ऐतिहासिक भोजशाला मामले में नया तर्क, 1935 में धार दरबार ने बताया था मस्जिद

युगवार्ता    28-Apr-2026
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भोजशाला


इंदौर, 28 अप्रैल (हि.स.)। मध्य प्रदेश के धार जिला मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक भोजशाला विवाद मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में चल रही नियमित सुनवाई के दौरान मंगलवार को वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा मेनन ने तर्क प्रस्तुत करते हुए दावा किया कि 24 अगस्त, 1935 को धार दरबार ने अधिसूचना जारी कर कहा था कि भोजशाला मस्जिद है और यहां मुस्लिम समाज नमाज पढ़ता रहा है और पढ़ता रहेगा। इस अधिसूचना को आज तक किसी याचिका में चुनौती नहीं दी गई।

भोजशाला मामले में मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की युगलपीठ में सुनवाई हुई। इस दौरान हस्तक्षेपकर्ता (इंटरविनर) काजी जकुल्ला की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा मेनन ने महत्वपूर्ण तर्क प्रस्तुत किए गए। उन्होंने आर्टिकल 25 का संदर्भ लेते हुए तर्क दिया कि वर्तमान विवाद को व्यापक जनहित का स्वरूप देना विधिसंगत नहीं है। यह मूलतः एक विशिष्ट धार्मिक समुदाय से संबंधित प्रश्न है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी याचिका में जब आर्टिकल 21 के उल्लंघन का दावा किया जाता है, तब उस दावे के माध्यम से अन्य व्यक्तियों या समुदायों के मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता और कोर्ट को इस संतुलन को बनाए रखना आवश्यक है।

इसी कड़ी में उन्होंने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के एक फैसला का हवाला देते हुए यह तर्क प्रस्तुत किया कि राज्य किसी एक विषय पर समय-समय पर परस्पर विरोधी रुख नहीं अपना सकता। उन्होंने विशेष रूप से राज्य सरकार और भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई) के बीच विद्यमान विरोधाभास पर कहा कि इस प्रकार का बदलता हुआ रुख विधि की दृष्टि में असंगत, मनमाना और न्यायिक परीक्षण में अस्वीकार्य है, क्योंकि राज्य से अपेक्षा की जाती है कि वह एक सुसंगत और स्थिर दृष्टिकोण अपनाए।

जनहित का अर्थ संपूर्ण समाज के हित से

जनहित याचिका के सवाल पर अधिवक्ता शोभा मेनन ने गुरुवयूर देवासवोम मैनेजिंग कमेटी के निर्णय का विस्तृत उल्लेख करते हुए यह बताया कि “जनहित” का अर्थ संपूर्ण समाज के हित से है न कि किसी एक विशेष समुदाय के हित से। उन्होंने तर्क दिया कि यदि कोई याचिका केवल एक समुदाय के धार्मिक हितों तक सीमित है, तो उसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकार करना विधि के सिद्धांतों के विपरीत होगा, क्योंकि पब्लिक शब्द का दायरा सभी समुदायों एवं नागरिकों को समाहित करता है।

साक्ष्य एवं क्षेत्राधिकार के महत्वपूर्ण प्रश्न पर उन्होंने कोर्ट का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि भोजशाला विवाद अयोध्या राम मंदिर केस और ज्ञानव्यापी मास्क्यू डिस्पुट तरह एक जटिल मंदिर-मस्जिद विवाद है, जिसमें तथ्यात्मक साक्ष्य, दस्तावेजों और गवाहों का परीक्षण अत्यंत आवश्यक है।

1935 का धार दरबार का दस्तावेज महत्वपूर्ण

अधिवक्ता शोभा मेनन ने यह स्पष्ट किया कि संपत्ति के शीर्षक का निर्धारण आर्टिकल 226 के तहतसंक्षिप्त कार्यवाही में नहीं किया जा सकता, क्योंकि उच्च न्यायालय के पास मूल दीवानी क्षेत्राधिकार नहीं है। इस प्रकार के विवादों का परीक्षण एवं निर्णय संबंधित जिला कोर्ट, विशेष रूप से धार जिला कोर्ट द्वारा साक्ष्यों के मूल्यांकन के पश्चात ही किया जा सकता है। अधिवक्ता शोभा मेनन ने 24 अगस्त 1935 को धार दरबार द्वारा जारी ऐलान का उल्लेख करते हुए उसे अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज बताया। उन्होंने कहा कि उक्त ऐलान में भोजशाला को मस्जिद के रूप में घोषित किया गया है, जहां मुस्लिम समुदाय पूर्व से नमाज अदा करता आ रहा है और यह प्रथा निरंतर जारी है। उन्होंने इस ऐलान को एक प्रकार की विधिसम्मत अधिसूचना/गजट के रूप में प्रस्तुत करते हुए आर्टिकल 13(3) के अंतर्गत “कानून” की परिभाषा में शामिल बताया, जिससे इसकी विधिक वैधता सिद्ध होती है।

तब सक्षम स्थानीय प्राधिकरण था धार दरबार

अधिवक्ता शोभा मेनन ने एनसिएंट मोनूमेंट्स प्रिजर्वेशन एक्ट 1904 के प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए यह तर्क दिया कि उस समय स्थानीय प्राधिकरण को स्मारकों को संरक्षित घोषित करने का अधिकार प्राप्त था, जो बाद में केंद्र सरकार को स्थानांतरित किया गया। अतः धार दरबार, जो उस समय सक्षम स्थानीय प्राधिकरण के रूप में कार्य कर रहा था। उसके द्वारा जारी किया गया ऐलान पूर्णतः वैध और विधिसम्मत है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बिना किसी विधिवत अधिसूचना, अधिग्रहण या स्वामित्व ग्रहण की प्रक्रिया के किसी संपत्ति का स्वतः सरकार में निहित होना विधि द्वारा मान्य नहीं है।

भूमि अधिग्रहण कानूनों का पालन करना आवश्यक

अधिग्रहण और संरक्षकता संबंधी प्रावधानों पर उन्होंने यह तर्क दिया कि यदि किसी संपत्ति के स्वामी का पता हो, तो सरकार विधिवत प्रक्रिया अपनाकर उसे अधिग्रहित कर सकती है, किंतु यदि स्वामी अज्ञात हो, तब भी संपत्ति स्वतः सरकार के स्वामित्व में नहीं आ जाती। ऐसी स्थिति में भी विधिक प्रक्रिया, जैसे कि राज्य के प्रचलित भूमि अधिग्रहण कानूनों का पालन करना आवश्यक होता है। उन्होंने विशेष रूप से यह इंगित किया कि इस मामले में ऐसा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है जिससे यह सिद्ध हो सके कि संबंधित संपत्ति का विधिवत अधिग्रहण किया गया है या उस पर सरकार ने वैधानिक रूप से कब्जा प्राप्त किया है।

कोई ठोस विश्वसनीय साक्ष्य अभिलेख पर नहीं

अधिवक्ता शोभा मेनन ने यह भी तर्क दिए कि प्रस्तुत प्रकरण में ऐसा कोई ठोस विश्वसनीय साक्ष्य अभिलेख पर नहीं है, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि संबंधित स्थल मंदिर है अथवा इसे विधिवत रूप से सरकार द्वारा अधिग्रहित कर संरक्षित स्मारक घोषित किया है। उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि इस विवाद का परीक्षण धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि विधि के स्थापित सिद्धांतों के आधार पर किया जाना चाहिए, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि क्या वैध है और क्या अवैध।

गौरतलब है कि भोजशाला के स्वामित्व को लेकर उच्च न्यायालय में चार जनहित याचिकाएं और एक अपील चल रही है। न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ के समक्ष बुधवार को भी इस मामले में सुनवाई जारी रहेगी। मंगलवार को शोभा मेनन के तर्क पूरे हो गए। अब बुधवार को मस्जिद पक्ष की ओर से दोबारा तर्क रखे जाएंगे।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

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