
- ‘जल संचय से जन भागीदारी’ को मिला बल
नई दिल्ली, 22 मार्च (हि.स.)। जल शक्ति मंत्रालय के तहत पेयजल एवं स्वच्छता विभाग (डीडीडब्ल्यूएस) ने रविवार को विश्व जल दिवस के अवसर पर आयोजित जल महोत्सव 2026 के समापन पर जल जीवन मिशन (जेजेएम) 2.0 के संचालन दिशा-निर्देश जारी किए। इस अवसर पर पांच राज्यों के पांच गांवों के प्रतिनिधियों के साथ ‘सुजल ग्राम संवाद’ का आयोजन किया गया, जिसमें ग्रामीण स्तर पर जल प्रबंधन के अनुभव साझा किए गए।
कार्यक्रम में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल और राज्य मंत्री वी. सोमन्ना वर्चुअल माध्यम से शामिल हुए। जल महोत्सव 2026 का आयोजन 8 मार्च से 22 मार्च तक 15 दिनों के राष्ट्रव्यापी अभियान के रूप में किया गया, जिसमें ‘जल अर्पण’ और जनभागीदारी के जरिए जल संरक्षण को बढ़ावा दिया गया।
केंद्रीय मंत्री पटेल ने कहा कि जल जीवन मिशन केवल नल कनेक्शन देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण भारत में विशेषकर महिलाओं और बच्चों के जीवन में सुधार लाने वाला अभियान है। उन्होंने बताया कि मिशन के दूसरे चरण में अब टिकाऊपन, कार्यक्षमता और सेवा की गुणवत्ता पर जोर दिया जाएगा, ताकि हर ग्रामीण परिवार को नियमित, पर्याप्त और सुरक्षित पेयजल दीर्घकाल तक मिल सके। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन में जल संरक्षण को जन आंदोलन बनाने के लिए ‘जल उत्सव’ और ‘नदी उत्सव’ जैसे कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
राज्य मंत्री सोमन्ना ने कहा कि जल महोत्सव 2026 ने जनभागीदारी को मजबूत करते हुए इसे एक राष्ट्रीय अभियान का रूप दिया है। गांवों में बैठकों, जागरूकता कार्यक्रमों और स्कूल गतिविधियों के माध्यम से लोगों को जल संरक्षण के प्रति जागरूक किया गया। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण और सुरक्षित पेयजल की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं बल्कि समाज के हर वर्ग की है।
पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के सचिव अशोक के.के. मीणा ने बताया कि जल महोत्सव के दौरान देशभर में जल स्रोतों और टैंकों की सफाई, फील्ड टेस्ट किट के माध्यम से जल गुणवत्ता परीक्षण और अन्य गतिविधियों के जरिए जल सुरक्षा के प्रति व्यापक जागरूकता पैदा की गई। उन्होंने कहा कि जल जीवन मिशन 2.0 के दिशा-निर्देश ग्रामीण पेयजल सेवाओं के बेहतर प्रबंधन के लिए एक स्पष्ट रोडमैप प्रदान करते हैं।
उन्होंने कहा कि नए दिशा-निर्देशों में सेवा प्रदाय के स्पष्ट मानक तय किए गए हैं, जिससे हर घर तक नियमित जल आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। साथ ही राज्य, जिला और ग्राम पंचायत स्तर पर जवाबदेही तय करने पर जोर दिया गया है। इसके अलावा जल स्रोतों के संरक्षण, वर्षा जल संचयन, ग्रे वाटर प्रबंधन और भूजल पुनर्भरण के माध्यम से दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने की दिशा में भी विशेष प्रावधान किए गए हैं। दिशा-निर्देशों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि जल स्रोतों की स्थिरता सुनिश्चित नहीं की गई तो पेयजल सेवाएं विश्वसनीय नहीं रह सकतीं।
कार्यक्रम के दौरान ‘सुजल ग्राम संवाद’ विशेष आकर्षण रहा, जिसमें उत्तराखंड, हरियाणा, छत्तीसगढ़, ओडिशा और मध्य प्रदेश के गांवों के प्रतिनिधियों ने अपने अनुभव साझा किए। इन गांवों में 24 घंटे जल आपूर्ति, नियमित जल गुणवत्ता परीक्षण, स्थानीय स्तर पर संचालन एवं रखरखाव और उपयोगकर्ता शुल्क के माध्यम से सिस्टम को सुचारु बनाए रखने जैसे सफल मॉडल सामने आए। कई स्थानों पर महिलाओं और ग्राम स्तरीय समितियों की सक्रिय भागीदारी भी देखने को मिली, जिससे जल प्रबंधन को मजबूती मिली है।
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हिन्दुस्थान समाचार / सुशील कुमार