नई दिल्ली, 27 फरवरी (हि.स.)। अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम ने उच्चतम न्यायालय के उस फैसले का स्वागत किया है, जिसमें छत्तीसगढ़ के जनजातीय इलाकों में ईसाई मिशनरियों के प्रवेश पर ग्रामसभाओं द्वारा लगाए गए बोर्डों को वैध ठहराया गया है।
उच्चतम न्यायालय ने विगत 16 फरवरी को अपने फैसले में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा था कि लालच या धोखाधड़ी के माध्यम से धर्मांतरण पर रोक के उद्देश्य से लगाए गए होर्डिंग्स को असंवैधानिक नहीं माना जा सकता। उच्च न्यायालय ने अपने पूर्व आदेश में टिप्पणी की थी कि प्रलोभन और हेरफेर के जरिए जनजातीय आबादी के धर्मांतरण की आशंकाओं को देखते हुए ग्रामसभाओं द्वारा उठाए गए कदमों को अवैध नहीं ठहराया जा सकता।
उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि पंचायत एक्सटेंशन टू शेड्यूल्ड एरियाज (पेसा) कानून के तहत ग्रामसभाओं को अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं की रक्षा का पूर्ण अधिकार है। न्यायालय ने यह भी माना कि ग्रामसभाएं केवल औपचारिक संस्थाएं नहीं, बल्कि वास्तविक स्वशासन की इकाइयां हैं, जिन्हें अनुसूचित क्षेत्रों में विशेष संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है।
छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री एवं पंचायत राजमंत्री विजय शर्मा ने कहा कि उच्चतम न्यायालय का यह निर्णय संविधान की मूल भावना और जनजातीय संस्कृति के संरक्षण की पुष्टि करता है। सरकार ग्रामसभाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और पेसा नियमों को और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में कार्य कर रही है, ताकि जनजातीय समाज अपनी संस्कृति और परंपराओं को अक्षुण्ण रख सके।
अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष सत्येंद्र सिंह ने राज्य सरकार की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि यह निर्णय जनजातीय स्वशासन की अवधारणा को मजबूत करता है। उन्होंने अनुसूचित क्षेत्रों वाले सभी 10 राज्यों से आह्वान किया कि वे पेसा अधिनियम की मूल भावना के अनुरूप अपने-अपने राज्यों में सख्त नियम बनाएं और उच्चतम न्यायालय के इस आदेश के अनुरूप दिशानिर्देश जारी करें, ताकि जनजातीय समाज अपनी पारंपरिक संस्कृति और पूजा-पद्धति की रक्षा कर सके।-----------
हिन्दुस्थान समाचार / अनूप शर्मा