
नई दिल्ली, 18 अक्टूबर (हि.स.)। दिल्ली पुलिस की इंटेलिजेंस फ्यूजन एंड स्ट्रैटेजिक ऑपरेशंस (आईएफएसओ) यूनिट की सक्रियता से पांच राज्यों में 1 करोड़ 53 लाख 48 हजार रुपये की संभावित ठगी रुक गई। पुलिस की प्रोटेक्टिव विक्टिम आइडेंटिफिकेशन एंड प्रोटेक्शन टीम ने संदिग्ध बैंक खातों में पहुंची रकम के लेनदेन का विश्लेषण कर उन लोगों की पहचान की, जो ठगों के संपर्क में थे। टीम ने दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात में पांच मामलों में पीड़ितों से संपर्क किया। इनमें चार मामले डिजिटल अरेस्ट के थे, जबकि एक निवेश के नाम पर ठगी का था। पुलिस ने बैंकों, साइबर हेल्पलाइन और संबंधित राज्यों की पुलिस के साथ समन्वय कर पीड़ितों को आगे रकम ट्रांसफर करने से रोका।
पुलिस के मुताबिक, इस कार्रवाई की शुरुआत साइबर हेल्पलाइन 1930 पर मिली शिकायत से हुई। 14 सितंबर को दिल्ली के सागरपुर में रहने वाले एक रिटायर्ड सैन्य अधिकारी को ठगों ने फोन किया। उन्होंने खुद को टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) का अधिकारी बताकर दावा किया कि उनके आधार कार्ड पर सिम और क्रेडिट कार्ड जारी हुए हैं, जिनका कनाडा में गलत इस्तेमाल किया गया है। इसके बाद उन्हें वीडियो कॉल पर एक ऐसे व्यक्ति से बात कराई गई, जिसने खुद को दरियागंज थाने का आईपीएस अधिकारी बताया। उसने मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में गिरफ्तारी की धमकी दी।
डर के कारण अधिकारी ने बैंक ऑफ बड़ौदा, आईसीआईसीआई और एसबीआई के खातों से कई बार में बड़ी रकम ट्रांसफर कर दी। उनकी शिकायत पर 29 सितंबर को ई-एफआईआर दर्ज हुई। जांच के दौरान आईसीआईसीआई बैंक खाते से भेजी गई रकम हैदराबाद के एक एक्सिस बैंक खाते में पहुंचने का पता चला।
पुलिस के अनुसार, यह खाता ठगी में इस्तेमाल होने वाला म्यूल अकाउंट था। जांच में सामने आया कि 21 से 29 सितंबर के बीच पांच अन्य लोगों ने भी इसी खाते में रकम भेजी थी। यहीं से पुलिस को दूसरे पीड़ितों तक पहुंचने का सुराग मिला। पुलिस टीम ने 1 अक्टूबर को पाया कि नजफगढ़ में रहने वाले एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के 77 वर्षीय रिटायर्ड कर्मचारी के बंधन बैंक खाते से 29 सितंबर को भेजे गए 25 लाख रुपये भी इसी एक्सिस बैंक खाते में पहुंचे थे। संपर्क करने पर पता चला कि ठगों ने उन्हें 17 सितंबर से घर में डिजिटल अरेस्ट कर रखा था।
पुलिस के मुताबिक, बुजुर्ग इतने डरे हुए थे कि उन्होंने शुरुआत में पुलिस टीम पर भरोसा करने से इनकार कर दिया। वीडियो कॉल पर ठग खुद को असली पुलिस अधिकारी बताते थे। ऐसे में टीम ने धैर्य से उन्हें समझाया कि पुलिस उनसे कोई पैसा नहीं मांग रही है। उन्हें जागरूकता से जुड़े वीडियो भेजे गए और राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर संपर्क कर टीम के प्रभारी इंस्पेक्टर परवीन कुमार की पहचान सत्यापित करने को कहा गया। इसके बाद बुजुर्ग का भरोसा बढ़ा। उनके पास बैंक खाते की जानकारी थी, लेकिन लेनदेन की पहचान संख्या नहीं थी। पुलिस ने बैंक से समन्वय कर मौके पर ही लेनदेन का ब्योरा हासिल किया और ई-एफआईआर दर्ज कराई। मामला द्वारका साइबर थाने के साथ साझा किया गया। एक पुलिस अधिकारी को बुजुर्ग के घर भेजा गया, जिसके बाद उन्हें भरोसा हुआ कि वह असली पुलिस के संपर्क में हैं। उस समय ठग उनसे तीन लाख रुपये और मांग रहे थे। साथ ही सोना-चांदी गिरवी रखने का दबाव बना रहे थे। पुलिस के हस्तक्षेप से डिजिटल अरेस्ट खत्म हुआ और करीब 3.48 लाख रुपये का संभावित अतिरिक्त नुकसान बच गया।
दूसरे मामले में राजस्थान के 80 वर्षीय कपड़ा कारोबारी को ठगों ने करीब 15 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट में रखा था। बेटे की मौत के बाद वह अपनी पत्नी के साथ अकेले रहते हैं। ठगों ने आधार कार्ड से जुड़ी कथित गैरकानूनी गतिविधियों का आरोप लगाकर उनसे 18 लाख रुपये ऐंठ लिए थे। इसके बाद 10 लाख रुपये और देने का दबाव बनाया जा रहा था। ठग चाहते थे कि बुजुर्ग दंपति रकम जुटाने के लिए अपना घर गिरवी रख दें। जांच में पुलिस को पता चला कि 22 सितंबर को इस दंपती के एसबीआई खाते से 18 लाख रुपये उसी एक्सिस बैंक खाते में पहुंचे थे। टीम ने राजस्थान की साइबर हेल्पलाइन 1930 से संपर्क कराया और शिकायत दर्ज कराने में मदद की। काउंसलिंग के बाद दंपती ने आगे रकम देने से इनकार कर दिया। इससे 10 लाख रुपये का संभावित नुकसान बचा और उनका घर गिरवी होने से बच गया।
तीसरे मामले में उत्तर प्रदेश में रहने वाली स्वास्थ्य विभाग की रिटायर्ड नर्स और उनके करीब 70 वर्षीय रिटायर्ड रेलवे कर्मचारी पति को ठगों ने निशाना बनाया। दोनों अकेले रहते हैं। ठगों ने उन्हें बताया कि उनके आधार कार्ड का इस्तेमाल जम्मू-कश्मीर में हुए बम धमाके से जुड़े एक खाते को खोलने में किया गया है और एनआईए ने उनके खिलाफ केस दर्ज किया है।
पुलिस के मुताबिक, दंपति दबाव में आकर पहले ही करीब 52 लाख रुपये दे चुके थे। ठग अब उनसे 10 लाख रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट तुड़वाकर रकम ट्रांसफर कराने की कोशिश कर रहे थे। आईएफएसओ टीम ने संदिग्ध लेनदेन का पता लगाकर उनसे संपर्क किया। समझाने के बाद दंपती को उत्तर प्रदेश की साइबर हेल्पलाइन से जोड़ा गया और शिकायत दर्ज कराई गई। समय पर हस्तक्षेप से 10 लाख रुपये का अतिरिक्त ट्रांसफर रुक गया।
चौथे मामले में महाराष्ट्र के 65 वर्षीय अस्पताल सहायक को करीब 15 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट में रखा गया था। ठगों ने उन्हें धमकाया कि उनका आधार कार्ड बम धमाके से जुड़े मामले में इस्तेमाल हुआ है और एनआईए मनी लॉन्ड्रिंग की जांच कर रही है। उन्हें परिवार को भी कुछ न बताने का निर्देश दिया गया था। तब तक ठग उनसे करीब 85 लाख रुपये ले चुके थे।
पुलिस को पता चला कि 22 सितंबर को उनके एसबीआई खाते से 42 लाख रुपये संदिग्ध एक्सिस बैंक खाते में पहुंचे थे। इसके बाद ठग उनकी बेटी के नाम पर 30 लाख रुपये और दामाद के नाम पर 25 लाख रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट तुड़वाकर ट्रांसफर कराने का दबाव बना रहे थे। उनका दावा था कि रकम भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) में सत्यापन के लिए जमा होगी और बाद में वापस मिल जाएगी। आईएफएसओ टीम ने पीड़ित को समझाया और महाराष्ट्र की साइबर हेल्पलाइन 1930 के जरिए शिकायत दर्ज कराने में मदद की। इससे परिवार की 55 लाख रुपये की बचत और डूबने से बच गई।
पांचवें मामले में गुजरात के 50 वर्षीय कारोबारी ने 29 सितंबर को अपने आईसीआईसीआई बैंक खाते से कई लेनदेन में 25 लाख रुपये उसी संदिग्ध एक्सिस बैंक खाते में भेजे थे। शुरुआत में उन्होंने पुलिस को बताया कि यह रकम निवेश के लिए भेजी गई है और वह इसकी जांच करेंगे। टीम ने 1 अक्टूबर को दोबारा संपर्क किया तो कारोबारी को ठगी का अहसास हो चुका था। वह अपने वकील की मदद से गुजरात में शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया में थे।
कारोबारी ने बताया कि उनकी कुल एक करोड़ रुपये निवेश करने की योजना थी। पुलिस टीम की समय पर दी गई चेतावनी और लगातार संपर्क के कारण उन्होंने आगे रकम ट्रांसफर नहीं की। इससे करीब 75 लाख रुपये का संभावित नुकसान बच गया। कारोबारी ने दिल्ली पुलिस की टीम का आभार जताया।
दिल्ली पुलिस के मुताबिक, पांच मामलों में कुल 1.53 करोड़ रुपये से अधिक की संभावित अतिरिक्त ठगी रोकी गई। इसमें दिल्ली में करीब 3.48 लाख रुपये, राजस्थान में 10 लाख रुपये, उत्तर प्रदेश में 10 लाख रुपये, महाराष्ट्र में 55 लाख रुपये और गुजरात में 75 लाख रुपये बचाए गए। चार मामलों में 65 से 80 वर्ष तक के बुजुर्ग डिजिटल अरेस्ट के शिकार थे। कुछ पीड़ित दो सप्ताह से अधिक समय तक डर के कारण ठगों के निर्देशों का पालन कर रहे थे।
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हिन्दुस्थान समाचार / धीरेन्द्र यादव