'द केरला स्टोरी- गोज बियॉन्ड : एक कथानक जो हमें स्त्री विमर्श के लिए प्रेरित करता है

युगवार्ता    28-Feb-2026
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फिल्म द केरल स्टोरी 2 गोज बियॉन्ड


- डॉ. मयंक चतुर्वेदी

रिलीज से ठीक पहले बड़ा न्यायिक हस्तक्षेप और फिर बैन के बाद जैसे आशा की एक किरण दिखाई दी, ये परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि केरल उच्च न्यायालय में फिल्म ‘द केरल स्टोरी 2- गोज बियॉन्ड’ की रिलीज पर लगी 15 दिन की रोक को स्थगित कर दिया, इसी के साथ देश भर के सिनेमा घरों में ये फिल्म प्रदर्शित कर दी गई।

दरअसल, आज जब हम 'द केरला स्टोरी 2- गोज बियॉन्ड' को देखते हैं, तब समझ आता है कि फिल्म केरल की सीमाओं को तोड़कर राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों तक फैली साजिश को उजागर कर रही है और भारत के गैर मुस्लिम समाज को चेतावनी दे रही है कि सचेत और सावधान रहें। वस्तुत: केरला स्टोरी-2 पूर्व में आई फिल्म के संदर्भ में इस बात को रेखांकित करती है कि यह लव जिहाद, इस्लामिक स्टेट, गजबा-ए-हिंद की सोच देश भर में अनवरत चल रही है, जिस पर सभ्य समाज और भारत को भारत बने रहने के लिए रोक लगाना जरूरी है।

फिल्म में दिखाई गई तीन हिंदू युवतियां स्कॉलर सुरेखा नायर (केरल), ओलंपिक एथलीट नेहा (मध्य प्रदेश) और डांसर दिव्या पालीवाल (राजस्थान) अपने सपनों की उड़ान भर रही होती हैं। लेकिन मुस्लिम पुरुषों सलीम, फैजान और रशीद के प्रेम के जाल में फंसकर वे बुर्के की कैद में सपनों को चकनाचूर होते देखती हैं। फिल्म के कथानक और संवाद की अच्छी बात यह है कि सभी मुसलमानों को एक तराजू में नहीं तोला गया, पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से लेकर हर उस मुसलमान की प्रशंसा की गई है जो देशभक्त है।

इसके लिए फिल्म की तीन केरेक्टर जिसमें कि एक केरल से है, कहती भी है, देश में हम जैसी तमाम लड़किया तुम जैसे मुसलमानों के जाल में इसलिए फंस जाती हैं, क्योंकि हमारे सामने देशभक्त मुसलमानों की छवि सामने रहती है। यहां वह तमाम मुस्लिम देशभक्तों के नाम गिनाती है। इसलिए ये फिल्म किसी मुसलमान के खिलाफ नहीं, वास्तव में उस सोच के खिलाफ है, जोकि भारत को 2047 तक मुस्लिम राज्य के रूप में देखना चाहती है।

इसमें दर्शायी गई राजस्थान की कहानी एक 16 साल की नाबालिग हिंदू लड़की की है जिसे जबरन धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया जाता है, जिसके बाद उसका परिवार पुलिस में मामला दर्ज कराता है। कार्रवाई शुरू में नहीं होती। लड़की जब अपना प्रताड़ना से जुड़ा वीडियो बनाकर अपनी मां को भेजती है, तब उसके इस्लामिक लवजिहादी को ये पता चल जाता है और वह उसे मार देता है, फिर उसके छोटे-छोटे टुकड़े कर देता है।

मध्य प्रदेश की कहानी में एक युवती जोकि प्यार और शादी के झांसे में आकर अपनी पहचान खो देती है। लव जिहादी अपने नाम की पहचान छिपाकर हिन्दू बनकर प्यार का नाटक करता है और बाद में उसे धर्म बदलने के लिए मजबूर किया जाता है। इस्लामिक लोग उसका हिन्दू होने के नाते बार-बार रेप करते हैं, उस पर हिंसा करते हैं। वस्तुत: ये कहानी एक दलित समाज से जुड़ी है।

यहां तीसरी कहानी में केरल है। एक मुस्लिम युवक जोकि पत्रकार भी है और हिंदू युवती जोकि यूपीएससी की तैयारी कर रही है के बीच 'लिव-इन रिलेशनशिप' और उसके बाद धर्म बदलने के दबाव के कारण पैदा हुए तनाव को दिखाया गया है। जिसमें कि लड़की को इस्लाम कबूल करने के लिए इतना दबाव बनाया जाता है कि उसे गाय का मांस तक खिलाया जाता है, तब भी लड़की नहीं मानती, वह कन्वर्जन के लिए तैयार नहीं होती, उसे अपने हिन्दू होने पर गर्व होता है और अपनी अंतिम इच्छा मरने के बाद दाह संस्कार की वह व्यक्त करती है।

फिल्म की तरह हमारे आसपास गहराई से देखें, कभी लखनऊ में एनजीओ संचालिका को फतवा जारी कर धमकाया गया। भोपाल में एक विधवा महिला से हिंदू बनकर दोस्ती की, दुष्कर्म कर वीडियो बनाकर ब्लैकमेल किया, बच्चे के जन्म के बाद धर्म (मजहब) बदलने को मजबूर किया। गुरुग्राम में फर्जी पहचान से शादी रचाई, फिर मारपीट-धमकी देकर जबरन इस्लाम कबूल करवाया। बस्ती में अजफरुल हक उर्फ प्रिंस ने 100+ युवतियों के साथ नाम बदलकर और कलावा पहनकर धोखा किया, वीडियो बनाकर देह व्यापार में धकेला, नेपाल तक बेचा। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) लखनऊ में हिंदू रेजिडेंट डॉक्टर को प्रेम जाल में फंसाया, शारीरिक शोषण कर धर्म बदलने का दबाव डाला, इनकार पर डिप्रेशन में सुसाइड की कोशिश जैसी देश भर में अनेक दर्दनाक घटनाएं हर रोज बड़ी संख्या में घट रही हैं।

कहना होगा कि यह दर्दभरी कहानियां सनातन धर्म पर पल-पल होता सुनियोजित इस्लामिक हमला है। हिंदू लड़कियां अपनी पहचान खो रही हैं, परिवार बिखर रहे हैं, समाज में डर फैल रहा है। सरकारें कानून बना रही हैं, लेकिन जागरूकता! उस स्तर पर कहीं नहीं दिखाई दे रही, जिसकी कि आज दरकार है! ऐसी हजारों दुख भरी कहानियां हैं जो प्यार में फंसकर अपना सब कुछ गवां बैठीं ।

दरअसल, ये फिल्म सभी गैर मुसलमानों (हिन्दू, सिख, बौद्ध, ईसाई, आदि) को सावधान करती है; फिल्म का अंतिम संदेश गूंजता है- इसीलिए हमें लड़ना होगा। क्योंकि अभी नहीं तो कभी नहीं। उल्का गुप्ता, अदिति भाटिया, ऐश्वर्या ओझा फिल्म में पीड़िताओं की भूमिकाओं में जान डालती हुई हमें बड़े पर्दे पर दिखाई देती हैं। निर्देशक कामाख्या नारायण सिंह ने अदालती मामलों से प्रेरित कथा बुनी है। ट्रेलर रिलीज होते ही बवाल होते हुए हमने देखा है। एक तरफ प्रोपोगेंडा का आरोप, दूसरी तरफ हिंदू बेटियों की सुरक्षा का सच।

निर्माताओं का संदेश साफ है, उन्होंने हमारी बेटियों को निशाना बनाया। इस बार हम चुप नहीं रहेंगे। 27 फरवरी 2026 को रिलीज हुई यह फिल्म हमें अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए हर स्तर पर प्रेरित करती है। ऑनलाइन प्रतिक्रियाएं तीखी हैं; कुछ प्रशंसा कर रहे, कुछ सवाल उठा रहे। किंतु सच्चाई से नहीं भागा जा सकता है, और सच यही है कि यह फिल्म हमारी पीढ़ियों को बचाने का आह्वान है। इसलिए फिल्म देखिए, बेटियों को जागरूक कीजिए। यही इसका मूल संदेश है।

(लेखक केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी), सेंसरी समिति के पूर्व सदस्य एवं पत्रकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

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