
नई दिल्ली, 20 फरवरी (हि.स.)। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के निदेशक चित्तरंजन त्रिपाठी ने शुक्रवार को कहा कि नाटक केवल मनोरंजन नहीं बल्कि समाज को अहंकार से मुक्त करने और 'शीतलता' प्रदान करने का सबसे सशक्त माध्यम है।
चित्तरंजन त्रिपाठी ने यह बात आज नई दिल्ली स्थित एनएसडी की ओर से आयोजित अंतरराष्ट्रीय '25वें भारत रंग महोत्सव 2026' के समापन समारोह के दौरान कही। पिछले करीब 3 सप्ताह से चल रहे इस कला महाकुंभ ने दिल्ली सहित देश के विभिन्न हिस्सों में रंगमंच की जीवंतता बिखेरी।
त्रिपाठी ने नाट्यशास्त्र के कालखंड का स्मरण कराते हुए कहा कि जब हमारे पूर्वज चिकित्सा, खगोल विज्ञान और सर्जरी में चरम पर थे, तब समाज में ज्ञान का अहंकार बढ़ने लगा था। उस दौर में इंसान को आत्म-केंद्रित होने से बचाने और तनावमुक्त करने के लिए ऋषियों ने 'संस्कृति' और 'रंगकर्म' का मार्ग चुना।
उन्होंने कहा कि जब से ईश्वर ने समाज रचा, रंगकर्म तभी से अस्तित्व में है। बाद में हमने संगीत, नृत्य और चित्रकला जैसे वर्गीकरण किए।
प्रधानमंत्री के 'विकसित भारत' के संकल्प को जोड़ते हुए त्रिपाठी ने कहा कि अगले 25 वर्षों में जब हम एक विकसित राष्ट्र बनेंगे, तो उसके लिए 'विकसित मस्तिष्क' और 'स्वस्थ मानसिकता' का होना अनिवार्य है, जो केवल कला और रंगकर्म से ही संभव है।
एनएसडी के पूर्व निदेशक प्रो. राम गोपाल बजाज ने कहा कि रंगमंच केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि हृदय और मस्तिष्क के 'चित्त' का मिलन है। नई पीढ़ी ने इस 'लीला भूमि' को न केवल संभाला है, बल्कि इसे विकसित भी किया है। उन्होंने विश्वास जताया कि नाट्य कला का यह संबल भविष्य में और अधिक विस्तृत और सफल होगा।
एनएसडी सोसाइटी के उपाध्यक्ष प्रो. भरत गुप्त ने कहा कि रंगकर्मी अपनी कला के माध्यम से उस दिव्य रूप, चरित्र और दिव्यता को सामान्य जन के बीच साक्षात प्रस्तुत करता है।
इस महोत्सव की 'रंगदूत' मीता वशिष्ठ ने सभी से आग्रह किया कि रंगमंच को अपने घर और मोहल्ले का हिस्सा बनाएँ। चाहे खाली पड़ी ज़मीन हो या नई बनती इमारतें, हर जगह कला के लिए एक कोना होना चाहिए क्योंकि हमारी नई पीढ़ी अब थिएटर की तलाश में है।
इस मौके पर भास्कर चंद्र महापात्र की पुस्तक 'सिक्स सीजन' (किशोर भावनाओं पर आधारित लघु नाटक) और दक्षिणा शर्मा द्वारा अनुवादित पुस्तक 'वनहंस' का लोकार्पण किया गया। इन पुस्तकों चर्चा परिचर्चा भी की गई। समापन समारोह के उपलक्ष्य में कई महत्वपूर्ण गतिविधियां आयोजित की गईं।
समारोह का मुख्य आकर्षण सरदार वल्लभभाई पटेल के जीवन पर आधारित नाटक 'लौह पुरुष' प्रस्तुत किया गया। इस नाटक का निर्देशन चित्तरंजन त्रिपाठी ने किया। समापन समारोह का स्वागत भाषण चित्तरंजन त्रिपाठी, अध्यक्षता एनएसडी सोसाइटी के उपाध्यक्ष प्रो. भरत गुप्त और धन्यवाद ज्ञापन प्रदीप के मोहंती ने किया।
इस मौके पर मुख्य अतिथि प्रो राम गोपाल बजाज, विशिष्ट अतिथि गीतकार स्वानंद किरकिरे और मीता वशिष्ठ और सहित अन्य कलाकार, कलाप्रेमी, गणमान्य जन मौजूद रहे।
उल्लेखनीय है कि 25वें ‘भारत रंग महोत्सव 2026’ का आगाज 27 जनवरी को नई दिल्ली में निशांत भारती के लिखे और डॉ. रेखा मेहरा द्वारा निर्देशित नाटक 'मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम' से हुआ था। 31 जनवरी को कनाडा के मिसिसॉगा में रेडियो ढिशुम के सहयोग से सात नाटकों के मंचन के साथ इसका अंतरराष्ट्रीय सफर शुरू हुआ। कनाडा, जर्मनी, कतर, यूएई, सूरीनाम, नीदरलैंड, तंजानिया और मॉरीशस जैसे देशों में भारतीय कला का प्रदर्शन किया गया।
इसके तहत 7 महाद्वीपों और 15 से अधिक देशों में सफलतापूर्वक कई नाटकों को प्रस्तुत किया गया। अंटार्कटिका की धरती पर 'वंदे मातरम' और 'भगवद गीता' की गूंज ने इस महोत्सव को दुनिया का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय थिएटर महोत्सव बना दिया है।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी