राष्ट्रपति भवन में राजाजी की प्रतिमा का अनावरण, राष्ट्रपति ने कहा- आत्मगौरव का सम्मान

युगवार्ता    23-Feb-2026
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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु सोमवार को राष्ट्रपति भवन परिसर में चक्रवर्ती सी. राजगोपालाचारी (राजाजी) की प्रतिमा का अनावरण करते हुए


नई दिल्ली, 23 फ़रवरी (हि.स.)। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सोमवार को राष्ट्रपति भवन परिसर में आजाद भारत के पहले और एकमात्र भारतीय गवर्नर जनरल चक्रवर्ती सी. राजगोपालाचारी (राजाजी) की प्रतिमा का अनावरण किया। इस अवसर पर राष्ट्रपति ने राजाजी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को समर्पित प्रदर्शनी का भी अवलोकन किया। यह प्रदर्शनी 24 फरवरी से 1 मार्च तक राष्ट्रपति भवन स्थित अमृत उद्यान में आने वाले आम नागरिकों के लिए खुली रहेगी।

अशोक मंडप के समीप ग्रैंड ओपन सीढ़ी पर स्थापित राजाजी की यह प्रतिमा पहले वहां लगी एडविन लुटियंस की प्रतिमा के स्थान पर लगाई गई है। इसे औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेषों को समाप्त करने और भारत की सांस्कृतिक विरासत तथा राष्ट्रीय आत्मगौरव को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि राष्ट्रपति भवन में स्थापित की गई राजाजी की प्रतिमा का अनावरण करना उनके लिए ऐतिहासिक अवसर है। राजाजी को सम्मानित कर देश ने अपने आत्मगौरव का सम्मान किया है। उन्होंने स्मरण कराया कि जब राजाजी गवर्नमेंट हाउस (अब राष्ट्रपति भवन) पहुंचे थे, तब उन्होंने अपने कक्ष में रामकृष्ण परमहंस और महात्मा गांधी के चित्र लगाए थे। इससे उन्होंने यह संदेश दिया कि भारत भले ही औपचारिक रूप से डोमिनियन रहा हो, लेकिन भारतीयों के हृदय में स्वराज स्थापित हो चुका था।

राष्ट्रपति ने कहा कि भारत की विरासत पर गर्व करने और गुलामी की मानसिकता से मुक्ति का जो राष्ट्रीय अभियान चल रहा है, उसमें राजाजी के आदर्श स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। ब्रिटिश शासन के दौरान शासक जनता से दूरी बनाए रखते थे, लेकिन स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र का मूल सिद्धांत जन-जन से जुड़ाव है। राष्ट्रपति भवन राष्ट्र का भवन है और इसके द्वार सभी देशवासियों के लिए खुले हैं।

राष्ट्रपति ने ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य की ओर अग्रसर देशवासियों से राजाजी के आदर्शों से प्रेरणा लेने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि राजाजी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे और विधि, स्वतंत्रता संग्राम, सामाजिक-आर्थिक सुधार, प्राचीन भारतीय ग्रंथों, तमिल एवं अंग्रेजी साहित्य, कविता, संगीत, राजनीति और प्रशासन जैसे अनेक क्षेत्रों में उनका योगदान अतुलनीय रहा है।

इस अवसर पर आयोजित ‘राजाजी उत्सव’ को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने कहा कि राजाजी की प्रतिमा का अनावरण औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्ति की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम है। यह प्रक्रिया एक सतत परिवर्तन है, जो शासन, कानून, शिक्षा, संस्कृति और राष्ट्रीय पहचान के क्षेत्रों में दिखाई दे रही है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में ‘गुलामी मानसिकता से मुक्ति’ की परिकल्पना को अनेक पहलों के माध्यम से साकार किया गया है। इनमें राजभवनों को लोकभवनों के रूप में विकसित करना, औपनिवेशिक काल के आपराधिक कानूनों को निरस्त करना, इंडिया गेट के समीप सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा की स्थापना तथा राष्ट्रीय युद्ध स्मारक का निर्माण शामिल है।

उन्होंने राष्ट्रपति भवन में आरंभ की गई पहलों—जैसे उद्यानों को अमृत उद्यान के रूप में खोलना, दरबार हॉल का नाम बदलकर गणतंत्र मंडप करना तथा परम वीर चक्र विजेताओं के चित्र स्थापित करने का भी उल्लेख किया और कहा कि ये कदम भारत के सभ्यतागत आत्मविश्वास को सुदृढ़ करते हैं।

कार्यक्रम में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जगत प्रकाश नड्डा, विदेश मंत्री डॉ. सुब्रह्मण्यम जयशंकर, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, राज्यसभा उपसभापति हरिवंश, विधि एवं न्याय राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुनराम मेघवाल, सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री डॉ. एल. मुरुगन, जलशक्ति राज्यमंत्री राजभूषण चौधरी, उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय में राज्यमंत्री निमुबेन जयंतीभाई बंभानिया और राजाजी के परिजनों सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

राजाजी के प्रपौत्र एवं भाजपा नेता सीआर केसवन ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि राजाजी की विरासत को सम्मानित किया जाना राष्ट्र के लिए गौरव का विषय है।

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हिन्दुस्थान समाचार / सुशील कुमार

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