भारत की सांस्कृतिक चेतना और ज्ञान परंपराएं हमारी सभ्यतागत निरंतरता की नींव: गजेंद्र सिंह शेखावत

युगवार्ता    28-Oct-2026
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नई दिल्ली, 28 अक्टूबर (हि.स.)।

केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि भारत की पहचान केवल भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि हजारों वर्षों से चली आ रही सांस्कृतिक चेतना, ज्ञान परंपराओं, आध्यात्मिक साधना और ऐतिहासिक अनुभवों से निर्मित हुई है। भारत की सभ्यता और संस्कृति ने सदियों से निरंतर प्रवाह बनाए रखा है और दुनिया की विभिन्न सभ्यताओं के साथ संवाद एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से अपने संबंध स्थापित किए हैं।

यह बात आज उन्होंने नई दिल्ली के मंडी हाउस स्थित भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के धरोहर भवन में आयोजित एक कार्यक्रम में कही। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण और पुनरुत्थान पर केंद्रित पुस्तक ‘टाइमलेस इंडिया: प्रोटेक्शन एंड रिवाइवल ऑफ इंडियन कल्चरल आइडेंटिटी अंडर द लीडरशिप ऑफ प्राइम मिनिस्टर नरेंद्र मोदी’ का विमोचन किया गया। पुस्तक का प्रकाशन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) और सुभी पब्लिकेशंस ने किया है, जबकि इसके संपादक तरुण विजय हैं। कार्यक्रम का आयोजन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और आईजीएनसीए के सहयोग से किया गया।

कार्यक्रम में केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ. विनय सहस्रबुद्धे ने मुख्य वक्तव्य दिया। सांस्कृतिक चिंतक डॉ. अनिल गोयल ने सत्र की अध्यक्षता की। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक वाई. एस. रावत और दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. रमेश सी. गौर सहित कई विद्वान और बुद्धिजीवी भी कार्यक्रम में उपस्थित रहे।

केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीयों के मन में अपनी सभ्यता, संस्कृति और परंपराओं के प्रति गौरव की भावना को कमजोर करने के प्रयास किए गए। इसका प्रभाव भारतीय ज्ञान परंपराओं और सांस्कृतिक आदर्शों को देखने के नजरिए पर भी पड़ा।

उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता की विशेषता यह है कि वह अतीत से प्रेरणा लेते हुए भविष्य की ओर आगे बढ़ती है। भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के आदर्शों के साथ ऋषियों, विचारकों और ज्ञान के साधकों की परंपरा आज भी भारत की सांस्कृतिक चेतना का महत्वपूर्ण आधार है। भारत की स्थापत्य कला, ज्ञान परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत ने विश्वभर के देशों को आकर्षित किया है।

डॉ. विनय सहस्रबुद्धे ने कहा कि भारत की प्राचीन संस्कृति और उसकी कालजयी यात्रा को समझने के लिए अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूकता और गौरव का भाव आवश्यक है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक भारतीय संस्कृति के बारे में खुलकर बात करने में एक प्रकार की झिझक बनी रही, जिसके कारण औपनिवेशिक मानसिकता से पूरी तरह बाहर निकलने की प्रक्रिया प्रभावित हुई।

उन्होंने कहा कि ‘टाइमलेस इंडिया’ जैसी पुस्तकें भारत की सांस्कृतिक निरंतरता और भारतीयता के मूल स्वरूप को समझने का अवसर प्रदान करती हैं। उन्होंने प्रसिद्ध लेखक मार्क टुली की पुस्तक ‘नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया’का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय समाज की विशेषता आम लोगों की आस्था और उनके जीवन के अनुभवों को समझने में है।

डॉ. सहस्रबुद्धे ने इस बात पर भी जोर दिया कि भारतीय संस्कृति को केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि इसे शिक्षा और दैनिक जीवन का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। इसके लिए मातृभाषा में शिक्षा को प्रोत्साहित करने और विद्यार्थियों तक भारतीय जीवन, संस्कृति तथा परंपराओं से जुड़ी सामग्री पहुंचाने की आवश्यकता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ. अनिल गोयल ने कहा कि भारत एक प्राचीन सभ्यता है, जिसकी सांस्कृतिक चेतना हजारों वर्षों से चली आ रही जीवंत परंपराओं में दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि मंदिर, स्तूप, किले, मूर्तियां और अभिलेख केवल ऐतिहासिक स्मारक नहीं हैं, बल्कि वे हमारे पूर्वजों के ज्ञान, कला, विज्ञान, आस्था और दर्शन के प्रमाण भी हैं।

उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण राष्ट्रीय पहचान, सभ्यतागत निरंतरता और आने वाली पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी है। भारतीय इतिहास को तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर समझने तथा इतिहास के उन पहलुओं को सामने लाने की जरूरत है, जिन्हें पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाया है।

डॉ. गोयल ने कहा कि विकास और विरासत, आधुनिकता और परंपरा तथा विज्ञान और संस्कृति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। भारत की सांस्कृतिक विरासत को औपनिवेशिक प्रभावों से मुक्त दृष्टिकोण के साथ समझना और उसके ऐतिहासिक महत्व को व्यापक स्तर पर सामने लाना समय की आवश्यकता है।

पुस्तक के संपादक तरुण विजय ने इसके विषय और उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इसमें भारत की सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण, ऐतिहासिक स्मृतियों और स्मारकों के पुनरुद्धार से जुड़े पहलुओं को महत्व दिया गया है। डॉ. जितेंद्र सिंह ने भी पुस्तक की सराहना करते हुए इसके प्रकाशन के लिए तरुण विजय की प्रशंसा की।

‘टाइमलेस इंडिया’ में स्मारकों के संरक्षण को भारतीय सांस्कृतिक पहचान को सहेजने और पुनर्जीवित करने के महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक में ‘राष्ट्र की ऐतिहासिक स्मृति को औपनिवेशिक प्रभावों से मुक्त करने’ के विचार पर भी जोर दिया गया है। इसके माध्यम से भारत की विरासत को उसकी अपनी ऐतिहासिक परिस्थितियों, परंपराओं और सांस्कृतिक दृष्टिकोण के आधार पर समझने की आवश्यकता रेखांकित की गई है।

कार्यक्रम में विद्वानों, इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों ने भारतीय सभ्यता की निरंतरता, पुरातात्विक धरोहरों के संरक्षण और ऐतिहासिक विरासत को भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने के महत्व पर विचार रखे। पुस्तक का विमोचन भारतीय संस्कृति, इतिहास, पुरातत्व और सांस्कृतिक अध्ययन से जुड़े विषयों पर संवाद को आगे बढ़ाने

की पहल के रूप में सामने आया।

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हिन्दुस्थान समाचार / सौरव राय

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