
(अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष साक्षात्कार)
सुनील दुबे/आकाश राय
नई दिल्ली, 08 मार्च (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी के दीनापुर गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने वाली कराटे खिलाड़ी शशिकला मौर्या आज कई युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। सीमित संसाधनों, आर्थिक तंगी और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपने पिता ओमप्रकाश मौर्या और कोच अरविंद मौर्या के सहयोग से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीतकर अपने सपनों को साकार किया है। प्रस्तुत हैं उनसे हिन्दुस्थान समाचार से हुई विशेष बातचीत के प्रमुख अंश....
प्रश्न : खेल के प्रति रुझान की शुरुआत कैसे हुई और परिवार में संघर्ष कैसा रहा?
उत्तर : मैं वाराणसी के दीनापुर गांव की रहने वाली एक आम सी लड़की हूं, जो अपने माता-पिता से मिले नाम को बनाने में लगी है। पारीवारिक हालात की बात कहूं तो पिता जी फूल-माला बेचकर परिवार का पालन-पोषण करते हैं। अपने खून-पसीने की कमाई में से कुछ हिस्सा वो मेरे शौक और पसंद के खेल कराटे, खासकर काता और कुमिते के साथ-साथ किकबॉक्सिंग को सीखने और प्रैक्टिस कराने का जिम्मा उठाते हैं।
शशिकला ने कहा कि उनकी शुरुआत बहुत साधारण तरीके से हुई। जब वो कंपोजिट विद्यालय में पढ़ती थीं, तब वहां एक सर कराटे की कोचिंग देने आते थे। उसी दौरान एक लड़की कराटे सीखने जाती थी, तो मैं भी उसके साथ वहां चली गई। वहीं मेरी मुलाकात मेरे कोच अरविंद मौर्य से हुई। उन्होंने मुझे सिखाना शुरू किया और धीरे-धीरे प्रतियोगिताओं में भी खिलाने लगे। मुझे यह खेल इतना पसंद आया कि मैंने इसे अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।
प्रश्न : आपके परिवार की आर्थिक स्थिति कैसी रही और इसका आपके खेल पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर : हमारे परिवार की आर्थिक स्थिति हमेशा चुनौतीपूर्ण रही है। मेरे पिता माला बेचते हैं और उसी से घर चलता है। कई बार टूर्नामेंट की फीस, किट और यात्रा का खर्च जुटाना बहुत मुश्किल हो जाता था। मेरी दिनचर्या भी काफी कठिन रही है। सुबह मैं फूल तोड़ने जाती हूं, फिर उन फूलों की माला बनाती हूं। उसके बाद प्रशिक्षण के लिए अकादमी जाती हूं। अकादमी पहुंचने के लिए मुझे लगभग 20 से 30 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। यह सब आसान नहीं होता, लेकिन मेरा ध्यान हमेशा अपने लक्ष्य पर रहता है।
प्रश्न : आपके पिता और कोच का आपके जीवन में कितना योगदान रहा है?
उत्तर : मेरे पिता ओमप्रकाश मौर्य मेरे सबसे बड़े प्रेरणास्रोत हैं। जब समाज के लोग कहते थे कि लड़की होकर मार्शल आर्ट्स क्यों सीख रही है, तब मेरे पिता हमेशा मेरे साथ खड़े रहे। उनका विश्वास ही मेरी सबसे बड़ी ताकत बनी।
इसके अलावा मेरे कोच अरविंद मौर्य का योगदान भी बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने मुझे सिर्फ प्रशिक्षण ही नहीं दिया, बल्कि कई बार आर्थिक रूप से भी मदद की। प्रतियोगिताओं की फीस से लेकर अन्य जरूरतों तक उन्होंने हमेशा मेरा साथ दिया। अगर उनका मार्गदर्शन न मिलता, तो शायद मैं यहां तक नहीं पहुंच पाती।
प्रश्न: राष्ट्रीय स्तर पर आपकी प्रमुख उपलब्धियां क्या रही हैं?
उत्तर : मैंने 2018 से राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में पदक जीतना शुरू किया। तब से दस से ज्यादा पदक जीते हैं और उम्मीद है कि आगे भी मेरी कोशिशें रंग लाएंगी। उनकी उपलब्धियां-2018: सब-जूनियर नेशनल कराटे चैंपियनशिप, नई दिल्ली – कुमिते में रजत पदक 2019: सब-जूनियर नेशनल कराटे चैंपियनशिप, नई दिल्ली – कुमिते में कांस्य पदक2019: नॉर्थ इंडिया जोनल कराटे चैंपियनशिप, देहरादून – कुमिते में रजत और काता में कांस्य पदक2023: कैडेट और जूनियर नेशनल कराटे चैंपियनशिप, देहरादून – कुमिते और काता में स्वर्ण पदक2023-24: 67वें नेशनल स्कूल गेम्स, लुधियाना – कुमिते में स्वर्ण पदक2024: नेशनल कराटे चैंपियनशिप, देहरादून – जूनियर काता में रजत पदक2025: ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी किकबॉक्सिंग चैंपियनशिप, मेरठ – रजत पदक2026: नेशनल कराटे चैंपियनशिप, नई दिल्ली – काता में रजत पदक
प्रश्न: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपका अनुभव कैसा रहा?
उत्तर : अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करना मेरे लिए बहुत गर्व की बात रही। अब तक कुछ ही मौके मिले हैं लेकिन मेरी कोशिश हमेशा रही कि अपने खेल को बेहतर तरीके से पेश करूं।
2023 में 21वीं एशियन कैडेट, जूनियर और अंडर-21 कराटे चैंपियनशिप, अल्माटी (कजाकिस्तान) – जूनियर काता में भारत का प्रतिनिधित्व और7वीं साउथ एशियन कराटे चैंपियनशिप, काठमांडू (नेपाल) – कुमिते में रजत पदक, यह मेरे जीवन का सबसे यादगार अनुभव रहा, क्योंकि इतने संघर्षों के बाद अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश के लिए खेलना मेरे सपनों का सच होने जैसा था।
प्रश्न : आपके आदर्श खिलाड़ी कौन हैं?
उत्तर : मेरी आदर्श खिलाड़ी स्पेन की कराटे चैंपियन सांद्रा सांचेज हैं। उन्होंने 2020 समर ओलंपिक्स में महिला काता स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा था। 39 साल की उम्र में ओलंपिक में स्वर्ण जीतना बेहद प्रेरणादायक है। मैं भी उनसे प्रेरणा लेकर अपने खेल को लगातार बेहतर बनाने की कोशिश करती हूं।
प्रश्न : आपका आगे का लक्ष्य क्या है?
उत्तर : मेरा सपना है कि मैं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के लिए और अधिक पदक जीतूं और आने वाले समय में विश्व चैंपियनशिप, एशियन चैंपियनशिप, एशियन गेम्स और ओलम्पिक जैसे बड़े मंचो पर देश का नाम रोशन करूं।
दीनापुर की बेटी शशिकला मौर्य की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता नहीं है, बल्कि उस अटूट जज्बे की मिसाल है जो कठिन परिस्थितियों में भी सपनों को हारने नहीं देता। सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े लक्ष्य तय करने वाली शशिकला आज उन हजारों बेटियों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं, जो अपने दम पर दुनिया में पहचान बनाना चाहती हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / सुनील दुबे