
नई दिल्ली, 21 फ़रवरी (हि.स.)। उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने शनिवार को उपराष्ट्रपति भवन में आयोजित कार्यक्रम में भारतीय संविधान के अद्यतन तमिल और गुजराती संस्करणों का विमोचन किया। इस अवसर पर उन्होंने विधिक शब्दावली (अंग्रेजी–हिन्दी) के 8वें संस्करण का भी लोकार्पण किया।
समारोह को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर संविधान के इन संस्करणों का जारी होना अत्यंत हर्ष का विषय है। उन्होंने कहा कि मातृभाषाएं हमारी पहचान, विचार और सांस्कृतिक निरंतरता की आधारशिला होती हैं। ऐसे महत्वपूर्ण दिवस पर संविधान को तमिल और गुजराती में उपलब्ध कराना भाषाई गौरव और लोकतांत्रिक मूल्यों का सशक्त संदेश देता है।
उन्होंने भारत की भाषाई समृद्धि का उल्लेख करते हुए कहा कि तमिल से कश्मीरी और गुजराती से असमिया तक, देश की प्रत्येक भाषा अपने भीतर सदियों की विरासत संजोए हुए है। भारतीय संविधान इस विविधता को मान्यता देता है और बहुभाषिकता को हमारी शक्ति के रूप में स्वीकार करता है। उन्होंने कहा कि विश्व में शायद ही कोई ऐसा देश होगा, जहां संविधान इतने विविध भाषाई रूपों में उपलब्ध हो।
उपराष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में विधि एवं न्याय मंत्रालय द्वारा संविधान को विभिन्न भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराने के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने बताया कि पिछले एक दशक में पहली बार बोडो, डोगरी और संथाली जैसी भाषाओं में संविधान के आधिकारिक अनुवाद उपलब्ध कराए गए हैं। उन्होंने स्मरण किया कि गत दिसंबर में राष्ट्रपति भवन में संथाली संस्करण के विमोचन कार्यक्रम में वे स्वयं उपस्थित थे। इसके अतिरिक्त, पिछले वर्ष नेपाली भाषी नागरिकों के लिए पहली बार संविधान का नेपाली संस्करण भी जारी किया गया।
तमिल और गुजराती भाषाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि दोनों भाषाएं साहित्यिक प्रतिभा, दार्शनिक गहराई और सांस्कृतिक समृद्धि की दृष्टि से अत्यंत गौरवशाली हैं। उन्होंने हाल में मलेशिया यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा तमिल भाषा को विश्व की प्राचीनतम भाषाओं में से एक बताते हुए उसकी प्रशंसा किए जाने का भी उल्लेख किया तथा गुजराती साहित्य की समृद्ध परंपरा को रेखांकित किया।
उपराष्ट्रपति ने विधिक शब्दावली (अंग्रेजी–हिन्दी) के 8वें संस्करण के प्रकाशन पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि सरल और स्पष्ट भाषा में तैयार यह संस्करण विधायकों, विद्यार्थियों, न्यायिक अधिकारियों, शोधार्थियों, अनुवादकों और नीति-निर्माताओं के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा। उन्होंने इसे केवल एक संदर्भ ग्रंथ नहीं, बल्कि सशक्तिकरण का माध्यम बताया।
उन्होंने कहा कि यह पहल संविधान को लोगों तक उनकी अपनी भाषाओं में पहुंचाने का माध्यम बनेगी, जिससे लोकतांत्रिक भागीदारी और संवैधानिक जागरूकता और अधिक सुदृढ़ होगी।
उपराष्ट्रपति ने महात्मा गांधी के उस विचार का उल्लेख किया कि किसी राष्ट्र की संस्कृति उसके लोगों के हृदय और आत्मा में बसती है तथा भाषा उस आत्मा तक पहुंचने का सेतु है। उन्होंने नागरिकों से आह्वान किया कि वे अपनी मातृभाषा के साथ-साथ भारत की सभी भाषाओं के सामूहिक स्वर का सम्मान करें। कवि सुब्रमण्यम भारती के शब्दों को स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि भारत अनेक भाषाएं बोलता है, किंतु विचार और उद्देश्य मां भारती की सेवा के लिए समर्पित है।
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हिन्दुस्थान समाचार / सुशील कुमार