सद्भाव और शांति के जरिए दुनिया में युद्ध रोक सकता है भारत : मोहन भागवत

युगवार्ता    20-Mar-2026
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सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत नागपुर मे आयोजित कार्यक्रम मे बोलते हुए


नागपुर, 20 मार्च (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि भारत अपनी सद्भावना और शांति की परंपरा के जरिए दुनिया में युद्ध रोक सकता है।

महाराष्ट्र के नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में शुक्रवार काे सरसंघचालक डॉ. भागवत ने वैश्विक हालात पर चिंता जताते हुए कहा कि आज दुनिया जिस अस्थिर दौर से गुजर रही है, उसके पीछे मुख्य कारण स्वार्थ और वर्चस्व की होड़ है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत अपनी सद्भावना और शांति की परंपरा के जरिए दुनिया को संघर्षों से बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

नागपुर में आयोजित इस कार्यक्रम में सरसंघचालक ने विश्व हिंदू परिषद के कार्यालय की नींव रखी। इसके बाद उन्हाेंने कहा कि जब तक इंसान अपनी सोच में स्वार्थ से ऊपर नहीं उठेगा, तब तक युद्ध और टकराव खत्म नहीं होंगे। उन्हाेंने कहा कि केवल बाहरी समझौते या बातचीत से स्थायी शांति संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए समाज के भीतर नैतिक मूल्यों, अनुशासन और एकता का होना जरूरी है।

उन्होंने बताया कि पिछले करीब 2000 वर्षों में दुनिया ने संघर्षों को समाप्त करने के कई प्रयास किए, लेकिन उनमें से बहुत कम सफल हो सके। अब समय आ गया है कि मानवता ऐसे रास्ते अपनाए, जो वास्तविक और स्थायी शांति की ओर ले जाएं।

इस अवसर पर डॉ. भागवत ने सामाजिक चुनौतियों पर भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि आज भी समाज में धार्मिक असहिष्णुता, जबरन धर्म परिवर्तन और ऊंच-नीच जैसी समस्याएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं, जिन्हें मिलकर दूर करना होगा। भारत की वैश्विक भूमिका पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि जहां कुछ देश दुनिया को ‘अस्तित्व की लड़ाई’ के नजरिए से देखते हैं, वहीं भारत का दृष्टिकोण मानवता, एकता और सहअस्तित्व पर आधारित है। यही कारण है कि जब भी विश्व में शांति और संतुलन की बात होती है, तो दुनिया की नजर भारत की ओर जाती है।

डॉ. भागवत ने भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि यह हमेशा सिखाती है कि पूरी सृष्टि एक है और आपस में जुड़ी हुई है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि आधुनिक विज्ञान भी अब इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है।

अपने संबोधन के अंत में सरसंघचालक ने कहा कि धर्म केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि वह व्यक्ति के आचरण और व्यवहार में दिखना चाहिए। उन्होंने समाज से एकजुट होकर इन वैश्विक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करने का आह्वान किया।

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हिन्दुस्थान समाचार / मनीष कुलकर्णी

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