फंसा है, जहां टीआरएस के उम्मीदवार पिछले चुनाव में दूसरे स्थान पर रह गये थे। दूसरे दल के विजयी उम्मीदवार पाला बदलकर आज की तिथि में टीआरएस के साथ हैं। ऐसे बहुत सारे दलबदलू सिटिंग-गेटिंग फॉर्मूले के तहत टीआरएस का टिकट पाने में कामयाब हो गये हैं। टिकट से वंचित पुराने वफादार नेता अपना दर्द छुपा नहीं पा रहे हैं। पार्टी में मचे असंतोष को पाटने में केसीआर के बेटे केटीआर दिन-रात लगे हैं। केटीआर को अब चन्द्रशेखर राव के राजनीतिक वारिस के तौर देखा जा रहा है।

टीआरएस में सीट बंटवारे के बाद राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। ओबीसी जमात के नेता अपनी संख्या के हिसाब से टिकट में दावेदारी पेश कर रहे हैं। बैकवर्ड कास्ट फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष जस्टिस वी. ईश्वरैय्या ने इस बाबत केसीआर को चिट्ठी लिखी है। उनका कहना है कि तेलंगाना में ओबीसी की आबादी 51 फीसदी है, लेकिन उनको 20 सीटें दी गयी हैं। यह संख्या के अनुपात में काफी कम हैं। टीआरएस ने सबसे ज्यादा 35 सीट रेड्डी बिरादरी को दी है, जो तेलंगाना में महज 6 फीसदी के करीब है। दूसरे नंबर पर केसीआर के स्वजातीय वेलमा हैं, जिनके हिस्से में 11 सीटें आई हैं। वेलमा की आबादी आधी फीसदी भी नहीं है। अगड़ी जातियों में ही शुमार कम्मा के खाते में टीआरएस की छह सीटें आई हैं।

केसीआर को उम्मीद है कि बीते चार साल में किये गये उनके काम को देखकर लोग उनको फिर से जनादेश देंगे। इसी भरोसे वे सौ सीट से ज्यादा जीतने का लक्ष्य लेकर बढ़ रहे हैं। टीआरएस के नेता कहते हैं कि तेलंगाना ने चार साल में 17.17 फीसदी की दर से आर्थिक प्रगति हासिल की है। दूसरा कोई राज्य दूर-दूर तक मुकाबले में नहीं है। वे कहते नहीं अघाते कि चुनावी घोषणा-पत्र से आगे जाकर 76 कल्याणकारी नयी योजनाएं लागू की गयी हैं, जिनका वादा भी नहीं किया गया था। प्रदेश में किसानों की आत्महत्याएं थमी हैं। सांप्रदायिक दंगे और माओवादी हिंसा पूरी तरह काबू में है और औद्योगिक विकास ने गति पकड़ी है।

उधर, महागठबंधन के अपने पेंच हैं। कहने के लिए तो इसमें चार दल शामिल हैं, लेकिन मुख्य तौर पर कांग्रेस और टीडीपी के नेता ही नेतृत्व में हैं। कौन कितनी सीट पर लड़ेगा, यह भी अब तक तय नहीं हो पाया है। पिछली बार बीजेपी और टीडीपी ने मिलकर चुनाव लड़ा था, तब बीजेपी जूनियर पार्टनर की भूमिका में थी। उसे 7 फीसदी वोट और 5 सीट मिली थी और टीडीपी ने 15 फीसदी वोट लेकर 15 सीट पर कब्जा जमाया। कांग्रेस ने अकेले सभी सीटों पर चुनाव लड़ा, तो उसे 25 फीसदी वोट मिले और 21 सीटें खाते में आईं। इस बार टीडीपी और कांग्रेस एक साथ हुए हैं। लेकिन टीडीपी जूनियर पार्टनर रहेगी। महाकुटुंबी के एक घटक तेलंगाना जन समिति के नेता प्रोफेसर कोदंडराम बीजेपी के भी संपर्क में हैं। पिछले दिनों बंडारु दत्तात्रेय से उनकी मुलाकात की खबर सुर्खियों में थी। उधर, वामपंथी एकता को बड़ा धक्का लगा है। सीपीएम ने तेलंगाना में बहुजन लेफ्ट फ्रंट यानी बीएलएफ के साथ लड़ने का फैसला किया है। भंग हुए विधानसभा में सीपीएम का एक विधायक था।

अविभाजित आंध्र का इतिहास देखें, तो 2004 में वाईएस राजशेखर रेड्डी ने एक बार कांग्रेस, टीआरएस, सीपीआई और सीपीएम का गठजोड़ बनाकर तेलुगू देशम को हरा दिया था और चंद्रबाबू नायडू से सत्ता छीन ली। लेकिन 2009 में जब नायडू ने टीआरएस और वामदलों के साथ मिलकर वाईएसआर की सत्ता को चुनौती दी, तो वे कामयाब नहीं हो सके। अब नायडू उसी कांग्रेस के साथ मिलकर तेलंगाना में केसीआर को उखाड़ना चाहते हैं। राजनीतिक क्षेत्र दो धुर विरोधी दलों-टीडीपी और कांग्रेस के गठजोड़ का तेलंगाना इस बार प्रयोगशाला बनने जा रहा है। राजनीतिक प्रेक्षक कहते हैं कि जिस तेलुगू देशम की बुनियाद में कांग्रेस विरोध रहा हो। जिसके संस्थापक एनटी रामाराव पिछली सदी के अस्सी के दशक में राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के विरोध में नेशनल फ्रंटबना चुके हों, उसका यह कदम हैरतअंगेज है। देखना दिलचस्प होगा कि यह गठबंधन क्या गुल खिलाता है।

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