
नई दिल्ली, 13 मई (हि.स.)। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने मधुमेह से पीड़ित औऱ किडनी फेलियर से जूझ रहे 30 साल के मरीज को नई जिंदगी दी है। इतिहास रचते हुए एम्स ने दुर्लभ किडनी-पैंक्रियाज का सफल प्रत्यारोपण किया। एम्स में इस उपलब्धि से गंभीर मधुमेह और किडनी फेलियर से जूझ रहे मरीजों के लिए उम्मीद की किरण जगी है।
30 वर्षीय एक रोगी, जो लंबे समय से टाइप 1 मधुमेह के कारण किडनी की अंतिम चरण की बीमारी से पीड़ित था। यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें अक्सर मरीज डायलिसिस और जीवन भर इंसुलिन थेरेपी पर निर्भर रहते हैं।
एम्स ने
14 अप्रैल को इस मरीज की किडनी और पैंक्रियाज दोनों प्रत्यारोपित किए। मरीज अब स्थिर है, उसकी किडनी ठीक से काम कर रही है और न्यूनतम इंसुलिन सहायता के साथ उसका रक्त शुगर स्तर लगभग सामान्य है।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में बुधवार को पत्रकार वार्ता में सर्जिकल डिसिप्लिन्स विभाग के प्रो. वी. के. बंसल ने बताया कि “यह ट्रांसप्लांट सिर्फ अंग बदलने तक सीमित नहीं था। इसका उद्देश्य उस युवा मरीज की जीवन-गुणवत्ता को फिर से बेहतर बनाना था, जो मधुमेह की कई जटिलताओं से जूझ रहा था।”
सर्जरी का नेतृत्व करने वाले प्रो. असुरी कृष्णा ने बताया कि “एक साथ किडनी–पैंक्रियाज ट्रांसप्लांट में अत्यधिक सटीकता, ऑपरेशन के बाद लगातार निगरानी और कई विभागों के बीच बेहतरीन तालमेल की आवश्यकता होती है। इस सफलता से एम्स की तैयारी और विशेषज्ञता स्पष्ट होती है।”
उन्होंने बताया कि
सामान्य किडनी ट्रांसप्लांट से अलग, यह ट्रांसप्लांट किडनी फेलियर और डायबिटीज दोनों का एक साथ इलाज करता है। टाइप-1 डायबिटीज के मरीजों के लिए यह बार-बार डायलिसिस से राहत और इंसुलिन पर निर्भरता में बड़ी कमी ला सकता है, जिससे उनकी लंबी उम्र और जीवन-गुणवत्ता में सुधार होता है।
इस सर्जरी में डॉ. संजीत राय और डॉ. सुशांत सोरेन सहित बहु-विषयक टीम शामिल थी। नेफ्रोलॉजी विशेषज्ञ प्रो. भोमिक और प्रो. संदीप महाजन ने मरीज के ऑपरेशन से पहले और बाद के इलाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रो. भोमिक ने कहा कि डायबिटीज सेजुड़ी किडनी बीमारी युवाओं में तेजी से बढ़ती चुनौती बन रही है।
उन्होंने कहा,
“टाइप-1 डायबिटीज वाले कई युवा मरीजों की किडनी स्थायी रूप से खराब हो जाती है। इस ट्रांसप्लांट उन्हें सामान्य जीवन जीने का वास्तविक अवसर देता है।”
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हिन्दुस्थान समाचार / विजयालक्ष्मी