भारत और पाकिस्तान दो ऐसे पड़ोसी हैं, जिनके बीच संबंधों की आड़ी-तिरछी रेखाएं साल-दर-साल और अधिक टेढ़ी होती जा रही हैं। इसकी वजह ये है कि पाकिस्तान भारत को कभी मित्र नहीं मान सका। वह भारत से शत्रुता का कोई अवसर भी नहीं छोड़ता। फिर चाहे वह सीमा पर उसकी सेना का व्यवहार हो, उसके द्वारा भेजे गये आतंकियों के जरिए छद्म युद्ध की प्रक्रिया हो अथवा किसी वैश्विक मंच पर होने वाला संवाद। पाकिस्तान कोई ऐसा अवसर नहीं छोड़ता, जब वह भारत को परमाणु बम की धमकी या उस जैसे संदेश न दे। कुल मिलाकर आतंकवाद और बम की पाकिस्तानी ताकत पाकिस्तान के मनोविज्ञान को और अधिक विकृत कर रही है। सवाल उठता है कि पाकिस्तान की इस मनोदशा का हल क्या है? दक्षिण एशिया के लिए शांति आवश्यक है। ऐसे में भारत का दायित्व सबसे अधिक हो जाता है क्योंकि भारत दक्षिण एशिया का प्रमुख देश है, जबकि पाकिस्तान एक समस्या देने वाला राष्ट्र (प्रॉब्लेम स्टेट) है। ऐसे में भारत को क्या करना चाहिए?

संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक एक बार फिर भारत और पाकिस्तान के बीच तीखी बयानबाजी की गवाह बनी। पूरी दुनिया में अलग-थलग पड़ते जा रहे पाकिस्तान को शायद यही एक ऐसा मंच मिलता है, जहां वह भारत के खिलाफ जहर उगल कर दुनिया को अपनी बात सुना पाता है।

पाकिस्तान अभी इस बात को लेकर खफा है कि भारत ने उसके साथ न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) से इतर होने वाली बातचीत को रद्द कर दिया। पाकिस्तान बौराया तो पहले से ही था। इस बात से बौखला गया। मजेदार ये है कि वह अपनी नैतिकता आंकने की बजाय भारत को धमकी भरे अंदाज में संदेश देने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 73वें सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि कश्मीर मुद्दा 70 साल से इंसानियत पर दाग है और यह अनसुलझा विवाद भारत और पाकिस्तान के बीच स्थायी शांति हासिल करने पर असर डाल रहा है। कुरैशी ने कहा कि भारत हमारे सब्र का इम्तिहान न ले। उसने हमले की गलती की तो नतीजा भुगतना होगा। हम पाकिस्तान की संप्रभुता से समझौता नहीं करेंगे। उन्होंने कहा, ’इस्लामाबाद संप्रभु समानता और आपसी सम्मान के आधार पर नई दिल्ली के साथ संबंध चाहता है। हम गंभीर और व्यापक वार्ता के जरिए विवादों का समाधान चाहते हैं, जिसमें चिंता के सभी मुद्दे शामिल हों। लेकिन भारत ने वार्ता रद्द कर दी औरे कुछ महीने पहले जारी डाक टिकटों को बहाना बनाया।

कुरैशी और पाकिस्तान को हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अच्छी तरह लताड़ लगायी और यूएनजीए के माध्यम से कहा कि भारत अपने पड़ोसी पाकिस्तान के आतंकवाद से पीड़ित है। पाकिस्तान आतंकवादी घटना को अंजाम देने में ही माहिर नहीं है, बल्कि इसको छिपाने में भी माहिर है। दुनिया ने पाकिस्तान का सही चेहरा पहचान लिया है। सुषमा स्वराज ने यह भी कहा कि आंतकवाद के वातावरण में पाकिस्तान से बातचीत मुमकिन नहीं है। विश्व के इनामी आतंकी पाकिस्तान में सेनानी कहे जाते हैं। मुंबई आतंकी हमले का मास्टरमाइंड हाफिज सईद खुलेआम पाकिस्तान में रैलियां कर रहा है और भारत को धमकी दे रहा है।

सवाल है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ही भारत और पाकिस्तान के बीच अखाड़ा क्यों बनता है? इसकी कई वजहें हैं। अव्वल तो ये यूएनजीए में बोलकर पाकिस्तान दुनिया को अपना पक्ष सुनाना चाहता है। दूसरा ये कि अब अधिकांश बहुपक्षीय मंचों पर भारत और पाकिस्तान एक साथ नहीं होते। तीसरी वजह ये है कि सार्क बेहद कमजोर हो चुका है और बिम्सटेक में भारत ने पाकिस्तान को जगह नहीं दी है। एक वजह ये भी है कि पाकिस्तान जानता है कि वह भारत से न तो युद्ध में जीत सकता है और न ही नीतिगत मामलों में। इसीलिए वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अधिक चीखता है, ताकि वह दुनिया का ध्यान अपनी ओर आर्किषत कर सके।

दरअसल पाकिस्तान के परमाणु हथियारों ने उसको कृत्रिम रूप से दबंग बनने का आधार दे दिया है। इसके बाद से पूरे पाकिस्तान का मनोविज्ञान बदल गया है। इसका अनुमान खाड़ी के एक अखबार में कुछ समय पूर्व छपे एक कॉलम से लगता है। कॉलम में पाकिस्तान के स्तम्भकार ने लिखा था,‘‘खतरे की प्रकृति बदल चुकी है। इसलिए सशस्त्र सेना के लिए जरूरी है कि वे अपनी कार्यशैली के लिए अपनी सोच और हैसियत दोनों को बदल लें। एफ-16 और बहुत सारी इंटर सब-कांटीनेंटल मिसाइलें हमारे लिए बेहतर सिद्ध होंगी। … हमारे एटम बम भारत की किसी भी कार्रवाई से सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त हैं। यदि 50 एटम बम हमारी सुरक्षा के लिए पर्याप्त नहीं हैं तो फिर पूरी दुनिया की सेना भी हमें सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकतीं। यह राष्ट्र के चिंता से मुक्त होने का समय है। इसलिए हमें अब इस सोच वाले पाकिस्तानी नजरिए से मोहब्बत करनी चाहिए कि भारत हमारा सनातन शत्रु (इटरनल एनमी) है।’’ हम यह मान सकते हैं कि आज के दिन पाकिस्तान का यही नजरिया है। लेकिन सवाल है कि भारत का नजरिया क्या है? सच तो यह है कि भारत अभी तक यही तय नहीं कर पाया है कि पाकिस्तान उसका मित्र है, भाई है या शत्रु है। इसीलिए भारत के सामने यह नैतिक संकट है कि पाकिस्तान के खिलाफ किस आधार पर कार्रवाई की प्रकृति तय करे?

पाकिस्तानी सेना की तरफ से भारतीय सीमा पर की जा रही कार्रवाइयां बताती हैं कि पाकिस्तान अपना माइण्डसेटबदलने के लिए तैयार नहीं है, कारण चाहे जो हों। 2018 की शुरुआत से अब तक पाकिस्तानी सेना जम्मू-कश्मीर के आरएसपुरा और अरनिया सेक्टर, उरी सेक्टर, एलओसी के कोटली, राजौरी के तरकुंडी सेक्टर और सुंदरबनी से लेकर पुंछ तक नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर लगातार फायरिंग कर रही है। इससे कुछ सैनिक और नागरिक मारे जा चुके हैं और लगभग 10,000 लोगों को पलायन करना पड़ा है। विशेष बात तो ये है कि जब भारतीय सेना की तरफ से कार्रवाई की गयी तो पाकिस्तान ने भारतीय उच्चायुक्त को पांच बार बुलाकर एलओसी पर भारतीय सेना द्वारा सीजफायर के उल्लंघन का आरोप लगाया। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की तरफ से कहा गया है कि 2018 में भारतीय सुरक्षा बलों ने 190 से अधिक बार संघर्ष विराम का उल्लंघन किया है। जबकि सच इसके ठीक विपरीत है। भारतीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2017 में पाकिस्तान ने 771 बार सीजफायर का उल्लंघन किया, जबकि वर्ष 2016 में उसने 228 बार सीजफायर का उल्लंघन किया था। यानी पाकिस्तान ने एक वर्ष में एलओसी पर सीजफायर की घटनाओं में 230 प्रतिशत की वृद्धि कर दी। एक महत्वपूर्ण बात ये है कि इंटेलीजेंस रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तानी सेना सैन्य सामग्री की मात्रा बढ़ा रही है। पाकिस्तान की सेना ने चीन की नार्थ इण्डस्ट्रीज कॉर्पोरेशन को 2,496 ग्राउण्ट बेस्ड लॉन्चर खरीदने का आॅर्डर दिया है। इसे देखते हुए रक्षा विशेषज्ञों का तर्क है कि पाकिस्तान को कांउटर करने के लिए भारत को कम प्रतिक्रियाशील और युद्धवादी सैन्य नीति को अपनाना चाहिए।  

भारत का एक नकारात्मक पक्ष यह भी है कि हमारा अपना कोई स्ट्रैटेजिक डाक्यूमेंट नहीं है। पिछले 70 वर्षों में इसे तैयार करने की जहमत नहीं उठायी गई। जब अपना रणनीतिक फ्रेमवर्क ही तैयार नहीं है, तो फिर रणनीतिक कार्रवाई की सार्थकता कितनी होगी, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। यही कारण है कि भारत स्ट्रैटेजिक मामलों में अपने समकक्षों से बहुत पीछे है। हम पाकिस्तान के खिलाफ प्रतिरक्षात्मक रणनीति का चुनाव अधिक करते हैं, जबकि होना इसके विपरीत चाहिए। चूंकि इस नीति से हम पाकिस्तान को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकते हैं, इसीलिए वह रुक नहीं रहा और न ही रुकेगा।

एक बात और, पाकिस्तान तब तक कमजोर नहीं होगा जब तक कि उसकी नाभि में पड़े आतंकवाद नामक अमृत पर हमला न किया जाए। जब तक पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ट्रेनिंग कैम्प समाप्त नहीं किए जाते, तब तक पाकिस्तान कमजोर नहीं पड़ेगा। इसके लिए भारतीय सेना को डीप सर्जिकल स्ट्राइक्स करनी होंगी। ये सीमित अर्थ में नहीं, बल्कि व्यापक अर्थ में होनी चाहिए। भारत को अब आॅफेंसिव होने की जरूरत होगी। जरूरी है कि पाकिस्तान को उसकी भाषा में समझाया जाए और वह भी जल्दी। साथ ही डिवाइड डिप्लोमैसी पर, विशेषकर बलूचिस्तान पर, भारत को तेजी से काम करना चाहिए।

बहरहाल पाकिस्तान द्विपक्षीय मुद्दों पर कोल्ड स्टार्ट डॉक्ट्रीनको सामने रखकर बयान देता है। यानी उसकी परमाणु मिसाइलें कुछ क्षणों में ही भारत पर हमला कर सकती है। इसके विपरीत बहुपक्षीय अंतरराष्ट्रीय मंचों पर छद्म नैतिकता प्रर्दिशत कर भारत की छवि खराब करना चाहता है। पहले वह इस रणनीति में सफल भी हो चुका है लेकिन अब उसकी दाल नहीं गल रही क्योंकि युग बदल चुका है। नए युद्ध के क्षेत्र, महारथी व सहयोगी भी बदले हैं। ये चीजें भारत के पक्ष में हैं। इसके बावजूद भारत को उसके खिलाफ और अधिक रणनीतिक, और अधिक आक्रामक क्षमता से सम्पन्न होकर अभियान चलाने की जरूरत है।

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