वित्त मंत्री सीतारमण का स्टालिन पर पलटवार, ‘झूठा विमर्श’ गढ़ने का आरोप

युगवार्ता    13-Apr-2026
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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का फाइल फोटो


वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का फाइल फोटो


नई दिल्ली, 13 अप्रैल (हि.स)। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन पर गेहूं और धान किसानों को दिए जाने वाले बोनस संबंधी केंद्र सरकार के परामर्श पर ‘झूठा विमर्श’ गढ़ने का आरोप लगाते हुए पलटवार किया। उन्होंने इससे संबंधित पत्र को सार्वजनिक कर स्टालिन को करारा जवाब दिया है।

सीतारमण ने ‘एक्स’ हैंडल पर लिखा कि केंद्र सरकार ने ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया है, बल्कि सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को एक एडवाइजरी भेजी गई थी। यह सलाह राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुसार फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिए थी, न कि किसानों के बोनस को रोकने के लिए था। उन्होंने कहा कि द्रमुक पार्टी इसके जरिए खुद को किसानों और तमिलनाडु के लोगों के रक्षक के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है। सीतारमण ने कहा कि खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कृषि क्षेत्र में सभी हितधारकों के साथ रचनात्मक, निरंतर और सकारात्मक जुड़ाव की आवश्यकता होती है।

वित्त मंत्री ने कहा कि भारत जैसे विशाल देश के लिए यह स्थिति टिकाऊ नहीं है। दालों और तिलहनों का घरेलू उत्पादन बढ़ाना न केवल एक आर्थिक आवश्यकता है, बल्कि एक रणनीतिक जरूरत भी है। सीतारमण ने सवालिया लहजे में कहा कि क्या उन्हें यह नहीं पता कि पाम ऑयल का भारी आयात इसलिए होता है, क्योंकि खाद्य तेल की हमारी मांग तिलहनों की आपूर्ति से पूरी नहीं हो पाती? दालों के मामले में भी यही स्थिति है। किसान उन फसलों के लिए बेहतर कीमतें पा सकते हैं जिनमें आपूर्ति और मांग के बीच अंतर होता है। ज़ाहिर है, मुख्यमंत्री स्टालिन के मन में किसानों का हित नहीं है।

वित्त मंत्री ने कहा कि दालों, तिलहनों और मोटे अनाजों के उत्पादन को बढ़ावा देकर, भारत दोहरे उद्देश्यों को प्राप्त करना चाहता है। प्रोटीन से भरपूर फसलों तक बेहतर पहुंच के माध्यम से 'पोषण सुरक्षा' और खाद्य तेलों के आयात बिल को कम करके 'आर्थिक स्थिरता'। सीतारमण ने कहा कि राज्यों को भेजा गया यह संदेश राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा की ज़िम्मेदारी साझा करने का एक आमंत्रण है। सीतारमण ने कहा कि ज्यादातर राज्य सरकारों ने, चाहे वे किसी भी पार्टी की हों, इस बात को समझा और सहकारी संघवाद की भावना के साथ इसका जवाब दिया। केवल मुख्यमंत्री थिरु स्टालिन ने ही इसे सनसनीखेज़ बनाने का रास्ता चुना। उन्होंने कहा कि सच्ची खाद्य संप्रभुता तभी संभव है जब केंद्र और राज्य मिलकर काम करें, ताकि ज्यादा पानी की खपत वाली अतिरिक्त फसलों की जगह उन ज़रूरी फसलों को उगाया जा सके जिनकी भारत को वास्तव में ज़रूरत है।

वित्त मंत्री ने आगे कहा कि केंद्र-विरोधी बयानबाजी में समय बर्बाद करने के बजाय मुख्यमंत्री स्टालिन को तमिलनाडु की जनता को यह समझाना चाहिए कि वे दालों और तिलहनों के मामले में हमें आत्मनिर्भर बनाने के बजाय प्रभावी रूप से विदेशी ताकतों को अवसर क्यों सौंप रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह हैरानी की बात है कि मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने व्यय सचिव द्वारा सभी राज्यों को लिखे गए पत्र को सार्वजनिक करने की चुनौती दी है। उन्हें वह पत्र मिल चुका है। उन्होंने जान-बूझकर उसकी गलत व्याख्या करने का रास्ता चुना है। अगर वह पत्र उनके पक्ष को मजबूत करता, तो वे खुद ही उसे सार्वजनिक कर देते। लेकिन नहीं, उन्होंने ऐसा नहीं किया। चुनौती देकर उन्होंने झूठी बहादुरी का प्रदर्शन किया है। हमें उस पत्र का लिंक देने में कोई हिचकिचाहट नहीं है।

केंद्रीय वित्त मंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय हित के प्रति थोड़ी सी भी प्रतिबद्धता रखने वाला कोई भी मुख्यमंत्री इस कदम का स्वागत ही करेगा। इसके बजाय सीएम स्टालिन ने एक रचनात्मक सुझाव को तोड़-मरोड़कर एक मनगढ़ंत शिकायत में बदल दिया, क्योंकि डीएमके के लिए भारत की रणनीतिक जरूरतें कोई चिंता का विषय नहीं हैं, बल्कि वे राजनीतिक फ़ायदे उठाने का एक अवसर हैं।

उल्लेखनीय है कि तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन ने तंजावुर की एक रैली में हाल ही में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर किसानों के हितों के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगाया था। स्टालिन का आरोप है कि केंद्र सरकार ने एक पत्र भेजकर तमिलनाडु सरकार को धान की खरीद पर दिए जाने वाले अतिरिक्त बोनस को बंद करने की सलाह दी है। स्टालिन का तर्क है कि इससे किसानों की आय पर सीधा असर पड़ेगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रजेश शंकर

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