
नई दिल्ली, 07 मार्च (हि.स.)। नई दिल्ली स्थित साहित्य अकादमी ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के एक दिन पूर्व शनिवार को यहां एकदिवसीय परिसंवाद का आयोजन किया। इस कार्यक्रम का विषय ’लोक साहित्य में नारी चित्रण’ था।
इस अवसर पर मौजूद साहित्य अकादमी की कार्यक्रम अधिकारी मृगनयनी गुप्ता ने कहा कि लोक साहित्य केवल एक रचनात्मक अभिव्यक्ति नहीं है यह एक समुदाय की भावनात्मक आत्मकथा है। इसके गीतों कथाओं कहावतों रीतियों में हम नारी को माता बेटियों विद्रोहियों प्रेमिकाओं श्रमिकों देवियों और शोषितों के रूप में मिलते हैं।
पहले सत्र में लोक साहित्यकार प्रीति आर्या ने कुमाऊंनी लोकसाहित्य के बारे में बात करते हुए कहा कि लोकसाहित्य में आदिम परंपरा है, उसमें स्त्री-पुरुष का कोई भेद नहीं है। कुमाऊंनी अंचल में शिल्पकार वर्ग लोकसाहित्य के रचयिता हैं। वहां की स्त्री शुरू से ही सशक्त रही है। लोक में स्त्री किसी से कमतर नहीं है।
प्रथम सत्र की अध्यक्षता लोक साहित्यकार सुगंधा नागर त्रिवेदी ने की। इस दौरान उन्होंने अपनी पुस्तक ’गुर्जरी लोकगीत’ का जिक्र करते हुए कहा कि दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान की गुर्जर महिलाओं पर आधारित लोकगीतों के इस संकलन में आशादेवी गुर्जरी का नाम शामिल है जो ऐसी पहली गुर्जर महिला थीं जिन्हें 11 अन्य महिलाओं के साथ स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान फांसी की सज़ा दी गई।
दूसरे सत्र में जोराम आनिया ताना ने निशिं जनजाति के बारे में बात करते हुए कहा कि हमारे लोकसाहित्य का अपना एक इतिहास है। अरुणाचल की पांच जनजातियां हैं लेकिन सबका मूल एक है। जीत तानी और अबो तानी की लोककथा का भी उल्लेख किया।
लोक साहित्यकार माहेश्वरी वीरसिंग गावित ने आदिवासी लोकसाहित्य में महिलाओं का स्थान पर चर्चा करते हुए कहा कि आदिवासी समुदाय में स्त्री को प्रकृति से सबसे अधिक जुड़ा हुआ माना जाता है। वर्ली जनजाति के लोकगीतों में गाय स्त्री आदि का विशेष महत्त्व है। भील और वर्ली जनजातियों की विविध परंपराएं हैं। कला के माध्यम से भी आदिवासी स्त्री सशक्त है।
दूसरे सत्र की अध्यक्षता लोक साहित्यकार वंदना टेटे ने की। उन्होंने कहा कि लोकसाहित्य कहने पर अपनत्व-सा महसूस नहीं होता। इसलिए मैं इसे पुरखा साहित्य कहना पसंद करूंगी। पुरखा साहित्य में कहीं भी विभाजन नहीं है। यह लोकसाहित्य हमारा आईना है जिसमें हम अपने इतिहास को देखते हैं। स्त्री के बिना सृजन संभव नहीं है। यह साहित्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे इतिहास को दर्शाता है। हमारे लोकगीत अनगढ़ तरीके से विद्यमान हैं। हमारे गीतों में सिर्फ़ करुण रस का ही नहीं प्रकृति के साथ प्रेम का भी चित्रण है। हमारी लोककथाएं समानता और आत्मनिर्भरता की बात करती है।
तीसरे सत्र की शुरुआत में एस्थर सैमुअल ने निकोबारी लोकगीत प्रस्तुत किया जिसमें निकोबार की सुंदरता का वर्णन किया गया था। गारो की लोक साहित्यकार बार्बरा ने गारो स्त्रियों से संबंधित परंपराओं पर बात करते हुए मीना खीरी रोकमे की सशक्तता पर भी बात की। इस सत्र की अध्यक्षता लोक साहित्यकार गीता ने की।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी