नेपाल के सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: विधवा के दूसरी शादी करने पर पहले पति की संतान को नहीं देना होगा अपना हिस्सा

युगवार्ता    03-Oct-2026
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सुप्रीम कोर्ट


काठमांडू, 03 अक्टूबर (हि.स.)। नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि किसी विधवा महिला द्वारा दूसरी शादी करने पर उसे पहले पति से हिस्से में मिली संपत्ति उसके पहले पति की संतान को देना अनिवार्य नहीं होगा।

मुलुकी देवानी संहिता, २०७४ की धारा २१४ की उपधारा (२) में प्रावधान था कि यदि विधवा महिला दूसरी शादी करती है और उसके पास पहले पति से संतान है, तो उसे हिस्से के रूप में मिली संपत्ति उन बच्चों को देनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान को संविधान के खिलाफ बताते हुए अमान्य और रद्द कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह प्रावधान संविधान के धारा १६ में दिए गए सम्मानपूर्वक जीने के अधिकार, धारा १८ के समानता के अधिकार और धारा २५ के संपत्ति के अधिकार से टकराता है।

न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ल की अध्यक्षता वाली संवैधानिक पीठ ने 21 बैशाख को यह फैसला सुनाया है। शुक्रवार को फैसले का पूर्ण पाठ सार्वजनिक किया गया। पीठ में कुमार रेग्मी, हरिप्रसाद फुयाल, डॉ. मनोजकुमार शर्मा और नहकुल सुवेदी भी शामिल थे।

महिला कानून और विकास मंच की ओर से अधिवक्ता मीरा ढुंगाना ने यह रिट दायर की थी। इसमें प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद कार्यालय, कानून मंत्रालय, तत्कालीन महिला, बालबालिका तथा ज्येष्ठ नागरिक मंत्रालय और प्रतिनिधि सभा को विपक्षी बनाया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भले ही कानून विधवा महिला को दूसरी शादी करने से सीधे तौर पर नहीं रोकता, लेकिन दूसरी शादी करने पर पहले पति से मिली हिस्से की संपत्ति बच्चों को देने का प्रावधान ऐसी स्थिति पैदा करता है, जिसमें महिला को या तो अपनी संपत्ति छोड़नी पड़ती है या फिर दूसरी शादी नहीं करनी पड़ती।

अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था मुलुकी देवानी संहिता की धारा ६९ के तहत प्रत्येक व्यक्ति को विवाह करने, परिवार कायम करने और पारिवारिक जीवन जीने की स्वतंत्रता के अधिकार को भी प्रभावित करती है।

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, इस व्यवस्था से विधवा महिलाएं आर्थिक रूप से कमजोर हो सकती हैं और उन्हें दूसरी शादी करने से हतोत्साहित किया जा सकता है। पति की मृत्यु के बाद विधवा को मिली संपत्ति उसकी अपनी संपत्ति होती है और उस पर उसे अधिकार प्राप्त है। इसलिए दूसरी शादी करने की वजह से उस संपत्ति पर प्रतिबंध लगाना उसके सम्मानपूर्वक जीवन जीने के अधिकार को प्रभावित करता है।

फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चों के प्रति जिम्मेदारी माता-पिता दोनों की समान होती है। इसलिए बच्चों की आर्थिक सुरक्षा का आधार दिखाकर केवल विधवा महिला की संपत्ति और विवाह की स्वतंत्रता को सीमित करना लैंगिक और वैवाहिक स्थिति के आधार पर भेदभाव है।

अदालत ने कहा कि यह प्रावधान सीधे तौर पर लैंगिक भेदभावपूर्ण दिखाई देता है और इसे संविधानसम्मत नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इस प्रावधान से संपत्ति के अधिकार पर अस्वाभाविक कानूनी प्रतिबंध लगता है और यह विधवा महिलाओं को दोबारा शादी करने से हतोत्साहित करने वाली पारंपरिक मान्यता को जारी रखने जैसा है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि पति की मृत्यु के बाद बच्चों की देखभाल और शिक्षा की जिम्मेदारी मां की होना स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन केवल इस आधार पर कि विधवा ने दूसरी शादी कर ली है, उसे अपने हिस्से में मिली संपत्ति छोड़ने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अंश का अधिकार किसी राज्य या व्यक्ति की कृपा से मिलने वाला दान या उपहार नहीं है, बल्कि अंशियार होने के नाते मिलने वाला प्राकृतिक और जन्मसिद्ध अधिकार है।

एक बार कानूनी रूप से अंश-बंटवारा हो जाने और अपना हिस्सा प्राप्त कर लेने के बाद उस संपत्ति पर संबंधित व्यक्ति का पूर्ण और अविच्छिन्न स्वामित्व कायम हो जाता है। ऐसी संपत्ति व्यक्ति की निजी संपत्ति के समान होती है और उसे उसके उपयोग, बिक्री तथा हस्तांतरण का अधिकार होता है।

फैसले में अदालत ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून बनाने का प्राथमिक अधिकार विधायिका के पास होता है और अदालत सामान्यतः विधायिका की नीतिगत समझ पर सवाल नहीं उठाती। लेकिन विधायिका का अधिकार असीमित नहीं है।

अदालत के मुताबिक, कानून हमेशा संविधान की सर्वोच्चता और मौलिक अधिकारों की सीमा के भीतर होना चाहिए। यदि कोई कानून इन संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन करता है, तो अदालत को उसकी संवैधानिक समीक्षा करने का अधिकार है।

रिट याचिका में दावा किया गया था कि यदि पत्नी की मृत्यु के बाद पुरुष दूसरी शादी करता है, तो उसे पहले बच्चों के लिए अपनी संपत्ति छोड़ने की बाध्यता नहीं है। लेकिन यदि पति की मृत्यु के बाद महिला दूसरी शादी करती है, तो उसे पहले पति से मिले हिस्से की संपत्ति बच्चों को देनी पड़ती है। याचिकाकर्ता ने इसे लैंगिक भेदभाव बताया था।

रिट में यह भी दावा किया गया था कि पुराने मुलुकी ऐन को हटाकर लागू की गई मुलुकी देवानी संहिता ने महिलाओं के पहले से प्राप्त अधिकारों को कम किया है। वहीं, विधुर पुरुष के मामले में बच्चों के प्रति उनकी जिम्मेदारी को भी कानून में समान रूप से निर्धारित नहीं किया गया है।

सरकार की ओर से अदालत में तर्क दिया गया था कि पहले पति से जन्मे बच्चों के अभिभावक-विहीन होने की संवेदनशील स्थिति को ध्यान में रखते हुए यह प्रावधान बनाया गया था। सरकार का कहना था कि इसका उद्देश्य ऐसे बच्चों पर पड़ने वाले आर्थिक संकट के जोखिम को कम करना था।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस उद्देश्य के बावजूद विधवा महिला के संपत्ति, विवाह और समानता के संवैधानिक अधिकारों पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए संबंधित कानूनी प्रावधान को अमान्य घोषित कर दिया।

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हिन्दुस्थान समाचार / पंकज दास

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