जलवायु-प्रतिरोधी और पोषक तत्वों से भरपूर फसल किस्मों के विकास पर केंद्रित है आईसीएआरः डॉ एम एल जाट

युगवार्ता    08-Apr-2026
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आईसी ए आर के महानिदेशक डॉ एम एल जाट गेहूं की फसल, उनकी किस्मों की समीक्षा करते हुए


करनाल में गेहूं, जौ पर चल रहे अनुसंधान पर बात करते हुए डॉ एम एल जाट


नई दिल्ली, 08 अप्रैल (हि.स.)। कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (डीएआरई) के सचिव और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने कहा कि संस्थान गेहूं की ऐसी किस्मों तैयार करने की ओर अग्रसर है, जिसमें सिंचाई के पानी में 85 प्रतिशत तक की बचत, उर्वरक के उपयोग में 28 प्रतिशत की कमी, ईंधन की खपत में 51 प्रतिशत की बचत और फसल अवशेषों को जलाने में 95 प्रतिशत तक की कमी संभव है। इन किस्मों से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 46 प्रतिशत की कमी, प्रणाली उत्पादकता में 33 प्रतिशत तक की वृद्धि और घरेलू आय में लगभग दोगुनी वृद्धि में भी होगी, जो राष्ट्रीय खाद्य और पोषण सुरक्षा मजबूत करेगा। बाहरी निवेश और अस्थिर वैश्विक बाजारों पर निर्भरता की बेहद कम करेगा।

बुधवार को करनाल स्थित आईसीएआर-भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (आईआईडब्ल्यूबीआर) और आईसीएआर-केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (सीएसएसआरआई) में जारी अनुसंधान एवं विकास पहलों की समीक्षा करते हुए ये बातें कही। डॉ. जाट ने इस दौरान, भारत-गंगा के मैदानों में उत्पादकता बढ़ाने, निवेश लागत कम करने और जलवायु परिवर्तनशीलता के प्रति अनुकूलन सुधारने के उद्देश्य से किए जा रहे प्रमुख अनुसंधान कार्यों की समीक्षा की और जलवायु-अनुकूल तथा संसाधन-कुशल कृषि प्रणालियों को बढ़ावा देने के महत्व पर जोर दिया।

डॉ. जाट ने भारत की गेहूं की नई किस्मों पर चल रहे कार्यों के बारे में कहा कि आईसीएआर का ध्यान जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए जलवायु-प्रतिरोधी और पोषक तत्वों से भरपूर फ सल किस्मों के विकास पर केंद्रित है, ताकि किसानों की आय और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार हो सके।

उन्होंने कहा कि जैविक नाइट्रिफिकेशन अवरोधन (बीएनआई) जैसी नवाचार तकनीकों से उत्पादकता में कमी किए बिना उर्वरक के उपयोग में 25 प्रतिशत तक की कमी संभव हो रही है, जिससे किसानों और पर्यावरण दोनों को लाभ हो रहा है।

उन्होंने कहा कि आईसीएआर ने पोषण सुरक्षा के क्षेत्र में लौह, जस्ता और प्रोटीन से समृद्ध गेहूं की 55 जैव-संरक्षित किस्में जारी की हैं। गेहूं की खेती का लगभग 45 प्रतिशत क्षेत्र अब जैव-संरक्षित किस्मों के अंतर्गत है, जो किसानों द्वारा इन्हें अपनाने में वृद्धि और किस्मों के उच्च प्रतिस्थापन दर को दर्शाता है।

डॉ. जाट ने शून्य जुताई, अवशेष प्रतिधारण और मशीनीकृत बुवाई जैसी संरक्षण कृषि पद्धतियों की भी समीक्षा की, जिनसे प्रणाली की उत्पादकता में 6-10 प्रतिशत तक सुधार हुआ है, साथ ही मृदा कार्बनिक कार्बन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और ईंधन और समय में 70-75 प्रतिशत तक की बचत हुई है।

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हिन्दुस्थान समाचार / विजयालक्ष्मी

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