
रायपुर, 28 अप्रैल (हि.स.)। छत्तीसगढ़ में भारतमाला परियोजना के तहत रायपुर-विशाखापत्तनम इकोनॉमिक कॉरिडोर के लिए भूमि अधिग्रहण में हुए मुआवजा घोटाला मामले में प्रवर्तन निदेशालय(ईडी) ने मंगलवार को बड़ी कार्रवाई की। रायपुर, अभनपुर, धमतरी और कुरुद में आठ से अधिक ठिकानों पर की गई छापेमारी में ईडी ने भारी मात्रा में नकदी, चांदी और अहम दस्तावेज जब्त किए हैं
प्रवर्तन निदेशालय के रायपुर क्षेत्रीय कार्यालय के अनुसार 27 और 28 अप्रैल को हुई इस कार्रवाई में जमीन कारोबारी गोपाल गांधी, पूर्व मंत्री और वरिष्ठ विधायक अजय चंद्राकर के चचेरे भाई भूपेंद्र चंद्राकर और राइस मिलर रौशन चंद्राकर के ठिकानों पर दबिश दी गई।छापेमारी के दौरान इनके परिजनों पर अधिकारियों के साथ बदसलूकी के आरोप में प्राथमिकी भी दर्ज की गई।
ईडी के मुताबिक छापेमारी के दौरान करीब 66.9 लाख रुपये नकद और 37 किलो से अधिक चांदी बरामद की गई। इसके अलावा कई डिजिटल डिवाइस और अहम दस्तावेज भी जब्त किए गए हैं। यह कार्रवाई एसीबी/ईओडबल्यू की प्राथमिकी के आधार पर शुरू की गई है।
प्रवर्तन निदेशालय के मुताबिक मंगलवार को पीएमएलए 2002 की धारा 17 के तहत छत्तीसगढ़ के अभनपुर, रायपुर, धमतरी और कुरुद स्थित 8 ठिकानों पर तलाशी अभियान चलाया गया था। यह तलाशी अभियान भारतमाला योजना के तहत रायपुर-विशाखापत्तनम राजमार्ग परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण के बदले अवैध रूप से मुआवज़ा प्राप्त करने के मामले में चलाया गया।
ईडी की जांच में पता चला कि आरोपितों ने कुछ सरकारी कर्मचारियों और अन्य व्यक्तियों के साथ आपराधिक साजिश रचकर, धोखाधड़ी से अतिरिक्त मुआवजा प्राप्त किया। उन्होंने ऐसा तब किया, जब एनएचएआई , रायपुर द्वारा राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 की धारा 3A के तहत अधिसूचना जारी की जा चुकी थी। इसके बावजूद उन्होंने जानबूझकर भूमि का स्वामित्व हस्तांतरित किया। साथ ही धारा 3डी के तहत अधिसूचना जारी होने से पहले ही भूमि के कई छोटे-छोटे टुकड़े बना लिए।निर्भय साहू अभनपुर के तत्कालीन पूर्व अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) को इस घोटाले का मुख्य सूत्रधार माना जा रहा है। उन पर आरोप है कि उन्होंने सरकारी रिकॉर्ड में छेड़छाड़ कर अपात्र लोगों को करोड़ों का मुआवजा दिलवाया। पटवारी और अन्य तहसील कर्मियों की भूमिका की भी जांच हो रही है, जिन्होंने नोटिफिकेशन के बाद जमीन की प्रकृति बदलने में मदद की।
भूपेंद्र चंद्राकर और रौशन चंद्राकर पर आरोप है कि इन्होंने अधिकारियों के साथ मिलकर अग्रिम सूचना के आधार पर हाईवे के किनारे की जमीनों का सौदा किया और बाद में फर्जी तरीके से भारी मुआवजा वसूला। जांच में पता चला है कि मुआवजा हड़पने के लिए बेहद शातिराना तरीके अपनाए गए। जब यह तय हो गया कि किस जमीन से सड़क गुजरेगी, तो उस कृषि भूमि को रातों-रात कागजों पर 'डायवर्टेड लैंड' (व्यावसायिक या आवासीय) दिखा दिया गया, ताकि मुआवजे की राशि कई गुना बढ़ जाए। खाली जमीन पर मुआवजा कम मिलता है, इसलिए कागजों में वहां कुएं, पेड़ या निर्माण कार्य (जैसे शेड) होना दिखाया गया ताकि अतिरिक्त पैसे वसूले जा सकें।एक बड़े भूखंड के बजाय उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में दिखाकर अलग-अलग परिवारों के नाम कर दिया गया, जिससे 'सोलिशियम' (मुआवजे पर मिलने वाला अतिरिक्त लाभ) बढ़ गया।
यह मामला पहले छत्तीसगढ़ की आर्थिक अपराध शाखा और एसीबी द्वारा दर्ज किया गया था। चूंकि मामला 100 करोड़ से अधिक के भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा है, इसलिए ईडी ने 'प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट' (पीएमएलए) के तहत अपनी जांच शुरू की।
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हिन्दुस्थान समाचार / केशव केदारनाथ शर्मा